Posted on : 21-05-2013 | By :
जेएनआई डेस्क | In :
Delhi, FEATURED
सुप्रीम कोर्ट ने हाल के अपने एक फैसले में निर्देश दिया है कि यदि कोई चाहता है कि उससे संबंधित फैसले की प्रति उसे उसी की भाषा में मुहैया कराई जाए, तो इसे सुनिश्चित किया जाए। लेकिन क्या यह निर्देश न्याय मांगने वाले के लिए पर्याप्त होगा? हिंदी को व्यवहार में लाने की सरकारी अपील आपने रेलवे स्टेशनों और अन्य सरकारी कार्यालयों में पढ़ी होगी, लेकिन विश्व के इस सबसे बड़े प्रजातंत्र में आजादी के 65 साल बाद भी सुप्रीम कोर्ट की किसी भी कार्यवाही में हिंदी का प्रयोग पूर्णत: प्रतिबंधित है। और यह प्रतिबंध भारतीय संविधान की व्यवस्था के तहत है। संविधान के अनुच्छेद 148 के खंड 1 के उपखंड (क) में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट और हर हाई कोर्ट में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी। हालांकि इसी अनुच्छेद के खंड 2 के तहत किसी राज्य का राज्यपाल यदि चाहे तो राष्ट्रपति की पूर्व सहमति सेहाई कोर्ट में हिंदी या उस राज्य की राजभाषा के प्रयोग की अनुमति दे सकता है। पर ऐसी अनुमति उस हाई कोर्ट द्वारा दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश पर लागू नहीं होती। यानी हाई कोर्ट में भी भारतीय भाषाओं के सीमित प्रयोग की ही व्यवस्था है।

संशोधन है उपाय
संविधान लागू होने के 63 वर्ष बाद भी केवल चार राज्यों राजस्थान, यूपी, मध्य प्रदेश और बिहार के हाई कोर्ट में किसी भारतीय भाषा के प्रयोग की अनुमति है। सन 2002 में छत्तीसगढ़ सरकार ने हिंदी और 2010 तथा 2012 में तमिलनाडु और गुजरात की सरकारों ने अपने-अपने हाई कोर्ट में तमिल और गुजराती के प्रयोग का अधिकार देने की मांग केंद्र सरकार से की। पर इन तीनों मामलों में उनकी मांग ठुकरा दी गई। सुप्रीम कोर्ट में अंग्रेजी के प्रयोग की अनिवार्यता हटाने और एक या एक से अधिक भारतीय भाषा के प्रयोग की अनुमति देने का अधिकार राष्ट्रपति या किसी अन्य अधिकारी के पास नहीं है। इसके लिए संविधान संशोधन ही उचित रास्ता है। संविधान के अनुच्छेद 348 के खंड 1 में संशोधन द्वारा यह प्रावधान किया जाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट और प्रत्येक हाई कोर्ट में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी अथवा कम से कम एक भारतीय भाषा में होंगी।
शोषण का सिलसिला
ध्यान रहे, भारतीय संसद में सांसदों को अंग्रेजी के अलावा संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित सभी 22 भारतीय भाषाओं में बोलने की अनुमति है। श्रोताओं को यह विकल्प है कि वे मूल भारतीय भाषा में व्याख्यान सुनें अथवा उसका हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद सुनें, जो उन्हें उसी समय उपलब्ध कराया जाता है। अनुवाद की इस व्यवस्था के तहत उत्तम अवस्था तो यह होगी कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में एक या एक से ज्यादा भारतीय भाषाओं के प्रयोग का अधिकार जनता को उपलब्ध हो, परंतु इन न्यायालयों में एक भी भारतीय भाषा के प्रयोग की स्वीकार्यता न होना हमारे शासक वर्ग द्वारा जनता के खुल्लमखुल्ला शोषण की नीति का प्रत्यक्ष उदाहरण है। किसी भी नागरिक का यह अधिकार है कि अपने मुकदमे के बारे वह न्यायालय में बोल सके। परंतु अनुच्छेद 348 की इस व्यवस्था के तहत सिर्फ चार को छोड़कर शेष सभी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में यह अधिकार अंग्रेजी न बोल सकने वाली देश की 97 प्रतिशत जनता से छीन लिया गया है। इनमें से कोई भी इन न्यायालयों में मुकदमा करना चाहे, या उस पर किसी अन्य द्वारा मुकदमा दायर कर दिया जाए तो मजबूरन उसे अंग्रेजी जानने वाला वकील रखना ही पड़ेगा, जबकि अपना मुकदमा बिना वकील के ही लड़ने का हर नागरिक को अधिकार है। वकील रखने के बाद भी वादी या प्रतिवादी यह नहीं समझ पाता है कि उसका वकील मुकदमा सही ढंग से लड़ रहा है या नहीं। निचली अदालतों और जिला अदालतों में भारतीय भाषा के प्रयोग की अनुमति है। हाई कोर्ट में जब कोई मुकदमा जिला अदालत के बाद अपील के रूप में आता है तो मुकदमे से संबंधित निर्णय व अन्य दस्तावेजों के अंग्रेजी अनुवाद में समय और धन का अपव्यय होता है। वैसे ही बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान हाई कोर्ट के बाद जब कोई मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में आता है तो भी अनुवाद में समय और धन की बर्बादी होती है। प्रत्येक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में एक-एक भारतीय भाषा के प्रयोग की भी अगर अनुमति हो जाए तो हाई कोर्ट तक अनुवाद की समस्या पूरे देश में लगभग समाप्त हो जाएगी। अहिंदी भाषी राज्यों के भारतीय भाषाओं के माध्यम से संबद्ध मुकदमों में से जो मुकदमे सुप्रीम कोर्ट में आएंगे, केवल उन्हीं में अनुवाद की आवश्यकता होगी।
अनुच्छेद 343 में कहा गया है कि संघ की राजभाषा हिंदी होगी। जबकि अनुच्छेद 351 के मुताबिक संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए और उसका विकास करे। अनुच्छेद 348 में संशोधन करने की हमारी प्रार्थना एक ऐसा विषय है, जिसमें संसाधनों की कमी का कोई बहाना नहीं बनाया जा सकता है। यह शासक वर्ग द्वारा आम जनता का शोषण करते रहने की मंशा का खुला प्रमाण है। यह हमारी आजादी को निष्प्रभावी बना रहा है।
प्रगति और भाषा
क्या स्वाधीनता का अर्थ केवल ‘यूनियन जैक’ के स्थान पर ‘तिरंगा झंडा’ फहरा लेना है? कहने के लिए भारत विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र है, परंतु जहां जनता को अपनी भाषा में न्याय पाने का हक नहीं है, वहां प्रजातंत्र कैसा? दुनिया के तमाम उन्नत देश इस बात के प्रमाण हैं कि कोई भी राष्ट्र विदेशी भाषा में काम करके उन्नति नहीं कर सकता। प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से विश्व के वही देश अग्रणी हैं, जो अपनी जनभाषा में काम करते हैं और वे देश सबसे पीछे हैं, जो विदेशी भाषा में काम करते हैं। विदेशी भाषा में उन्हीं अविकसित देशों में काम होता है, जहां का बेईमान अभिजात वर्ग विदेशी भाषा को शोषण का हथियार बनाता है और सामाजिक-आर्थिक विकास के अवसरों में अपना पूर्ण आरक्षण बनाए रखना चाहता है।
(श्री श्याम रूद्र पाठक जी जिनका मोबाइल नम्बर 9818216384 है से ज्यादा से ज्यादा सम्पर्क व समर्थन दें)
Posted on : 21-05-2013 | By :
जेएनआई डेस्क | In :
FEATURED
नई दिल्ली. देश की आज़ादी के महानायक महात्मा गांधी के खून एक कतरे की कीमत उनके किसी अनुयायी के लिए तो अनमोल हो सकती है। लेकिन नीलामी बाज़ार ने उसकी भी कीमत तय कर दी है। ब्रिटेन के श्रॉफशायर में होने वाली नीलामी में आज गांधी के खून के एक कतरे के लिए बोली लगाई जाएगी। इसके लिए 8 करोड़ रुपये की न्यूनतम रकम तय की गई है। नीलामी में रखा जाने वाला खून का कतरा अहिंसा के पुजारी कहे जाने वाले महात्मा गांधी के शरीर से 1924 में लिया गया था। उस समय गांधी का मुंबई के हॉस्पिटल में उपचार अपेंडिक्स का ऑपरेशन हुआ था और इसी समय उनके शरीर से यह खून जांच के लिए निकाला गया था।
इस नीलामी का आयोजन यूरोप की मशहूर नीलामी करने वाली संस्था मुलॉक्स कर रही है। इस नीलामी में रखी जाने वाली वस्तुएं 1920 के आसपास की हैं जिनका महात्मा गांधी से संबंध रहा है। उस दौर में गांधी जी मुंबई के जूहु में रहा करते थे। मोहम्मद अली जिन्ना ने भी यहीं पर गांधीजी से मुलाकात की थी।
Posted on : 20-05-2013 | By :
जेएनआई डेस्क | In :
Delhi, FEATURED
मध्य प्रदेश बाल संरक्षण आयोग के विरोध के चलते धर्मा प्रोडक्शन की फिल्म ‘गिप्पी’ से अश्लील शब्द और दृश्य हटा लिए गए हैं। मप्र बाल संरक्षण आयोग के सदस्य विभांशु जोशी और आरएच लता ने सोमवार को यहां बताया कि फिल्म निर्माता करण जौहर की फिल्म ‘गिप्पी’ के ट्रेलर में द्विअर्थी शब्द तथा अश्लील दृश्य को गंभीरता से लेते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा सेंसर बोर्ड को पत्र भेजा गया था। लेकिन पत्र का जवाब नहीं मिलने पर 30 अप्रैल को सूचना प्रसारण मंत्रालय के सचिव उदय वर्मा से दिल्ली में जाकर व्यक्तिगत भेंटकर आपत्ति दर्ज कराई गई थी।

जोशी ने सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा उन्हें छह मई को भेजे गये पत्र का हवाला देते हुए बताया कि फिल्म और फिल्म के ट्रेलर से द्विअर्थी शब्द तथा एक अश्लील दृश्य को हटा दिया गया है। उन्होंने बताया कि सेंसर बोर्ड की वेबसाइट में भी फिल्म ‘गिप्पी’ में रिलीज से पहले किए गये दोनों संशोधनों की जानकारी दी गई है। उन्होंने बताया कि पहला संशोधन द्विअर्थी शब्द हटाकर किया गया तथा दूसरा किशोरवय गिप्पी का एक दुकानदार के सामने आपत्तिजनक दृश्य था।
पढ़िये- मेरे तो छोटे-छोटे समोसे जैसे हैं- मिलिए, इस विवादित डायलॉग से चर्चा में आई ‘गिप्पी’ से
इलाहाबाद : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आधुनिक चिकित्सा तकनीक के जरिए कन्या भू्रण हत्या पर गहरी चिंता व्यक्त की है और कहा है कि इसके लिए देश के डॉक्टर जिम्मेदार हैं। अदालत ने यूपी में इस तरह की घटनाओं पर गहरी चिंता जताई है और कहा है कि राज्य सरकार ने पीएनडीटी एक्ट-1994 पर अमल करने की कोई कोशिश नहीं की है। इस एक्ट के तहत क्लीनिक सील कर डॉक्टर को अभियोजित करने की व्यवस्था है।
पिछले एक दशक में 10 मिलियन कन्या भू्रण हत्या हो चुकी है। यह संख्या प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध में हुई मौतों से कहीं अधिक है।
कोर्ट ने कुशीनगर के जिलाधिकारी द्वारा लिंग परीक्षण करने वाले क्लीनिक को सील कर पंजीकरण निरस्त करने की कार्यवाही को विधिपूर्ण माना है। तथा निर्देश दिया है कि डॉक्टरों का पंजीकरण निरस्त करने तथा उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा कायम करने के लिए प्रकरण मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया को भेजा जाए।
यह आदेश न्यायमूर्ति सुनील अम्बवानी तथा न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता की खण्डपीठ ने डॉ.द्वारिका प्रसाद की याचिका को खारिज करते हुए दिया है। याची का क्लीनिक आशीष अल्ट्रासाउण्ड एण्ड एक्सरे सेंटर पडरौना, कुशीनगर में है जिसके विरुद्ध सेक्स परीक्षण की शिकायत मिलने पर जिलाधिकारी ने कार्यवाही की। इस कार्यवाही को याचिका में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा है कि भारत जैसे सभ्य देश में तुच्छ लाभ के लिए डॉक्टरों द्वारा मॉडर्न तकनीक का इस्तेमाल सेक्स जानने के लिए किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। पिछले एक दशक में 10 मिलियन कन्या भू्रण हत्या हो चुकी है। यह संख्या प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध में हुई मौतों से कहीं अधिक है।
अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश में सेक्स निर्धारण पर अंकुश लगाने का कोई कदम नहीं उठाया गया जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल क्लीनिक सील करने या लाइसेंस निरस्त करने से काम नहीं चलेगा। कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र में 69 मामलों में चार्ज फ्रेम हो चुके हैं। आठ मामले आयुर्वेद कौंसिल तथा सात मामले होम्योपैथिक कौंसिल को भेजे गए। 66 डॉक्टरों के पंजीकरण महाराष्ट्र सरकार ने निरस्त किए। पीसी एण्ड पीएनडीटी एक्ट की अवहेलना के 400 केस दर्ज हुए हैं। कोर्ट ने कुशीनगर के जिलाधिकारी की कार्यवाही की तारीफ की और एक्ट का कड़ाई से पालन किए जाने का निर्देश दिया है।
मालूम हो कि डॉ.नीलम सिंह ने जो ‘सेव द गर्ल चाइल्ड’ से जुड़ी है, ने जिले में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों के जन्मदर में तेजी से आई गिरावट की शिकायत की। जिस पर एक टीम ने निरीक्षण के बाद पाया कि याची के क्लीनिक में सेक्स निर्धारण किया जा रहा है। इस पर क्लीनिक जब्त कर लिया गया और लाइसेंस निरस्त कर दिया गया।
रिपोर्ट में बताया गया है कि शहर के 65 अल्ट्रा साउंड केंद्रों में से 60 फीसद पिछले पांच वर्षो में स्थापित हुए हैं जिसके चलते लड़कियों की जन्मदर में भारी गिरावट हुई है। यह भी पाया गया कि युवा महिलाओं का अल्ट्रा साउंड अधिक संख्या में कराया गया है और अधिकांश टेस्ट डॉ.एम चौधरी व डॉ.महेश के द्वारा कराए गए हैं।
Posted on : 20-05-2013 | By :
जेएनआई-डेस्क | In :
FEATURED
मोबाइल हैंडसेट से निकलने वाली सेहत के लिए खतरनाक रेडिएशन किरणों को लेकर सरकार अब नींद से जागती दिख रही है। खासकर तय सीमा से अधिक रेडिएशन छोड़ने वाले हैंडसेटों पर सरकार सख्ती के मूड में है। सबसे पहले सरकार नियमों की अनदेखी कर रही कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए खुद को मजबूत बनाने की तैयारी में है।
इसके तहत दूरसंचार विभाग अपनी टेलीकॉम एनफोर्समेंट रिसॉर्स एंड मॉनीटरिंग (टीईआरएम यानी टर्म) इकाई को ताकत देने की कोशिश में है। ज्यादा रेडिएशन छोड़ने वाले हैंडसेटों की तलाशी और छापे मारने की ताकत देने की बात चल रही है। सरकार के निर्देश के तहत अब जल्द ही उपभोक्ता अपने नए हैंडसेट पर *#07# डायल कर रेडिएशन का स्तर जान सकेंगे। नोकिया और सैमसंग ने अपने नए मोबाइल हैंडसेट पर यह सेवा शुरू करने की बात कही है।
दूरसंचार विभाग उन आयातित मोबाइल हैंडसेटों पर रोक लगाने के लिए तैयार है, जिन पर रेडिएशन उत्सर्जन का स्तर नहीं दर्शाया गया है।
विभाग का कहना है कि हैंडसेट की पैकेजिंग पर उत्सर्जन स्तर लिखा होना चाहिए। इसके अलावा दूरसंचार विभाग में यह बात काफी लंबे समय से चल रही है कि वे रेडिएशन स्तर का पता लगाने वाली इकाई टर्म को शक्तियां दें।
इसके तहत वे बाजार या फिर कंपनियों के पास से तय सीमा का उल्लंघन करने वाले हैंडसेटों को जब्त करें। अभी तक टर्म के पास ऐसी ताकत नहीं है। इसके लिए टेलीग्राफ अधिनियम में संशोधन कराने की बात है। दूसरी तरफ सरकार के निर्देश के अनुसार नए मोबाइल हैंडसेट में *#07# डायल कर रेडिएशन का स्तर पता लगाने का प्रस्ताव है।
अभी *#07# डायल कर हैंडसेट का पहचान नंबर यानी आईएमईआई नंबर का पता लगाया जाता है। आईएमईआई नंबर से मोबाइल फोन ग्राहक का पता-ठिकाना खोजा जा सकता है। विभाग के मुताबिक अब *#07# डायल कर अगर रेडिएशन तय स्तर से ज्यादा पाया जाता है तो इसकी शिकायत विभाग से की जा सकती है।
नोकिया और सैमसंग अपने नए हैंडसेट में यह सुविधा देने की बात कर रहे हैं। अभी मोबाइल हैंडसेट कंपनियों का रेडिएशन यानी एसएआर स्तर 1.6 वाट प्रति किलोग्राम है। एसएआर यानी स्पेशीफिक एर्ब्सोपशन रेट वह दर होती है, जो बताती है कि आखिर हमारा शरीर कितनी मात्रा में रेडिएशन किरणों को ग्रहण कर सकता है।
देश में पहले एक व्यक्ति के लिए रेडिएशन एसएआर स्तर छह मिनट के अंदर दो वाट प्रति किलोग्राम था, जिसे पिछले साल घटाकर 1.6 वाट प्रति किलोग्राम कर दिया गया।
शेष देशवासी इन्हें चिंकी और चीनी कह कर चिढ़ाने में जरा भी संकोच नहीं करते। चीन इनके इलाके पर अपना दावा ठोंकता है। पर इनकी जड़ें तो भारत के महान धर्मग्रंथों रामायण-महाभारत में हैं। ये वही जगह है जहाँ से भगवान श्री कृष्ण अपनी प्रेमिका रुक्मिणी को ले भागे थे| मथुरा से 1500 किलोमीटर दूर भारत-चीन बॉर्डर पर थी श्रीकृष्ण की ससुराल| इन्टरनेट का दौर है अब मथुरा और चीन-भारत के बॉर्डर में दूरी नहीं बची है| देखिये और पढ़िये रोचक हजारो साल पहले का वाकया-

ये खुद को भगवान श्रीकृष्ण की महारानी रुक्मणी का वंशज मानते हैं। अपनी जीवित परंपराओं, पुरातात्विक अवशेषों के रूप में इस बात के दृढ़ प्रमाण भी देते हैं। यह वे लोग हैं जिन्हें देश में सर्वप्रथम सूर्योदय का दर्शन प्राप्त होता है।

अरुणाचल प्रदेश की 54 जनजातियों में से एक मिजो मिश्मी जनजाति खुद को भगवान कृष्ण की पटरानी रुक्मिणी का वंशज मानती है। दंतकथाओं के अनुसार रुक्मिणी आज के अरुणाचल क्षेत्र स्थित भीष्मकनगर की राजकुमारी थीं। उनके पिता का नाम भीष्मक एवं भाई का नाम रुक्मंगद था। जब भगवान कृष्ण रुक्मिणी का अपहरण करने गए तो रुक्मंगद ने उनका विरोध किया। दोनों में भीषण युद्ध हुआ।
अरुणांचल प्रदेश के भीष्मकनगर में राजा भीष्मक के किले का भग्नावशेष आज भी मौजूद है। यह नगर राज्य के दिबांग घाटी जिले में रोइंग से करीब 29 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। भीष्मकनगर किला मिश्मी जनजातियों का प्रमुख तीर्थ है।

परमवीर रुक्मंगद को पराजित करने के लिए कृष्ण को अपना सुदर्शन चक्र निकालना पड़ा। यह देख रुक्मिणी ने कृष्ण से अनुरोध किया कि वे उनके भाई की जान न लें, सिर्फ सबक सिखाकर छोड़ दें। तब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र को रुक्मंगद का आधा मुंडन करने का आदेश दिया। मिजो मिश्मी जनजाति के पुरुष आज भी अपनी केशभूषा वैसी ही रखते हैं।
यहां एक अन्य दर्शनीय स्थान है मालिनी-थान मन्दिर। रुक्मिणी से विवाह करके लौटते समय श्रीकृष्ण ने वहीं विश्राम किया था। इसी स्थान पर भगवान शंकर और पार्वती ने नव-दम्पत्ति को आशीर्वाद दिया था। पार्वती जी ने उन्हें फूलों की माला दी थी और श्री कृष्ण ने खुश होकर पार्वती को नाम दिया मालिनी। तभी से इस स्थान को मालिनीथान के नाम से जाना जाता है।

तिरप जिले के कुछ लोग आज भी वैष्णव हैं। यहां विभिन्न देवी-देवताओं के मन्दिर तथा टूटे हुए अवशेष आज भी मौजूद हैं। पुरातत्व विशेषज्ञों का यह मानना है कि 15वीं सदी में गुरुनानक जी इस क्षेत्र में आए थे। उनके पदचिन्ह मेचुका में संजोकर रखे गए हैं।

बौद्ध काल में अरुणाचल प्रदेश पर इस धर्म का भी प्रभाव पड़ा। लाजेला गोंपा, पश्चिमी कामेंग में तेरह सौ (1300) वर्ष पुराना और तवांग में चार सौ (400) वर्ष पुराना बुद्ध मन्दिर इस बात के गवाह हैं।
रांची। महाभारत की कथा के अनुसार जब वनवास काल में जब पांडवों का घर षडय़ंत्र के तहत जला दिया गया तो वे वहां से भागकर एक दूसरे वन में गए, जहां हिडिंब राक्षस अपनी बहन हिडिंबा के साथ रहता था। एक दिन हिडिंब ने अपनी बहन हिडिंबा से वन में भोजन की तलाश करने के लिये भेजा और इसी दौरान राक्षसी हिडिंबा को भीम से प्रेम हो गया। इस कारण उसने पूरे परिवार को जीवित छोड़ दिया। गुस्साए हिडिंब ने पाण्डवों पर हमला कर दिया पर भीम के हाथों मारा गया। हिडिंब की मौत के बाद हिडिंबा और भीम का विवाह हुआ। इन्हें घटोत्कच नामक पुत्र हुआ, जो अत्यंत बलशाली था।

हिडिंब राक्षस जहां राज करता था, जहां हिडिंबा का भीम से विवाह हुआ और काफी समय तक पांडवों ने वहां वनवास का समय बिताया, वह स्थान आज भी है। वहां के निवासी आज भी खुद को हिडिंबा राक्षसी का वंशज बताते हैं, उनकी जीवनशैली में उसकी परंपरा के अंश झलकते भी हैं।

भारत के पूर्वोत्तर में स्थित राज्य नागालैंड में एक शहर डीमापुर को कभी हिडिंबापुर के नाम से जाना जाता था। यहां बहुलता में रहनेवाली डिमाशा जनजाति खुद को भीम की पत्नी हिडिंबा का वंशज मानती है। वहां आज भी हिडिंबा का वाड़ा है, जहां राजवाड़ी में स्थित शतरंज की ऊंची-ऊंची गोटियां पर्यटकों के आकर्षण के केंद्र मानी जाती हैं। कहते हैं कि इन गोटियों से हिडिंबा और भीम का बाहुबली पुत्र घटोत्कच शतरंज खेलते थे।
कथा है कि हिडिम्ब के मरने पर वे लोग वहां से प्रस्थान की तैयारी करने लगे, इस पर हिडिम्बा ने पांडवों की माता कुन्ती के चरणों में गिर कर प्रार्थना करने लगी, “हे माता! मैंने आपके पुत्र भीम को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया है। आप लोग मुझे कृपा करके स्वीकार कर लीजिये। यदि आप लोगों ने मझे स्वीकार नहीं किया तो मैं इसी क्षण अपने प्राणों का त्याग कर दूंगी।” हिडिम्बा के हृदय में भीम के प्रति प्रबल प्रेम की भावना देख कर युधिष्ठिर बोले, “हिडिम्बे! मैं तुम्हें अपने भाई को सौंपता हूँ किन्तु यह केवल दिन में तुम्हारे साथ रहा करेगा और रात्रि को हम लोगों के साथ रहा करेगा।”

हिडिंबा इसके लिये तैयार हो गई और भीमसेन के साथ आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगी। एक वर्ष व्यतीत होने पर हिडिम्बा का पुत्र उत्पन्न हुआ। उत्पन्न होते समय उसके सिर पर केश (उत्कच) न होने के कारण उसका नाम घटोत्कच रखा गया। वह अत्यन्त मायावी निकला और जन्म लेते ही बड़ा हो गया।
हिडिम्बा ने अपने पुत्र को पाण्डवों के पास ले जा कर कहा, “यह आपके भाई की सन्तान है अत: यह आप लोगों की सेवा में रहेगा।” इतना कह कर हिडिम्बा वहां से चली गई। घटोत्कच श्रद्धा से पाण्डवों तथा माता कुन्ती के चरणों में प्रणाम कर के बोला, “अब मुझे मेरे योग्य सेवा बतायें।? उसकी बात सुन कर कुन्ती बोली, “तू मेरे वंश का सबसे बड़ा पौत्र है। समय आने पर तुम्हारी सेवा अवश्य ली जायेगी।” इस पर घटोत्कच ने कहा, “आप लोग जब भी मुझे स्मरण करेंगे, मैं आप लोगों की सेवा में उपस्थित हो जाउँगा।” इतना कह कर घटोत्कच वर्तमान उत्तराखंड की ओर चला गया। इसी घटोत्कच ने महाभारत के युद्ध में पांडवों की ओर से लड़ते हुए वीरगति पायी थी।

हिडिम्ब का शहर दीमापुर प्राकृतिक रूप से बहुत ख़ूबसूरत होने के साथ-साथ एक ऐतिहासिक शहर भी है। दीमापुर नाम का एक और अर्थ भी निकाला जाता है। यह तीन शब्दों दी, मा और पुर से मिलकर बना है। कचारी भाषा के अनुसार दी का अर्थ होता है नदी, मा का अर्थ होता है महान और पुर का अर्थ होता है शहर।

यहां पर कचारी शासनकाल में बने मन्दिर, तालाब और किले देखे जा सकते हैं। इनमें राजपुखूरी, पदमपुखूरी, बामुन पुखूरी और जोरपुखूरी आदि प्रमुख हैं।
अयोध्या: विराजमान रामलला के स्थान पर मंदिर व अधिग्रहीत परिसर के दक्षिण-पश्चिम में मस्जिद निर्माण का प्रस्ताव किया गया है। इस प्रस्ताव को अयोध्या फैजाबाद के लोगों के सामने 19 मई शनिवार से हस्ताक्षर के लिए प्रस्तुत किया गया। इसमें दोनों समुदायों के दस हजार लोगों के हस्ताक्षर से समर्थन के बाद अधिग्रहीत परिसर के रिसीवर मंडलायुक्त को सौंपा जाएगा। इसके बाद प्रस्ताव राज्य सरकार के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में पेश किया जाना है।
उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति पलोक बसु की पहल पर पिछले ढाई वर्ष से दोनों समुदायों के लोगों की बैठकों के माध्यम से इसका प्रयास चल रहा था। उल्लेखनीय है कि श्रीरामजन्मभूमि निर्माण सेवा समिति अध्यक्ष महंत जनमेजय शरण की अध्यक्षता व न्यायमूर्ति पलोक बसु के संयोजन में एक सप्ताह पूर्व 12 मई को समाधान समिति की बैठक में प्रस्ताव को पढ़कर सुनाया गया। बैठक में मौजूद दोनों समुदायों के लोगों ने प्रस्ताव पर सहमति जताई। दूसरी ओर करीब 70 एकड़ में फैले अधिग्रहीत परिसर में ही मंदिर के साथ-साथ दक्षिणी-पश्चिमी ओर मस्जिद बनाने का प्रस्ताव स्वीकृत किया गया है। इस प्रस्ताव के पहले बिंदु में कहा गया है कि इसमें अयोध्या-फैजाबाद के लोग ही शामिल हो सकेंगे। बाहरी व्यक्ति, संस्था आदि की इसमें कोई भागीदारी स्वीकार नहीं की जाएगी। विराजमान रामलला स्थल पर मंदिर निर्माण का कोई भी पंथ या व्यक्ति विरोध नहीं करेगा। अयोध्या विवाद समाधान के चार सूत्रीय प्रस्ताव को समाधान संबंधी समिति की मंजूरी भी मिल चुकी है।
न्यायमूर्ति पलोक बसु ने बैठक में कहा था कि अब अयोध्या विवाद का हल यहां के लोगों के हाथों में हैं। वे सामने आकर अपने अधिकारों का प्रयोग कर इस विवाद को हमेशा के लिए समाप्त कर दें।
Posted on : 18-05-2013 | By :
जेएनआई डेस्क | In :
FEATURED
Posted on : 18-05-2013 | By :
पंकज दीक्षित | In :
Delhi, FEATURED
0