पिछले 1 माह से नगर में अतिक्रमण हटाओ अभियान चल रहा है| कहीं नाली खोलने का बहाना तो कहीं सड़क साफ़ करने की ताकीद| मगर जनता क्या कह रही रही है इस पर कोई नजर या निगाह नहीं| पैमाइश की कोई गुंजाईश नहीं| 1971 में लागू हुआ मास्टर प्लान अभियान की कब्र खुद चुकी है| और कब्र खोदने वाले वियमित क्षेत्र का दफ्तर चलाते है| सहयोगी भूमिका नगरपालिका की बनी रहती है| न कोई नक्शा है और न कोई पैमाइश| बस सुनी सुनाई बातो, भौतिक वक्रीकरण की निगाह, नोटिस और अवैध धन वसूली की आड़ में सम्पन्न होता है अतिक्रमण हटाओ अभियान का वार्षिक कर्मकांड|
नगरपालिका के पास जो नक़्शे है उनमे जरुरत के मुताबिक संशोधन है| चौक पर टाइम सेंटर का नक्शा भी पास इन्ही विनयमित (नगर मजिस्ट्रेट के दफ्तर के अंदर दफ्तर) वालो ने किया है| वैसे ये वही कार्यालय है जिसमे ठंडी सड़क इलाका जो मास्टर प्लान में गोदामो के लिए पास है ने बड़े बड़े अरबो रुपये के गेस्ट हाउस बनबा दिए| बदले में नगर मजिस्ट्रेट की कुर्सी पर बैठने वाले अफसर मालामाल होते गए| बाबुओं की चांदी हुई| मगर अवैध निर्माण इन अफसरों की निगाहो के सामने ही होते रहे| इसमें तो कोई खानदानी कब्ज़ा नहीं था| तो एक बार फिर से निगाह वार्षिक कर्मकांड में रविवार को चौक पर है| जिले के आला अफसरों की प्रतिष्ठा और नगरपालिका की ईमानदारी दोनों दांव पर है| बच्चे बच्चे की जुबान पर एक ही बात है- क्या चौक का टाइम सेंटर आगे से 4 फुट टूटेगा? दूकान मालिक का कहना है कि उन्होंने 1970 में निर्माण कराया| और मास्टर प्लान 1971 में आया| जमीन के कागज उनके पास 100 साल से ज्यादा पुराने है| उनकी अपनी दलीले है जो सही भी हो सकती है| मगर जिन्होंने ये दलीले तैयार की है उनकी ईमानदारी भी शक से बाहर नहीं है|
तीन साल पहले की ही बात है जब बढ़पुर के अल्लाहनगर में क्रिश्चियन फील्ड के बाहर सड़क के किनारे की नजूल की जमीनो का मामला खुला था| एक लेखपाल ने खुद अपनी पत्नी और वस्त्ला गर्ग के नाम से नजूल की जमीन 40 साल पुराने इंतखाब में हेरफेर कर चढ़ा दी थी| मामला जाँच में पकड़ा गया तो बसपा सरकार के मंत्री से लेकर संत्री तक हिल गए| जाँच दब गयी| आजकल उनके पति माननीय है| ऐसे राजस्व विभाग में जमीने 100 साल क्या राजा टोडरमल (जमीनो का लेखा जोखा बनाना इन्ही के समय से शुरू हुआ था) के जमाने से अपनी दिखाई जा सकती है| विनयमित क्षेत्र के अधिकारी नगर मजिस्ट्रेट तो आज भी रोज नक्शा पास करते है मगर कोई गारंटी नहीं होती कि नक्शा पास कराने वाला मकान या दूकान पास नक़्शे के मुताबिक बना रहा है| बदले में दफ्तर के लोग एक निश्चित फीस (अवैध) ले ही लेते है| अब नगरपालिका को नाली से मतलब है| तो मकान बनाते समय नयी नाली पुरानी नाली को बंद करके आगे भी बना दी जाती है, उसे कौन रोकता है| मगर इन सबसे इतर बात तो ये है कि क्या नगरपालिका 1910 का नक्शा चौक पर डीएम साहब के सामने पेश कर पायेगी| ताकि अभिलेखीय पुष्टि हो सके कि अगर अतिक्रमण है तो कितना? 4 फुट, टाइम सेंटर की पूरी दूकान की गहराई भर 11 फ़ीट या फिर इसके पीछे की दूकान का भी कुछ हिस्सा अतिक्रमण में है| कुछ पुराने लोग बताते है कि नाला टाइम सेंटर के नीचे नहीं इसके पीछे वाली दूकान में दफ़न है|
फर्रुखाबाद परिक्रमा (लेखक- सतीश दीक्षित) के एक पुराने अंश का कुछ भाग–
हिम्मत हो तो चौक की पैमाइश कराइए!
पूरे एक सप्ताह से नगर क्षेत्र में बुलडोजर अभियान था कहिए अतिक्रमण विरोधी अभियान चल रहा है। सब अपने अपने अंदाज में खुश और नाराज हैं। एक बोले अब लो मजा पतंग उड़ाने का। सायकिल की सवारी की होती तब फिर यह दुर्दिन देखने को नहीं मिलते। मौका आता भी तो सायकिल वाले लाल हरी बिग्रेड के साथ अतिक्रमण हटाओ दस्ते पर ही हल्ला बोल देते। उनका नारा है बंद तुम्हारी खुली हमारी।
दूसरा बोला चुप रह बेबकूफ। यह सब क्या पहली बार हो रहा है। यह वार्षिक कर्मकाण्ड है हर बार होता है। शहर की धरती पर अतिक्रमण अमर बेल की तरह पसर जाता है। इस बार ढोल ताशा ज्यादा बज रहा है। सरकार बदली है। शहर में हाथी, हाथ, सायकिल, कमलधारियों की दुर्दशा हो चुकी है। पतंग वालों की यहां उड़ी। परन्तु सैफई, जसवंत नगर, इटावा, लखनऊ दिल्ली में टेलीफोन की सारी कलाकारी और बातों की पूरी ऐटयारी के बाद भी उड़ नहीं पा रही है। अब व्यापार मण्डलों के कमंडलधारी अखबारी विरोध करके अपनी इज्जत बचायें या तुम्हारी पैरवी करके अपनी फजीहत करायें। नई सरकार नए हाकिम हुक्काम। न किसी से दुआ न किसी से सलाम। वह कर रहे हैं अपना काम हम कर रहे हैं अपना काम।
तीसरा बोला ज्यादा बकबक मत कर। अभी तेल देखा है तेल की धार नहीं देखी है। अतिक्रमण करने वाले कोई अपराधी नहीं है। नगर के व्यापारी हैं। नगर पालिका की कुर्सी पर जो लोग बैठे उन्होंने कभी भी अपने प्यारे और दुलारे शहर को सजाने और संवारने की कोशिश ही नहीं की। कमीशन, लूट, ट्रांसफर, पोस्टिंग से फुर्सत मिले तब न। अब फिर जुलाई में चुनावी घमासान की तैयारी है। जो शिकायत लेकर पहुंचा उसे समझाने के अंदाज में सभी संभावित चेयरमैन यही कह रहे हैं। कुछ ही दिनों की बात है। जीतने भर दो गलियां रहेंगी नहीं सड़कें पग डंड़ियां बन जायेंगीं। जाम लगता है लगने दो लेकिन हमारे व्यापारी भाइयों को किसी तरह का कोई कष्ट नहीं होना चाहिए। लोग हमें वोट देते हैं। परन्तु हमारा खाना खर्चा दरबार व्यापारी भाइयों से ही चलता है। व्यापारी एकता जिन्दाबाद।
अतिक्रमण विरोधी दस्ते के कमांडरों तक यह बातें पहुंची। सब एक साथ मीडिया के सामने गरजे। हिम्मत भी मत करना दुबारा अतिक्रमण करने की। वह हाल करेंगे जिसकी कल्पना भी नहीं की होगी।
कुछ दिलजलों से नहीं रहा गया। बेनामी बिना हस्ताक्षरों की चिट्ठी लिख दी। भाई साहब आपने अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाकर हम सब पर बहुत उपकार किया है। आपको बार-बार बधाई। परन्तु आपसे एक बात कहनी है। पूरे हिन्दुस्तान में घूम आइए- आपको इतना बड़ा साफ सुथरा हवादार चौक वह भी त्रिपौलिया चौक हमारे फर्रुखाबाद जैसा कहीं नहीं मिलेगा। अब लोगों का क्या वह तो कहते ही रहते हैं। त्रिपौलिया चौक पर सबसे ज्यादा अतिक्रमण है। इसे क्यों नहीं हटाते। हिम्मत है चौक का अतिक्रमण हटाने की। हमारी मोमिया खोखे तको हटाते बड़ी बहादुरी दिखाते हो। अपने ही नक्शे से अपने ही फीते से चौक त्रिपौलिया चौक की पैमाइश करके दूध का दूध और पानी का पानी कर दो। हम जिंदगी भर तुम्हारा एहसान मानेंगे।
दूसरे ने हां में हां मिलाई सही कहते हो भाई। हम कब कहते हैं कि अगर कोई कोर्ट कचहरी का फंडा है। स्टे है फैसला है तब फिर उसे जनता को बताने में क्या परेशानी है। एक बार बात साफ हो जाए हमारे चौक त्रिपौलिया का गुनाह माफ हो जाए। सीएम साहब, सीओ साहब, राम सक्सेना साहब, क्या इतनी हिम्मत दिखाओगे अतिक्रमण विरोधी अभियान के दौरान चौक त्रिपौलिया की गुत्थी सुलझाओगे। चलते-चलते खबर मिली राम सक्सेना साहब का स्थानांतरण कानुपर नगर निगम के लिए हो गया है।
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