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ओ जाने वाले, हो सके तो लौट के आना, न आना तो मनचाही पोस्टिंग पा जाना!

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Posted on : 13-01-2013 | By : जेएनआई डेस्क | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

पक्की खबर है कि कड़क और हनक रखने वाले अपने जिलाधिकारी जी पुनः लंबी छुट्टी पर चले गए हैं। अपने एक साल से भी कम समय में जब जब जिलाधिकारी जी छुट्टी पर गए। विध्न संतोषियों ने यही खबर उड़ायी और उड़वायी। अब गए अब वापसी नहीं। परन्तु साहब बहादुर इन विध्न संतोषियों की छाती पर पुनः दाल दलने के अंदाज में उसी हनक और ठसक के साथ लौट आए। लोग फिर अपने अपने अंदाज में उल्टी गिनती गिनने लगे।

इस बार छुट्टी पर नहीं स्थायी रूप से जाने की बात है। अपने अपने दरबारों में ही नहीं कंपिल से लेकर खुदागंज और मदनपुर मुहम्मदाबाद से लेकर शमसाबाद, अमृतपुर, राजेपुर, नबावगंज, कमालगंज तक ही नहीं फतेहगढ़ फर्रुखाबाद बढ़पुर के हर गांव गली बाजारों में केवल एक ही चर्चा है। अब गए, अब वापसी नहीं होगी। अभी बड़े दिनों की छुट्टी में तो गए ही थे। उससे पहले भी गए थे। नेती के सबसे बड़े दरबार में तो रामराज्य की वापसी जैसा वातावरण बन गया है। कुछ चमचों ने तो मिष्ठान वितरण तक करवा दिया। लगभग बाईस वर्ष पहिले भी सायकिल सिंहों ने तत्कालीन जिलाधिकारी के स्थानांतरण पर ऐसे ही तेवर दिखाए थे। क्योंकि जिला अधिकारी ने जिले भर में व्याप्त ठेके पर खुली सामूहिक नकल की बीमारी पर नकेल डाल दी थी। सायकिल सिंहों को अपनी बादशाहत पर खतरा नजर आने लगा था। सायकिल सिंहों ने तब भी यही समझा था। स्थानांतरण के खेल में वह जीत गए। परन्तु तबके अविभाजित जिले में स्थानांतरित जिलाधिकारी को पूरे एक सप्ताह जनता के द्वारा जो जीवंत भाव भीनी विदाई मिली। उसकी बाद में अभी तक कोई दूसरी मिसाल नहीं है।

जानकार लोगों का कहना है कि इस बार भी तमाम छोटी बड़ी बातों के साथ ही मामला दो माह बाद होने जा रही परीक्षाओं को लेकर ही है। परीक्षाओं में अगर ठेके पर खुली सामूहिक नकल का खेल बंद हो गया। तब फिर साल भर शिक्षा माफिया और मीडिया का लुकाछिपी का खेल कैसे चल पाएगा। नहीं समझे समझने की कोशिश करो। इसी लिए नेता इस बार विशेष रूप से सावधान है। अपने आप सफाई देने लगते हैं। सोते सोते बुदबुदाने लगते हैं। नहीं नहीं हम ट्रांसफर पोस्टिंग के लफड़े में नहीं पड़ते। जो भी आएगा जाएगा हमारे काम तो करेगा।

परन्तु जब नेती नेता यह देखता है कि उसकी बात का सुनने वाले पर कोई विशेष असर नहीं पड़ रहा। तब वह धीरे से रहस्य बताने के अंदाज में कहता है। अरे नहीं भाई। लोगों का क्या चाहें जो कुछ कहें। सवाल जाने का नहीं है। अच्छी पोस्टिंग का है। क्या रखा है सवा दो तहसीलों वाले इस जिले में। फिर और धीरे बोलता है-

झांसी गले की फांसी दतिया गले का हार,
ललितपुर न छोड़िए जब तक मिले उधार!

छोटे सिंह उर्फ सहकारिता सिंह!

सहकारिता विभाग के एक बहुत बड़े अधिकारी सपा के एक बहुत बड़े सिंह की तगड़ी झाड़ खाने के बाद रुआंसे अंदाज में बताने लगे। हम क्या करें भइया! हमारी समझ में ही नहीं आता। सहकारिता के जिले में हुए चुनावों में सपा के एक बहुत बड़े सूरमा ने हमें पटक पटक कर मारने के अंदाज में बुरी तरह से डांटा। स्वयं तो वह अपने पूरे जोड़ तोड़ के बाद भी सहकारिता चुनाव में कुछ अपने पक्ष में कर नहीं पाए। हम पर खुले आम एक तरफा पक्षपात का आरोप लगाकर कड़ी कार्यवाही करवाने का भय दिखाने लगे। यह तो वही बात हो गई कि घोड़े पर बस नहीं चला और लगे लगाम मरोड़ने। अब बात आपको बुरी लगे तब फिर हम क्या करें। जिले में सहकारिता सिंह का मतलब है छोटे सिंह। जिले में सहकारिता के इस चक्रव्यूह या शंकर जी के धनुष चाहें जितने जतन करो, मंत्री रहो चाहे संत्री रहो तोड़ नहीं पाओगे। ऐसे में हम क्या करेंगे। कमल सिंह हाथी सिंह या हाथ सिंह सहकारिता के इसी मिनी ओलंपिक में इसी लिए हाथ ही नहीं डालते।

पूरे प्रदेश में सहकारिता भले ही सपा कार्यालय बनी हो। परन्तु जिले में सहकारिता सिंह का मतलब है छोटे सिंह। यहां सपा सिंह चाहें गरजें बरसें कोई कला किसी की चलने वाली नहीं। छोटे सिंह चाहें हाथी सिंह बने या हाथ सिंह। वह चाहें लोक सभा विधानसभा का चुनाव जीतें या हारें। परन्तु सहकारिता चुनाव में उनकी कोई सानी नहीं है। सहकारिता में छोटे सिंह बड़े बड़े सिंहों और सपा सिंहों के छक्के छुड़ा देते हैं। सही ही कहा है-

इस सादगी पर कौन न मर जाए ए खुदा,
लड़ते हैं मगर हाथ में तलवार भी नहीं।

विवेक आनंद हास्य और प्रेम- इन्हें अपनाकर तो देखो!

इस बार स्वामी विवेकानंद वर्ष भर याद किए जायेंगे। अगले वर्ष 11 जनवरी को हास्य दिवस पुनः मनायेंगे। हर पंथ मजहब सम्प्रदाय हमें प्रेम का ही तो उपदेश देते हैं।

प्रेम है जीवन हमारा प्रेम प्राणाधार है,
प्रेम ही सुख शांति का सच्चा सबल आधार है।

परन्तु हम जयन्तियां पुण्य तिथियां संकल्प दिवस के बल मनाते हैं। मनाते नहीं। हमारे आज के सारे कष्टों चाहें वह पारिवारिक सामाजिक, राजनैतिक हों प्रादेशिक हों या राष्ट्रीय कारण यही है कि हम प्रेम और उन्मुक्त हंसी को भूल गए। कितनी भी विपरीत परिस्थितियां हों। हम हंसना मुस्कराना अवसर के अनुरूप खिलखिलाना और आपस में प्रेमभाव से रहना न छोड़ें। सच मानिए हमारी सच्ची हंसी और प्रेमभाव हमें सहज रूप से सफलता के मार्ग पर ले जाएगा। प्रेम या उसे विवेक और आनंद का रूप मान लीजिए। उसमें निर्मल हंसी का भाव दे दीजिए। हमारे सारे छल कपट द्वेष दंभ, पाखंड आदि को स्वतः भस्मीभूत कर देंगे। बात उपदेश या प्रवचन की नहीं है। बात केवल और केवल स्वयं ही सोचने विचारने और अपनाने की है। हमारा जागृत विवेक हमें शास्वत आनंद के मार्ग पर ले जाएगा। आओ उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक सक्रिय रहो। फिर कहता हूं इन्हें मनाओ नहीं। मन वचन कर्म से अपनाओ। अन्यथा-

दीप इनके जले दीप उनके जले वर्तिका आदि से अंत तक जल गई,
राम तुमने कहा राम हमने कहा राम की जो कथा थी सपन बन गई।

हमने तुमने राम कहा माना नहीं। इनके उनके दीप जले। परन्तु मन के दीप नहीं जले। आइए! विवेकानंद जी स्मृति में मन के दीप जलायें।

सबको अपना गणित याद है!

दुर्भाग्य ही है कि राजनीति की तुलना शैतानियत से होने लगी है। यदि ऐसा न होता तब फिर आधे के लगभग मतदाता मतदान से अरुचि नहीं दिखाता। इससे भी अधिक दुर्भाग्य पूर्ण यह है कि किसी भी पार्टी का बड़े से बड़ा नेता यह अपील करने की हिम्मत नहीं दिखाता। मतदाता किसी को भी मतदान करें। परन्तु मतदान अवश्य करें।

एक बहुत बड़ी पार्टी के बहुत बड़े नेता पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में कह रहे थे। जिसका जो व्यवसाय व्यापार है। वह उसे जीवन भर करता है। परन्तु हम राजनीतिज्ञों को हर चुनाव में अपने काम का नवीनीकरण कराना पड़ता है। हम अपने कार्यकाल में कितना भी अच्छा कार्य क्यों न करें। उनके कहने का मतलब यही था कि असली सफलता केवल और केवल चुनाव जीतने में है। इसके अतिरिक्त किसी में नहीं। वोट बैंक की राजनीति का सही मतलब है। जातिवाद की निकृष्ट राजनीति। इसके आगे चुनाव सुधार दागियों को मैदान में न उतारने मतदान का प्रतिशत बढ़ाने आदि की सब बातें व्यर्थ बेमतलब और बेकार हैं।

नए साल के साथ ही लोक सभा चुनाव की गतिविधियां जोर पकड़ने लगी हैं। बातें कुछ भी हों मकसद लक्ष्य चुनाव जीतने सरकार बनाने तक ही सीमित है। मतदान कम हो न हो। चुनाव सुधार हों न हों। वास्तव में दागी मैदान में न उतारे जायें। इससे किसी को कुछ भी लेना देना नहीं है। सबके गणित साफ हैं। सबको अपने गणित याद हैं। भाजपा मोदी को राजधर्म की सारी नसीहतें भूलकर जिताऊ घोड़ा मानकर चुनाव रण संग्राम के नेतृत्व के लिए तैयार कर रही है। कांग्रेस को राहुलगांधी से अधिक आगे पीछे कुछ दिखता ही नहीं है। गुणगान चाहें जिसका चाहें जितना करो। परन्तु हकीकत यही है कि वर्तमान में महात्मागांधी, राहुलगांधी तथा दीनदयाल उपाध्याय, नितिन गड़करी में चुनावी नायक या प्रत्याशी राहुलगांधी नितिन गड़करी या फिर नरेन्द्र मोदी को ही बनाया जाएगा। लोकतंत्र के अतीत और वर्तमान के अंतर को भविष्य में पाटा जा सकता है। यदि हम सब एक जुट होकर खड़े हो जायें। निष्पक्ष और निर्भीक होकर मतदान हर हाल में करने का संकल्प करें।

और अंत में……

अधिवक्ताओं के चुनाव

अधिवक्ता संघ का चुनाव हो चुका है। लंबे समय के बाद काफी जद्दो जहद खींचतान के उपरांत बार एसोसिएशन टैक्स बार एसोसिएशन के चुनाव भी इसी माह सम्पन्न हो जायेंगे। क्या होता रहा। क्यों होता रहा। इस पर चर्चा अब बेमानी है। आप समाज के मार्गदर्शक हैं। कानून के ज्ञाता हैं व्याख्याकार हैं। आपको जिन्हें चुनना है। अपना नेता बनाना है। उन लोगों के बीच आप प्रतिदिन रहते हैं। निष्पक्ष और निर्भीक होकर अपने प्रतिनिधियों को चुनने का साहस दिखाकर औरों के लिए मिसाल कायम करिए। ध्यान रखिए आजादी की लड़ाई के अनेक महानायक आपके ही समाज के थे। नए साल में विश्वास करना चाहिए कि सदर तहसीलवार एसोसिएशन के चुनाव हो जायेंगे।

चलते चलते………..

व्यापारियों के सम्बंध में कहा जाता है कि उन्हें दो पैसे का फायदा होता हो तो, वह मिट्टी को सोना बनाने और बताने के लिए जमीन आसमान एक कर देंगे। अब यही बात राजनीतिज्ञों पर भी लागू होने लगी है। दुनिया के चुनिंदा रईसों में शुमार मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी ने नरेन्द्र मोदी को महात्मागांधी और जाने क्या क्या बना दिया। अब बारी नए महात्मागांधी उर्फ नरेन्द्र मोदी की है। देखना है वह कब अंबानी बंधुओं को जमनालाल बजाज और घनश्यामदास बिड़ला बताते हैं। हे महानुभावों, आपका अपना निर्णय है, परन्तु यह क्यों भूल जाते हो कि पूज्य बापू ने ही कहा था महान लक्ष्य अच्छे और सच्चे साधनों से ही प्राप्त करने चाहिए। विभिन्न घोटालों के उजागर होने पर अंबानी बंधुओं के माध्यम से कथित रूप से यह बात सामने आई थी। रिलायंस वाले भाजपा और कांग्रेस दोनो को अपनी जेब में रखते हैं।

कभी सदी के महानायक के होर्डिंग से यूपी का हर नगर मीडिया पटा पड़ा था। आज यही खेल गुजरात में चल रहा है। बड़े लोगों की बड़ी बातें हैं। परन्तु हैं तो यह लोग भी हाड़मांस के प्राणी। गरीब किसान मजदूर नौजवानों के बीच से पाई गई अपार लोकप्रियता के बल पर अकूत धन के खातिर यह खेल हो रहे हैं। पैसा पैसा पैसा। यदि सदी के महानायक का भी यही लक्ष्य है। तब फिर हम आप क्या कर सकते हैं। कभी दिल्ली से लेकर यूपी के सम्मेलनों में सर पर पल्ला खींच कर मुलायम सिंह यादव को अपना जेठ (पति का बड़ा भाई) बताने वाली जया बच्चन को अपने पति के सक्रिय सहयोग से नरेन्द्र मोदी के रूप में देवर (पति का छोटा भाई) मिल गया है। अब मुलायम और मोदी में कौन श्रेष्ठ और अनुकरणीय है। यह बात लोकसभा चुनाव से पहले या बाद में तय होगी। क्योंकि दोनो ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदबार हैं। यूपी में अनिल अंबानी का बिजली घर भी लग रहा था। वह सपा से राज्यसभा सदस्य भी बने थे। क्या कहेंगे आप इसे। कहने को बहुत कुछ है। परन्तु जब तक आप निष्पक्ष और निर्भीक होकर मतदान करना नहीं सीखेंगे। तब तक होना कुछ नहीं है। महात्मागांधी कहते थे ‘‘हर आंख का आंसू पोंछना होगा तभी जनतंत्र आएगा।’’ आज हम सब असहाय होकर जनतंत्र को धनतंत्र में बदलते देख रहे हैं। यदि हम आप सब अब भी निष्पक्ष और निर्भीक होकर मतदान करने वालों की जमात में शामिल नहीं हुए। तब फिर न तो हमें महात्मागांधी कभी माफ करेंगे। नहीं हमारी आगे आने वाली पीढ़ियां। आज बस इतना ही। जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट

फर्रुखाबाद परिक्रमा – अपनों ने अपनों को ही दे मारा- न कोई जीता न कोई हारा!

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Posted on : 06-01-2013 | By : जेएनआई डेस्क | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

अपनों ने अपनों को ही दे मारा- न कोई जीता न कोई हारा!

पंचायतों के चुनाव लोकतंत्र के मजाक बनकर रह गए हैं। जहां से भी शुरू करोगे। अंत धनबल बाहुबल और शासन प्रशासन के बेशर्मी पूर्ण सहयोग असहयोग पर ही होगा। रही बात जश्न मनाने की, सत्ता के नशे में पांच साल बसपाई यही तो करते रहे। वही आज सपाई कर रहे हैं। आंखें बंद कर लो। कुछ दिखेगा ही नहीं।

सही बात यह है कि हमारे लोकतंत्र में दिन प्रतिदिन लोक का अभाव होता जा रहा है। तंत्र हावी होता जा रहा है। बढ़पुर विकासखण्ड में 62 बीडीसी हैं। इसमें से 27 बीडीसी ने मतदान में ही हिस्सा नहीं लिया। 35 ने मतदान किया तीन मत निरस्त हो गये। सपा के जीते प्रत्याशी को मात्र 21 (कुल मतदाताओं के लगभग एक तिहाई) मत मिले। जश्न मनाना आपके हाथ में है। कोई आपको रोक तो सकता नहीं। परन्तु यह लोक नहीं तंत्र तिकड़म धौंस, धमकी और दबाव का ही खेल है। वास्तविकता को उजागर करने के स्थान पर मीडिया भी बेशर्मी से हिस्से का मखमली रूमाल में सहेज कर रखा गया चांदी का जूता पाकर या खाकर इस खेल में अपना प्रभावी योगदान कर रहा है।

जन साधारण से सीधे और प्रति दिन जुड़ी रहने वाली कोई सेवा जब ब्रान्डेड हो जाती है। तब उससे इससे अधिक की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए। ऊपर से नीचे तक नेताओं, नौकरशाहों, ठेकेदारों, माफियाओं को और अधिक निरंकुश भ्रष्ट लंपट, उद्दड बनाने का एक मुश्त ठेका भी तो विज्ञापन के नाम पर लोकतंत्र में सबसे अधिक ताकतवर होते जा रहे मीडिया ने ही ले रखा है। तंत्र और मीडिया तंत्र में अब केवल अपवादों का ही अंतर है। वैसे दोनो का चोली दामन का साथ है। इस जिले में आप खांटी समाजवादी हैं। बगल के जिले में आप खांटी भाजपाई हैं। हमें हमारा नेग दे दीजिए। हम आपकी वैसी ही गायेंगे बजायेंगे। जैसा आप आदेश करेंगे। इससे लोकतंत्र की मर्यादाओं का क्षरण होता है। होता रहे हमारे ठेंगे से। पैसा फेंकते रहो। तमाशा देखते रहो। पैसा हजम तमाशा खतम। क्या समझे नहीं समझे। समझोगे भी नहीं।

वैसे क्रिकेट की भाषा में कहें तो बसपा और सपा के बीच की इस चुनावी सीरीज में जिला पंचायत अध्यक्ष की सुपर शील्ड या ट्राफी जो भी कहो के साथ बसपा सपा से काफी आगे हैं। जब तक सायकिल सिंह हाथी सिंहों से कायमगंज, राजेपुर, शमशाबाद, नबावगंज सहित सुपरशील्ड नहीं जीत लेते तब तक जश्न मनाने का कोई खेल बनता नहीं। लेकिन यदि आपको अपनी नाक कटाकर दूसरों का अपशकुन करने में ही मजा आता है तब फिर आपकी मर्जी।

जनता से सीधे मतदान के बिना पंचायत चुनावों का कोई मतलब नहीं है। यह बात अब दिन प्रतिदिन साफ होती जा रही है। इससे गांवों, विकासखण्डों और जिले के ग्रामीण अंचलों का विकास होने के नाम पर चंद लोगों का ही खेल मजबूत होगा।

रघुकुल रीति के नए व्याख्याकार-

भाजपा आज नरेन्द्र मोदी की गुजरात में शानदार जीत के बाद दिन में ही लोकसभा चुनाव के काफी दूर होने पर भी दिल्ली की कुर्सी के सपना देख रही है। बाबरी विध्वंस के बाद उत्तर प्रदेश में उस समय नरेन्द्र मोदी से भी कहीं अधिक ठसक और हनक रामलला से सीधे बात करने वाले अयोध्या कांड के महानायक कल्याण सिंह की थी। क्योंकि इस मुद्दे ने पूरे राष्ट्र को झकझोर दिया था। वैसे भी उत्तर प्रदेश गुजरात से कई गुना बड़ा है। वही महानायक कल्याण सिंह जी आज कहां हैं। रामराज्य के असली ठेकेदार तो भारतीय जनता पार्टी के लोग ही हैं।

खबर है कल्याण सिंह का बेटा 21 जनवरी को अपनी पार्टी का विलय भाजपा में कर देगा। परन्तु पिता श्री तकनीकी कारणों से भाजपा में नहीं शामिल होंगे। आपको मालूम है कि वह तकनीकी कारण क्या है। हम बताते हैं। यदि कल्याण सिंह जी 21 जनवरी को भाजपा में शामिल हो जायेंगे। तब फिर लोकसभा से उनकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी। यह हैं राम की मर्यादा, सीता की लक्ष्मण रेखा, भारत और इण्डिया नैतिकता चाल चलन चरित्र संस्कारों आदि के वर्तमान व्याख्याकार – फर्क देख लीजिए-
रघुकुल रीति सदा चलि आई
प्राण जायें पर वचन न जाई।

एक बार फिर दोहराते हैं-
एक राम ने सीता छोड़ी एक धोबी के कहने पर,
अबके राम गधा न छोड़ें लाख दुलत्ती सहने पर।

भागवत की नयी भागवत

‘‘शाइनिंग इण्डिया’’ के उदघोषकों ने नहीं उनके संरक्षकों और मार्गदर्शकों ने दिल्ली के जघन्य रेप काण्ड पर एक नई बहस छोड़ दी है। इण्डिया में सब कुछ गलत होता है। इसके मुकाबले भारत बिल्कुल सीधा सादा सरल और दुर्गुण रहित है।

भागवत जी! आपकी भागवत कहां से प्रारंभ करें। अगर आपकी स्वयं की मानसिकता इतनी विक्रत है। तब फिर सामान्य जनों की बात ही छोड़ दीजिए। भारत भारत ही है और भारत ही रहेगा। जब भारत अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। तब आपके पूर्ववर्ती  भारत को इण्डिया कहने वालों की मदद कर रहे थे। जरा यह भी बता दीजिए कि महात्मा गांधी और नाथूराम गोडसे में कौन भारत है और कौन इण्डिया है। अटल जी और अडवाडी जी में कौन इण्डिया है और कौन भारत है। सुषमा स्वराज्य और अरुण जेटली में कौन इण्डिया है और कौन भारत है। नरेन्द्र मोदी और कल्याण सिंह में कौन क्या है। शहनवाज खां और मुख्तार अव्वास नकवी में कौन क्या है। वसुन्धरा राजे और येदुरप्पा में कौन क्या है। दीनदयाल उपाध्याय और नितिन गडकरी में कौन क्या है। सूची बहुत लंबी है। आप भी जानते हैं। हम भी जानते हैं। जनता सब कुछ जानती है। अब आपका अयोध्या में मंदिर निर्माण का सपना संकल्प कहां। मोदी का शहरी ग्लोबल विकास और स्वदेशी का नारे के बीच इण्डिया और भारत कहां है।

आप स्वघोषित महान हैं। आपकी रेखायें लक्ष्मण रेखायें हैं। राम की बात मत करिए। आपकी कथनी और करनी का फर्क तो लंकापति रावण से भी अधिक प्रतीत होता है। नारी सीता सी पत्नी चाहते हो। तब फिर स्वयं भी तो राम बनने का संकल्प करो। आपके चंगू मंगू उपकृत आपके वक्तव्य पर कुछ भी कहें। परन्तु आपने ऐसा ओछा वयान देकर पूरे देश को अपमानित किया है।

सर्दी ही सर्दी हाय राम यह बेदर्दी

सर्दी में कुड़ता भिगो कर उसे सुखाने के नाम पर आग तापने वालों का जमाना खत्म हो गया। आज हालात पूरी तरह से बदल गए हैं। सर्दी का आलम यह है कि बच्चों से लेकर प्रौढ़ और बूढ़े भी ऊपर से नीचे तक मोजों, टोपों, दस्तानों आदि से ढ़के मुंदे होने और चाय काफी की चुस्कियों, बीड़ी सिगरेट के लंबे कसों और अलावों की गर्माहट के बाद भी सर्दी सर्दी ही चिल्ला रहे हैं। गजब की सर्दी हाय सर्दी, वाह री सर्दी ऐसी सर्दी आज तक नहीं पड़ी। हर जगह सुबह से शाम तक सर्दी और केवल सर्दी की चर्चा। कोई हाथ आपस में रगड़ रहा है। कोई हाथ आग ताप रहा है। हमेशा बेपरवाह रहने वालों के हाथ भी पूर्ण अनुशासन की मुद्रा में जेबों में अंदर हैं।

भुने आलू, उबले अंडे, गर्म मूंगफली, सूखे मेवे, ऊनी कपड़े लत्ते, प्राश केसरी कल्प भांति भांति के सोमरस का भारी उपभोग सर्दी के असर को तोड़ नहीं पा रहा है। स्कूलों, कार्यालयों, सड़कों, बाजारों में सन्नाटा छाया है। हर ओर यही आवाज हाय राम यह बेदर्दी। कभी न देखी ऐसी सर्दी।

और अंत में …………….… पिछले हफ्ते सैफई से सेन्ट्रल हाल और लखनऊ से धीरपुर नगला दीना और आवास विकास तक एक खबर जोर से उड़ी या उड़ायी गई। खबर थी दो पूर्व सांसदों के पुत्र बहुत शीघ्र सपा की सदस्यता ग्रहण करेंगे तथा प्रस्तावित लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी होंगे। नागपुर में प्रदेश के मुख्यमंत्री के मेजवान और फर्रुखाबाद में एक केन्द्रीय मंत्री की पत्नी के आश्रयदाता कांग्रेसी नेता के यहां आयोजित कार्यक्रम में इस बात को लेकर तरह तरह के दावे खुलेआम किए जा रहे थे। कहा जा रहा है कि भाजपा में कल्याण सिंह की कथित वापसी को लेकर धीरपुर नरेश कुछ ज्यादा ही अधीर हो रहे हैं। कल्याण सिंह के खास रहे कुछ स्थानीय सजातीय नेता इस समय विभिन्न दलों में विराजमान हैं वह भी अपनी जोड़ तोड़ में लगे हैं। दोनो पूर्व सांसद पुत्रों में एक अंतर यह है कि एक के विषय में बातें चाहें जितनी उड़ी या उड़ायी गई हों। परन्तु वह रहे अपने स्वर्गीय पिता की पार्टी में। वहीं दूसरे सांसद पुत्र को बसपा छोड़ कर सभी प्रमुख दलों में लंबा समय गुजारने का अच्छा अनुभव है। हाल यह है कि कोई भी इस बात को नकारने या स्वीकार करने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा है।

और अंत में ………...जैसे जैसे व्यापारिक संगठन बढ़े वैसे ही सड़कों पर अतिक्रमण बढ़ा। जाम स्थायी समस्या बन गया। संभवतः पहली बार पुलिस और प्रशासन ने सही और कड़ा कदम उठाया है। अब वाहन, दुकानों के सामने नहीं सड़क के बीचों बीच लंबाई में खड़े किए जायेंगे। नतीजतन ट्रैफिक वनवे हो जाएगा। फुटपाथों पर अतिक्रमण नहीं होगा। यह पुलिस प्रशासन का अच्छा प्रयास है। इसे कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए। दुकानदारों, व्यापार मण्डलों और जनता को इसमें सहयोग करना चाहिए। अतिक्रमण कराने में नहीं अतिक्रमण हटाने में सहयोग करिए। क्योंकि यह शहर जिला हमारा, आपका, सबका है। आज बस इतना ही। जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट

फर्रुखाबाद परिक्रमा- चाची बन गई “चटनी वाली चाची”

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Posted on : 30-12-2012 | By : जेएनआई डेस्क | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

नए वर्ष की दस्तक ! आओ कुछ सोचें, कुछ विचारें- गतिज जड़ता को कैसे तोड़े !
जड़ता जहाँ भी है| हेय है, त्याज्य है| गतिज जड़ता का तो कोई मतलब ही नहीं है| परिवर्तन जीवन का नियम है| अपना आदर्श स्वयं चुनो| अपना आदर्श स्वयं बनो| किसी का सुधार उपहास से नहीं उसे उसे नए सिरे से सोचने और बदलने का अवसर देने से ही होता है|
चीजो को देखने परखने की हमारी द्रष्टि क्या है| सब कुछ उसी पर निर्भर करता है| गिलास में पानी है| गिलास आधा भरा है या गिलास आधा खली है, यह हमारी सोच पर निर्भर करता है|
जिस व्यक्ति को हम आप बहुत ही निक्रष्ट और हेय समझते है| उसमे भी कुछ न कुछ ऐसा होता है जो सीखने और सराहने योग्य है| हमें श्रेष्ठ को चुनने और शेष को छोड़ देने की आदत डालनी होगी|
मनुस्मृति अपने समय का संबिधान है, संबिधान आज की मनुस्मृति है| दोनों में परिवर्तन की जरुरत है और रहेगी| पुराना सब कुछ बुरा नहीं है और नया सब कुछ सही नहीं है| विवेक के तराजू पर निष्पक्ष और निर्भीक होकर नए और पुराने को तौलो| त्याज्य को त्याग दो| स्वीकार्य को स्वीकार लो|
हम जो कुछ जानते है, मानते है| उसके अनुसार चलने से हमको आपको कौन रोक सकता है| कोई नहीं| परन्तु जो हम जानते है, मानते है उसे हम अपनाते नहीं| हम दूसरो को गाली देकर उन्हें निक्रष्ट हेय बताकर अपनी श्रेष्ठता के दंभ डूबे रहना चाहते है| यही है गतिज जड़ता| इसे ही हमें स्वयं अपने प्रयासों से तोडना है, नए वर्ष में हम आपको सबको वह बनना है जो हम आप वास्तव में बनना चाहते है—

अजानी मंजिलो का,
राहगीरों को नहीं तुम भेज देते हो
जकड कर कल्पना इनके पारो की मुक्ति को
तुम छीन लेते हो
नहीं मालूम तुम को है कठिन कितना
बनाये पंथ को तजकर
ह्रदय के बीच से उठते हुए स्वर के सहारे
मुक्त चल पड़ना
नए अलोक पथ की खोज में
गिर गम्भरो से झाड़ियो से झंझटो से
कंकडो से पत्थरो से रात दीन लड़ना
नए आलोक पथ की खोज, भटकने के लिए भी
एक साहस चाहिए
जो भी नए पथ आज तक खोजे गए
हुए इन्सान की देन है |

नव वर्ष में आप गतिज जड़ता को तोड़े, आप अलोक पथ को खोजे, उस पूरे उत्साह उमंग के साथ सतत चलते-चलते अपने लक्ष्य को प्राप्त करें / इसी आशा और शुभकामनाओ के साथ आप सबको नव वर्ष की हार्दिक बधाई |

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हर व्यक्ति बहुत उदास है आज !
साल बीतते-बीतते दिल्ली में गैंगरेप की शिकार जीवन और मृत्यु के बीच लम्बे संघर्स में करोडो लोगो की दुआओं के बाद अंततः हार गई| छात्रा के साथ जो कुछ भी हुआ उसके बाद जीने की बात हो भी कैसे सकती है| इस घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया| लम्बे समय से चली आ रही सामाजिक निर्लज्जता उदंडता दबंगई का शिकार होती चली आ रही देश की आधी आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा इस इस अमानुषिक बर्बर घटना के बाद स्वतः स्फूर्त ढंग से करो या मरो के अंदाज खड़ा हो गया है| तब जाकर कहीं प्रशासन सरकार को स्थिति की गम्भीरता का अंदाजा हुआ| आनन् फानन में हरकत में आये सत्‍ताधारी किंकर्तव्यविमूढ़, गलतिया करते चले गए| महंगाई और भ्रष्टाचार के कष्टप्रद द्वार के बीच आनन फानन में अपने वेतन भत्ते बढा लेने बाली संसद और सांसद समझ ही न पाए की क्या करे| पीडि़ता की मौत के बाद हालात गंभीर हो गए| हर ओर बहुत कुछ कहा सुना जा रहा है| सबकी अपनी कसौटियां और निर्णय हैं| लेकिन एक बात पूर्णतः सही है, कि हर व्यक्ति इस प्रकरण पर बहुत ही उदास हताश निराश है|

हम सब लोकतंत्र में जीते है| बड़ी बड़ी बातें करते है| परन्तु बारूद के ढेर पर टिका बसा हमारा समाज कितना विकृत है| छात्रा से गैंगरेप की घटना ने सरे देश ही नहीं सारी दुनिया के सामने यह स्पष्ट कर दिया| सुबह से रात तक घर आँगन गली मोहल्ले गावं शहरो में होने वाली अमर्यादित अश्लील निंदनीय गैर-जिमेदाराना घटनाओ की अनदेखी की चरम चरम परिणिति है| दिल्ली गैंगरेप की घटना| हम बातें कितनी भी बड़ी बड़ी करें परन्तु हर और आये दिन होने वाली घटनाओ पर हमारा नजरिया कायरता पूर्ण ही रहता है| विरोध करना ही हमारे संस्कारो में नहीं रहा| कौन दोषी है इसके लिए| वह सब लोग जो अपने को बहुत शिक्षित सभ्य योग्य और संस्कारित समझते हैं|
हमारी सबकी जड़ता और उदासीनता को इस घटना ने झकझोरा है, हजारो शिक्षाओ को उपदेशो को नजर अंदाज कर इस एक घटना ने रातो रात हमारे को जगा दिया| अब हम स्वयं से चिंतन और मंथन की स्थिति में आ गए है| पीड़ित छात्रा ने जीवन मृत्यु से संघर्ष करते हुए अपने प्राणों की कीमत पर देश को झकझोरा है जगाया है| उसका ये बलिदान व्यर्थ न जाये| यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है|
इस घटना ने चरम वलिदान के बाद हमको परिपक्व बना दिया है| अन्यथा सरकार हो या नेता किसी को भी हमें कोई नियम कानून कायदे को बनाने समझाने की जरूरत नहीं है क्यों की इन लोगो में न इस बात की पात्रता है और न विश्वसनीयता|
अब हमें नए साल में प्रवेश से पूर्व स्वतः निर्णय कर अपना फैसला लेना होगा, रास्ता बनाना होगा| हमें स्वयं अपने आस पास के माहौल, फिल्मों, टीवी, समाचार पत्रों में जो बातें कार्यक्रम अच्छे नहीं लगते उनकी सूची स्वयं के विवेक से निष्पक्ष व् निर्भीक होकर बनानी होगी| स्वयं ही उन पर फैसला करो| स्वयं ही उन पर अमल करो| यकीं मानो आज की नम आँखों और पीड़ित मन ने साल दस्तक दे रहे साल में अपने स्वयं के निर्णय पर अमल किया तभी बीत रहे साल का कलुषित विकृत निंदनीय कलंक हमारे माथे से पुछ पायेगा|
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शाहखर्च जनप्रतिनिधि
देश में गरीबी है, गरीबी है, भ्रष्टाचार का बोल बाला है, तमाम समस्यायें है| परन्तु हमारे जनप्रतिनिधि सरकारों के मुखिया नौकरशाह इन सबसे बेपरवाह है| उन्हें अपनी शानौशौकत फिजूलखर्ची को लेकर कोई चिंता नहीं है| आजादी के साथ ही सत्तारूढ़ हुई कांग्रेस कुर्सी पर आते ही सादगी और उच्च विचारो को छोडती चली गई| फिजूलखर्ची शानशौकत और दिखावे के नित नए कीर्तिमान बनते चले गए| इन्ही के गर्भ से भ्रष्टाचार के नए नए कारनामे उजागर होते चले गए| पुराने कांग्रेसी रहे तब तक कुछ लाज शर्म बची रही| अब तो जितने ठाठ बात से रहे उतना ही बड़ा नेता|

परन्तु कांग्रेस के इस चकाचौंध भरे खेल में अपने आपको पार्टी विद द डिफ़रेंस गाने वाली भाजपाई सत्ता के गलियारे में प्रवेश करते ही बड़ी खिलाडी बन गयी| भ्रष्टाचार के प्रकरणों से कांग्रेस और भाजपा के नेता बुरी तरह घिरे हुए हैं| प्रांतीय क्षेत्रो के खेल भी आये दिन चौकांते है| एक भाजपाई मुख्यमंत्री अपने राज्य स्थापना दिवस समारोह में दस मिनट मिनट के एक नृत्य पर एक करोड़ से अधिक रूपए लुटा देते है| वही सारी दुनिया में सीएम नहीं भाजपा के भावी पीएम बनने की भी सुर्खिया बटोरने बाले एक सादगी पसंद संघ से स्वयं सेवक से मुख्यमंत्री बनने बाले नेता जी पूरे एक सौ पचास करोड़ रूपए खर्च करके अपना नया कार्यालय बनाया है| पंचमूर्ती के नाम से पैंतीस हजार वर्ग फीट बने इस चार मंजिला दफ्तर कौन क्या करेगा| यह समझ पाना आसान नहीं है| निश्चय ही महात्मा गाँधी, लाल बहादुर शास्त्री, गुलजारी लाल नंदा, मोरार जी देसाई,चन्द्रभानु गुप्ता, दीनदयाल उपाध्याय, सरदार पटेल, डा० लोहिया जैसे अनगिनत नेता अपने अपने वर्तमान उत्तराधिकारियो की इस वेहिसाब तरक्की पर खुश हो रहे होंगे| सादगी समर्पण का प्रतिमूर्ति कहे जाने बाले राष्ट्रीय स्वयं संघ के हजारो पूर्णकालिक स्वयं सेवक अपने इस पुराने साथी के क्रांतिकारी परिवर्तन पर आश्चर्य चकित होंगे| सादा जीवन उच्च विचार में रक्खा क्या है| तामझाम झांपा फिजूलखर्ची जिंदाबाद|

अंत में –

भीषण सर्दी है –सभी के सभी बेहाल है कम्बल बंटे कि नहीं, अलाव जले कि नहीं| हर ओर इसी बात की चर्चा है| सर्दी के बचाव में भी गरीबी अमीरी का फर्क साफ़ सामने दिखाई देता है| इण्डिया और हिंदुस्तान भी यहीं है| सर्दी बचाने के हर तरह के सामानों का टीवी समाचार पत्रों में घनघोर विज्ञापन है| इसके चलते उपभोक्ता सामानों की कीमत बेतहासा बढ़ रही है|
परन्तु हमारे गली मोहल्लो में रहने बसने वाली दादियो बुआओ चाचियो के सर्दी बचाओ ही नहीं सर्दी भगाओ नुस्खे कम कीमत पर और बेहतर फायदे के बल पर अब भी अपना महत्व बनाये हुए है| दादी का सोंठ मिला गर्म दूध, महिलाओ को प्रसव के समय दिया जाने वाला हरीरा किसी प्राशकल्प से बेहतर है| कीमत भी बहुत कम| बुआ की मेथी की सब्जी, गुड और बाजरे की रोटी की जबरदस्त धूम है| धनिया लहसुन टमाटर आदि मिलाकर बनाई जाने वाली चटनी तो आस पास के मोहल्ले में ऐसी छा गई कि चाची “चटनी वाली चाची” बन गई|

और चलते चलते ….
प्रधानमंत्री जी! गृहमंत्री जी ! बड़े पदों पर हो| सोंच भी बढ़ाईए| आपकी अपनी तीन बेटियां ही नहीं है| इस देश की सारी बेटियां आपकी ही है| नए वर्ष में हम सब इसी सोच के साथ प्रवेश करे| आज बस इतना ही जय हिन्द !
सतीश दीक्षित
एडवोकेट

फर्रुखाबाद परिक्रमा- हिम्मत हो तो मोदी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाओ, प्रधानमंत्री तो बन ही जायेंगे

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Posted on : 23-12-2012 | By : जेएनआई डेस्क | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

निश्चय ही गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने शानदार इतिहास रचा है। मोदी लोकप्रियता की उत्ताल तरंगों पर तैर रहे हैं। अच्छी बात है। मौका है, दस्तूर भी है। मीडिया की राजनैतिक विश्लेषकों की अपनी अपनी व्याख्यायें हैं। उन्हें अपने अपने सोंच के हिसाब से गृहण करने वाले हैं। यहां तक सब कुछ ठीक है। देश के किसी भी मुख्यमंत्री ने आज तक इतनी बड़ी उपलब्धि इतने शानदार तरीके से शायद ही पायी हो। परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में मोदी की इस शानदार जीत के जो मतलब निकाले जा रहे हैं। वह सबके सब अति उत्साह के ज्वार भाटे में डूबे हुए हैं। यह जोश के साथ होश की अनिवार्यता को नहीं स्वीकारते। परन्तु यह रातों रात एक सौ बाइस करोड़ की जनसंख्या वाले विविधता पूर्ण देश में स्वीकार्य नहीं बना सकता।

याद कीजिए आपात काल के दिन। मीडिया तब आज की तरह ताकतवर और विवादित नहीं था। अपने निहित स्वार्थों के कारण कहीं कहीं कुछ भयभीत जरूर था। इन्दिरा इज इण्डिया, इण्डिया इज इंदिरा कहने वाले ढोपरशंखी कांग्रेस अध्यक्ष और कुंभ के अवसर पर इंदिरा गांधी को शानदार जीत का आशीर्वाद देने वाले चारों शंकराचार्य भी थे। परन्तु यह सब भी मिलकर बंगला देश के उद्भव के समय पंडित अटल विहारी बाजपेयी द्वारा दुर्गा के रूप में स्वीकार की गई इंदिरागांधी को पतन और शर्मनाक हार से बचा नहीं सके।

याद कीजिए बाबरी विध्वंस के बाद गुजरात से बहुत बड़े प्रदेश और देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और लाखों की भीड़ में रामलला से टेलीफोन पर बात करने वाले कल्याण सिंह। महा नायक से आज महा याचक के रूप में पुर्नवापसी के लिए भाजपा के दरबाजे पर खड़े हैं। हमारा उद्वेश्य नरेन्द्र मोदी की शानदार जीत के महत्व को कम करना नहीं है। परन्तु लोकतंत्र की गरिमा और मर्यादा को कम करने की षडयंत्र पूर्ण कोशिशों को देखना समझना जरूरी है।

लोकसभा चुनाव जब होंगे तब होंगे। देश नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकारेगा तब स्वीकारेगा। यह किसी के हाथ में नहीं है। यह हिन्दुस्तान के पचहत्तर करोड़ से अधिक मतदाताओं के हाथ में है। परन्तु हिमाचल (छोटा प्रदेश) की हार को भूलकर गुजरात (मझोले प्रदेश) की जीत पर बेबजह बेमतलब इतराने वाले भाजपाइयों होश में रहो। जोश छोड़ो या बनाए रखो यह तुम्हारी मर्जी।

फिलहाल आपके यहां पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की शानदार कुर्सी वर्तमान अध्यक्ष के वावादित क्रिया कलापों की बजह से खाली है। आपने स्वयं ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव को आगे खिसका दिया है। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बना सकना बड़े से बड़े भाजपाई के हाथ में नहीं है। परन्तु लोकसभा चुनाव से पूर्व नरेन्द्र मोदी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष सर्व सम्मति से बना देना सभी भाजपाइयों के हाथ में है। भाजपा के बहिन-भाइयों! यदि आप इतनी हिम्मत दिखा सके, तब सच मानो कांग्रेस चाहे या न चाहे, लोकसभा का चुनाव मोदी बनाम राहुलगांधी स्वयं से स्वयं हो जाएगा। क्योंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नरेन्द्र मोदी स्वतः ही प्रधानमंत्री के सशक्त सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार माने जायेंगे। त्याग की मूर्ति कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी प्रधानमंत्री पद को अस्वीकार कर चुकी हैं। नतीजतन लोकसभा चुनाव में मोदी के राहुल बाबा और कांग्रेसियों के प्रिय नेता उत्तर प्रदेश के ऐंग्री यंग मैन और गुजरात के गांधी भक्त राहुल गांधी ही कांग्रेस के तारनहार होंगे।

भाई बहिनों!

भाजपा के लोगों भाई बहनों! इस बिन मांगी सलाह पर विचार करना। वक्त बार बार नहीं आता। नया साल और लोकसभा का चुनाव दोनो दस्तक दे रहे हैं। मोदी नहीं यह आंधी है। गुजरात का ही नहीं देश का नया गांधी है। आप अपनी मर्जी से श्यामा प्रसाद मुकर्जी दीन दयाल उपाध्याय, पंडित अटल बिहारी बाजपेयी या कोई अन्य राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय नाम ले सकते हैं। नरेन्द्र मोदी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर उनके प्रधानमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त करो। यह कोई जोर जबर्दस्ती नहीं है। आपकी पार्टी आपका नेता आपकी मर्जी। एक बात गुजरात में मोदी की ऐतिहासिक शानदार जीत पर सामने आई। बिना लाग लपेट के आपको अपना समझ कर कह दी। बांकी आप जानें और आपका काम जाने।

इतना और समझ लेना। केवल गुजरात के मुख्य मंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी जी मानेंगे नहीं। वह बात बार बार मनमोहन सिंह, सोनिया और राहुल बाबा सहित राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय संदर्भों की ही करेंगे। क्योंकि अब गुजरात में उनके लिए कुछ करने को है ही नहीं। छह करोड़ गुजरातियों ने दिशा और दशा बदलने की अपील करने वाली कांग्रेस को बुरी तरह से ठुकरा दिया है। इसलिए भाजपाइयों का यह पावन पवित्र कर्तव्य है। देश की दिशा और दशा को बदलने के लिए पूरी धूमधाम से नरेन्द्र मोदी की पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर राहुल बाबा के मुकाबले उतारें।

दिल्ली में गेंग रेप

इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया है- सब के मन में जबर्दस्त आक्रोष है। हम सभ्य और सुसंस्कृत होने, प्रगतिशील होने का दम भरते हैं। परन्तु इस प्रकार की घटनायें यह साबित करतीं हैं कि हम कबीलाई जंगली और बहशी तौर तरीकों को छोड़ नहीं पाये हैं। बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले। इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। इससे शायद ही किसी को आपत्ति हो। परन्तु सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर उस देश में यह सब हो क्यों रहा है! जहां नारियों की पूजा होती है। जन्म देने वाली मां और जन्मभूमि को स्वर्ग से श्रेष्ठ माना गया है। इसका कारण कमोवेश सबको मालूम है। परन्तु पिछड़ेपन का संकीर्ण विचारधारा का होने का आरोप चस्पा होने के डर से खुलकर इस पर कुछ कहने से लोग डरते हैं।

अगर ऐसा न होता तब फिर राजा भैया जैसे प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री इस प्रकार का ओछा वयान नहीं देते। अपने सामंती चरित्र के चलते उन्होंने इस प्रकार की घटनाओं को सामान्य और पूरे प्रदेश में रोज होते रहने वाला बताया। साथ ही दिल्ली में हुई स दुस्साहसिक घिनौनी हरकत का विरोध करने वालों की टीवी पर दिखने और सस्ती लोकपिय्रता अर्जित करने की कोशिश बताया। इससे अधिक घृणित और निकृष्ट बात क्या हो सकती है। तब फिर बात सबसे पहले इन लोगों से शुरू करो जो इस प्रकार की निकृष्ट और निंदनीय घटनाओं पर भी आश्चर्य जनक ढंग से बेशर्मी से भरी बातें करते हैं। इस घटना ने हमारे देश में फैलने वाली चिनगारी को शोला बनाकर क्रांति परिवर्तन सुधार की ज्वाला बना दिया है। देश की आधी आबादी को हमने यदि भयभीत असुरक्षित बने रहने दिया। तब फिर हम बातें चाहें जितनी बड़ी करें, न घर के रहेंगे न घाट के।

राष्ट्रपति भवन से लेकर दिल्ली और देश के कोने कोने में फैल गया यह आक्रोश वर्षों से गली कूंचों बाजारों, ट्रेनों, बसों, कार्यस्थलों आदि में हमारी आपकी सबके घरों की महिलाओं लड़कियों के साथ होने वाले उस शोषण दुर्व्यवहार और छींटाकसी बदतमीजियों उद्दडताओं का कुपरिणाम है। जिसे समाप्त करने का विचार किसी के मन में आता ही नहीं। आता भी है तब फिर प्रतिरोध की हिम्मत हममें नहीं है। सब कुछ हमारी नजरों के सामने होता रहता है लेकिन हम प्रतिरोध प्रतिकार की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते।

इस घटना ने देश को झकझोर दिया है। सरकार शासन प्रशासन नेता क्या करते हैं क्या करेंगे। यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा। लेकिन तब तक हमें शांत होकर नहीं बैठना है। हमें अपने आपको एक अच्छे और जिम्मेदार शहरी के रूप में समाज में रहना होगा। अन्याय, अत्याचार, ज्यादती आदि का साहस के साथ प्रतिकार और विरोध की स्वाभाविक आदत डालनी होगी। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि अन्याय सहने वाला अन्याय करने वाले से कम जिम्मेदार और दोषी नहीं होता। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है-

अनुज वधू भगिनी सुत नारी- सुन सठ यह कन्या समचारी,
इनैहिं कुदृष्टि बिलोकै जोही, ताहि वधे कछु पाप न होई।

और अंत में………. घर में ही लाग लग रही घर के चिराग से!

जिलाधिकारी जी छुट्टी से लौटते नए साल में सावधान हो जाइए। सामान्यतः जिले में लोग आपको ठीक ठाक और ईमानदार मानते हैं। परन्तु आपके निजी सचिवालय के कुछ गुरुघंटाल लोगों ने आपको कथित रूप से बेईमान सिद्ध करने का अभियान अपने निहित स्वार्थों के लिए छेड़ रखा है। इनमें वह लोग भी शामिल हैं जिनकी सेवा निवृत्ति में अधिक समय नहीं बचा है।

अपने आवंटित कार्य के अतिरिक्त आपके आंख और कान बन गए इन सिद्ध पुरुषों ने पूर्व में कई जिलाधिकारियों और वरिष्ठ अधिकारियों की लुटिया डुबोई है। इनका स्थानांतरण नहीं होता केवल सीट बदलती है। इनमें से कुछ तो इतने गुरु घंटाल हैं कि इन्हें अगर लहरें गिनने तक का काम सौंप दिया जाए। यह उसमें भी अपना खेल खेलने का रास्ता निकाल लेंगे।

अपने निहित स्वार्थों के लिए ही यह लोग जब तब प्रभावी नेताओं और गर्जमंद लोगों के बीच यह अफवाह भी फैलाने से नहीं चूकते कि चुनिंदा मामलों में साहब डायरेक्ट नहीं इन डायरेक्ट खेल बना लेते हैं। कुछ अधिकारी भी अपने को सुरक्षित रख कर यह खेल इन्हीं गुरु घंटालों की मंत्रणा मार्गदर्शन में खेलते हैं। इन दिनों प्रमुख रूप से ऐसे दो बड़े खेलों की चर्चा यही गुरुघंटाल अपने अपने स्टाइल में कह रहे हैं। एक है मन्नीगंज लिंजीगंज मिलावटी तेल का मामला। बताते हैं खेल हो गया। किसी का भी भारी शोर शराबे के बाद भी कुछ नहीं हुआ। सब अपने अपने तरीके से तीरथ कर आए और प्रसाद पा गए।

दूसरा मामला वर्षों पुराना है। पूर्णतः नियम और विधि विरुद्व है। काफी कोशिशों के बाद मामला पट नहीं पाया। अब जिनके ऊपर कार्यवाही होनी चाहिए उनका कुछ नहीं बिगड़ा। परन्तु लगभग चार दर्जन कर्मचारियों पर गाज इस लिए गिर गयी क्योंकि गुरुघंटाल द्वारा कथित रूप से साहब बहादुर का नाम घसीटने पर भी वह कार्य नहीं हो पाया, जिसे श्रीमान जी संपादित करना चाहते हैं। इस प्रकरण में कब कब कितना खेल हुआ है। इसे जानने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है। केवल सम्बंधित पत्रावलियों का मूवमेंट ही देख लीजिए। तब फिर सारा खेल दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा। बिना कसूर मुअत्तिल कर्मचारियों और उनके परिवारीजनों को फांका कशी पर मजबूर कर देना और वास्तविक दोषियों को छुट्टा छोड़ देना कहां का न्याय है।

चलते चलते

पता नहीं जिला बार एसोसिएशन अपनी फजीहत कराने पर क्यों आमादा है। अनेक बार की घोषणाओं के बाद आप अपने चुनाव तो समय से करा नहीं पाए। परन्तु बाहर जाहां कहीं चुनाव हो वहां बेमतलब अपनी नाक जरूर घुसेड़ देते हैं। विधानसभा, नगर पालिका चुनाव में प्रत्याशियों को समर्थन देकर अपनी और अपने प्रत्याशियों की फजीहत के बाद बढ़पुर ब्लाक के प्रमुख पद के लिए 4 जनवरी को होने जा रहे उप चुनाव में भी बसपा प्रत्याशी को समर्थन देने की आनन फानन में बिना बैठक बुलाए घोषणा कर दी गई है। नतीजा सब जानते हैं ढाक के तीन पात से अधिक नहीं निकलेगा। परन्तु हम क्या करें हमें कार्य बहिष्कार और चुनाव में मनमाने तरीके से इसे उसे समर्थन देने की घोषणा आनन फानन में कर देने के अलावा कुछ आता ही नहीं। आज बस इतना ही। जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट

फर्रुखाबाद परिक्रमा – अजब गजब हैं खेल सपा के- सायकिल सिंह बोले हाथ नचा के!

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Posted on : 16-12-2012 | By : जेएनआई डेस्क | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

अजब गजब हैं खेल सपा के- सायकिल सिंह बोले हाथ नचा के!

पूरे सम्मान के साथ हम फिर दोहराते हैं। खड़ा खेल फरक्कावादी। जो मान जाए वह सपाई क्या। जो जलेबी न बनाये वह हलवाई क्या। एक थे डा0 राम मनोहर लोहिया। पूरे पचास साल पहिले यहां से चुनाव लड़े थे। कांग्रेस की, पंडित जवाहरलाल नेहरू की फजीहत करते हुए शान से जीते थे। आज के समाजवादी उसी कांग्रेस की कठपुतली बने हुए हैं। वह भी केवल और केवल इसलिए कि कहीं सांप्रदायिक शक्तियां आगे न बढ़ जायें। हम विरोध भी करेंगे। मतदान में बहिष्कार भी करेंगे। चित्त भी मेरी। पट भी मेरी, टैया मेरे बाप को। डा0 लोहिया होते आज के समाज वादियों की प्रशंसा के पुल बांध देते।

चलिए अब आगे बढ़ते हैं। डा0 लोहिया की इसी कर्मभूमि में पूरे नौ माह हो गए। युवा होनहार प्रगतिशील अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बने। जिले के सपाई खरबूजे ने कन्नौज के सपाई खरबूजे को देखकर रंग नहीं बदला। कहने का मतलब यह है कि जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में हुई कलंक कथा को कन्नौज की तर्ज पर समाप्त करने की हिम्मत बड़े से बड़े सूरमा भोपाली उर्फ सायकिल सिंह ने नहीं दिखाई। हाथी सिंह खुलेआम छाती पर मूंग दल रहे हैं। सायकिल सिंह अभी भी शर्म हया जमीर बेंच देने के बदले में मिले नोटों की ठाठ से जुगाली कर रहे हैं। भ्रष्टाचार ताकतवर होता है होता रहे। महंगाई बढ़ती है ठेंगे से। परन्तु कमल सिंह को खिलना नहीं चाहिए बढ़ना नहीं चाहिए। क्योंकि उनसे लड़ने की हिम्मत और फुरसत हमें इसलिए नहीं है। क्योंकि हमें अपनों से ही लड़ने से फुरसत नहीं है।

सायकिल सिंहों में किसी को अपनी एक भाभी को (दूसरी भाभी को नहीं) किसी को अपनी बहू को और किसी को अपने भाई को ब्लाक प्रमुख बनवाने की जल्दी है। संकल्प 2014 अभी दूर है।

तब फिर रिहर्सल कर लेने में क्या परेशानी है। आपको परेशानी है तो बनी रहे। हम हैं सायकिल सिंह। हमें किसी की परवाह न कभी थी। न है और न कभी रहेगी। हम नए जमाने के समाजवादी हैं। बाकी ब्लाक प्रमुखों से डील हो जाने के कारण उन्हें हमने मतलब हम सायकिल सिंहों ने खाने कमाने लूटने के लिए छुट्टा छोड़ दिया है। आखिर वह भी तो हमारे ही भाई हैं। आप इतनी छोटी सी बात नहीं समझते। खैर आप अपनी जानो। हमने सब अच्छी तरह समझ लिया है। भीषण सर्दी हो इज्जत पर बन आई हो। तब फिर अर्ना-वर्ना मत करना। गर्म पानी न मिले, ठंडे पानी से चुपचाप नहा लेना। क्या समझे नहीं समझे। नहीं समझे तब फिर तुम जानो और तुम्हारा काम जाने। हम अभी 28 दिसम्बर को होने वाले महज दो अदद ब्लाक प्रमुखों के चुनाव में बिजी हैं। इसके चलते हमें सैफई महोत्सव फर्रुखाबाद महोत्सव और नये साल के जश्न का मजा खराब करने में भी कोई गुरेज नहीं है। परन्तु जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में पार्टी प्रत्याशी की आन बान शान की वापसी की चिंता बड़े से बड़े सपाई को नहीं है। इस मोर्चे पर लगता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

ब्लाक प्रमुखों के उप चुनाव तो बहाना हैं। पूरी पटकथा लिखी जा चुकी है। अमल अभी बाकी है। इसके लिए सही समय इंतजार है। समझने वाले घोषित अघोषित लक्ष्यों का जान रहे हैं। समझ रहे हैं। जब संगठन से लेकर सरकार तक में कोई कानून कायदा व्यवस्था न हो। मनमानी हो। तब फिर किसी को किसी का क्या डर। सबके पास सबका बही-खाता है। जब ऐसा करके, वैसा करके भी उनका कुछ नहीं बिगड़ा। उल्टे प्रमोशन हो रहा है। तब फिर हमारा कोई क्या बिगाड़ लेगा। कब कहां क्या करना है। क्या कहना है। इसके बहाने खोजे नहीं जा रहे हैं तैयार हैं। सपाई अपने नेता धरती पुत्र की संघर्ष यात्रा तथा अन्य निर्देशों पर अमल कभी नहीं करते। करेंगे भी नहीं। क्योंकि वह सच्चे और सच्चे सपाई हैं। परन्तु नेता जी के कथित परिवारवाद को पूरी बेशर्मी से अपनाने में सायकिल सिंहों को किसी प्रकार की कोई गुरेज नहीं है। सभी सायकिल सिंहों को अपने परिवारीजनों का राज तिलक करने कराने की जल्दी है। उसके लिए कुछ भी करना पड़े करेंगे। लोहिया की कर्मभूमि में समाजवाद के प्रवर्तक और जाति तोड़ो आंदोलन के नायक डा. राममनोहर लोहिया को नए समाजवादियों की इससे अच्छी श्रद्धांजली और क्या हो सकती है।

वह आये भी चुपचाप और चले भी गए चुपचाप


कभी अपनी खुद की दुनिया के स्वयंभू बेताज बादशाह रहे पूर्व सांसद के अपने समर्थकों से यहां आकर मिलने परामर्श करने रणनीति बनाने की खबर परवान नहीं चढ़ सकी। वह स्थानीय मीडिया किंग के हमराज की मेजबानी से भी मीडिया की सुर्खियों में नहीं आ पाये। यह दिनों का फेर ही कहा जाएगा। वैसे भी अपने यहां नगर पालिका से लेकर संसद तक मीडिया से चलकर राजनीति में आने वालों का रिकार्ड कोई बहुत अच्छा नहीं रहा। भले ही अब भी कुछ लोग अपने को तीस मार खां समझते हों। हमला करना और हमला झेलना दो अलग चीजें हैं। राजनीति में विशेष रूप से चुनावी राजनीति में कूदने के इच्छुक मीडियाकर्मी इस बात को जितनी जल्दी समझ लें उतना ही अच्छा है। पूर्व सांसद के कथित गेट-टुगेदर में गिनती के लोग ही आए। जो आए भी वह भी किसी न किसी मजबूरी में। भले वह पुराने रिश्तों को ढोने या निभाने की ही मजबूरी क्यों न रही हो। मिलने वालों में बहुतों के नए नेता और गाडफादर हैं। वह हालात का जायजा लेने गए थे। सच्चाई यह है कि कुछ निजी रिश्तों को छोड़कर आजकल राजनीति में बहुत कम लोग ही नेताओं से बिना स्वार्थ के जुड़ते हैं। दस माह पूर्व और आज बसपा, सपा नेताओं के दरबारों की रौनक के फर्क से इस बात को अच्छी तरह से समझा जा सकता है।

जो राजा कभी फकीर था। देश की तकदीर था। पूर्व सांसद अब उसका सार्वजनिक रूप से नाम लेने में पर्याप्त सावधानी बरतते हैं। कई दलों और गुटों के सफर के कारण साख भी पहले जैसी नहीं रही। परन्तु बात चीत केवल बात चीत की मीठी मुस्कराती अदा अब भी अच्छी लगती है। उनके पुराने दिनों की याद दिलाती है। जब उनकी तूती बोलती थी। तब वह किसी से कुछ भी कह देते थे। व्यस्तता का ओर छोर नहीं था। दोस्त शुभचिंतक निराष हताश होते गए। क्योंकि उन्हें यह भ्रम हो गया था कि सच और सही केवल और केवल वही बोलते हैं। व्यस्तता उनकी आज भी पहले से कम नहीं है। ठाठ-बाट में भी कोई परिवर्तन नहीं है। परन्तु स्थानीय स्तर पर उनके वर्षों पुराने समर्थक कुछ सजातीय और उपकृत लोगों को छोड़कर हताश और निराश हैं। कभी उनके स्थानीय प्रतिनिधि रहे लोक समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष से पूर्व सांसद की भेंट वार्ता हुई या नहीं। हुई तो क्या हुई। इसकी खोजबीन जारी है। पता लगा तो बतायेंगे। आओ! तुम तो अपने हो घर को हो। हम फर्रुखाबादी बाहरी लोगों को दोनो हाथ फैलाकर गले लगाते हैं। एक बार फिर से लोकसभा का चुनाव लड़ लो। हो सकता है तुम जीत जाओ और देश का विदेश मंत्री हार जाए।

ककड़ी के चोर को कटारी से मत मारो जिलाधिकारी जी!

बड़ी खबर है। कड़क और सख्त जिलाधिकारी ने नगर पालिका फर्रुखाबाद में वर्षों से कार्यरत 48 कर्मचारी निलंबित कर दिए। परन्तु निलंबित कर्मचारियों को नियुक्ति देने में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका निभाने वालों के विरुद्व उद्धरणीय कार्यवाही क्यों नहीं की गई, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

जानकार लोगों के अनुसार इनमें से कोई भी नियुक्ति कथित रूप से बिना भारी रकम लिए नहीं की गई। नियुक्ति अधिकारी को भी यह अच्छी तरह पता था कि वह पूर्णतः नियम विरुद्व ढंग से लोभ, धमकी या धौंस के चलते नियुक्ति कर रहा है। अब इतने लम्बे समय तक कार्यरत रहकर यह सभी कर्मचारी जिनकी नयी सेवा की आयु भी निकल चुकी है। अब क्या करेंगे और कहां जायेंगे। कई निलंबित कर्मचारी तो नगर पालिका में कार्यरत। सेवा निवृत्त वरिष्ठ अधिकारियों के पुत्र हैं। कुछ तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष के विशेष कृपा पात्रों के सगे सम्बंधी हैं। उन्हें पता था कि उनके पाल्य की पूर्णतः गलत नियुक्ति हो रही है। फिर भी उन्होंने यह सब होने दिया।

जिलाधिकारी जी! यह बहुत बड़ा स्केन्डल है। केवल कर्मचारियों को निलंबित करना ही पर्याप्त नहीं है। 48 लोगों के भविष्य से कथित रूप से भारी धनराशि वसूल कर खिलवाड़ करने वाले लोगों के विरुद्व कड़ी से कड़ी विधि सम्मत कार्यवाही भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करने के आपके अभियान की सफलता के लिए बहुत जरूरी है। विश्वास है आप इतनी हिम्मत दिखायेंगे।

प्रोन्नति में आरक्षण क्यों!

सही है परिवार में कोई बच्चा कमजोर है। तब फिर स्वस्थ बच्चों को मिलने वाले दूध में कटौती करके अस्वस्थ और कमजोर बच्चे को देने में कोई हर्ज नहीं है। परन्तु बीमार कमजोर बच्चे के स्वस्थ हो जाने पर भी यह व्यवस्था जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। प्रोन्नति में आरक्षण हमारी समरसता और आपसी भाईचारे, प्रेम, व्यवहार के माहौल में विष घोलने का कार्य करेगा। सरकारी कर्मचारी सहयोगी सहकर्मी न होकर एक दूसरे के विरोधी और दुश्मन बन जायेंगे। राजनीति के कुशल खिलाड़ी अपने निजी स्वार्थों के लिए यही चाहते हैं। आरक्षण को विकास की की सीढ़ी ही बनाए रखिए। अपने घर का जीना मत बनाइए। आरक्षण लीजिए। परन्तु आरक्षण का लाभ लेकर अपनी दक्षता और योग्यता को बढ़ाने का प्रयास पूरे मनोयोग से करिए। केवल बैसाखियों पर कोई भी लंबी रेस का घोड़ा साबित नहीं हो सकता।

यह आरक्षण का स्वार्थ पूर्ण प्रयोग ही है। जिसके चलते साठ से अधिक सालों से प्रभावी आरक्षण के बाद भी साठ दलित भी सीना तान कर और छाती ठोंक कर यह कहने की हिम्मत नहीं दिखा सकते कि अब उन्हें या उनके परिवार को आरक्षण की आवश्यकता नहीं है। अब हमारे समाज के ही अन्य कमजोर लोगों को आने दीजिए। मायावती जी आज प्रोन्नति में आरक्षण की प्रबल पक्षधर हैं। अगर उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वह सामान्य सीट से चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं दिखा पातीं। तब फिर उनके समाज के अंतिम व्यक्ति को आरक्षण का लाभ कब मिलेगा। प्रोन्नति में आरक्षण के विरोधियों के अपने कुछ स्वार्थ हो सकते हैं। परन्तु प्रोन्नति में आरक्षण का समर्थन अपने ही समाज की अनदेखी करने के साथ ही स्वार्थ वादिता की पराकाष्ठा है। वोट बैंक की इसी निकृष्ट राजनीति सहित राजनीति की सारी गंदगी और सड़ांध को समाप्त करने के लिए निष्पक्ष और निर्भीक होकर शत प्रतिशत मतदान करना वर्तमान हालातों में अनिवार्य हो जाता है।

और अंत में- गुजरात के चुनाव का सबक- भाजपा कांग्रेस कुछ भी कहे। गुजरात और उससे पहले हिमाचल में हुए भारी मतदान ने नेताओं को अंदर से हिला कर रख दिया है। लोकतंत्र का जागृत लोकतंत्र का यही कमाल है। जनता मतदाता जब जागता है, तब सत्ता लोलुप नेताओं पर कहर बन कर टूटता है।

विडंबना देखिए घनघोर हाईटेक चुनाव प्रचार के दौरान किसी भी पार्टी के किसी भी नेता ने मतदाताओं से यह कहने की हिम्मत नहीं दिखाई कि वह चाहें जिसे मतदान करें। परन्तु मतदान अवश्य करें। राजनीतिक पार्टियों और नेताओं की अपनी सीमायें हैं। वह उन्हें तोड़ नहीं सकते। उनकी चुनाव सुधारों में कोई दिलचस्पी नहीं है। लोकतंत्र में असली मालिक जनता है। अब पश्चिमी बंगाल हिमाचल और गुजरात की तर्ज पर पूरे देश की जनता को मतदाता को निष्पक्ष और निर्भीक होकर शत प्रतिशत मतदान करने का संकल्प करना होगा।

चलते चलते – मनमोहन सिंह जी अब आपको क्या हो गया!

प्रधानमंत्री ने नयी और पुरानी सोंच का मामला उखाड़ कर अच्छा ही क्या। अब जो भी किसी नयी चीज का विरोध करेगा। उसे पुरानी सोंच वाला बताकर दरकिनार किया जाएगा। एक अरब बीस करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश का प्रधानमंत्री यदि ऐसी बात कहे और करे। तब फिर इसे देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जाएगा।

संयोग कहिए या लोकतंत्र की बलिहारी। ऊंचे ऊंचे पदों पर ऐसे लोग आकर बैठ गए हैं कि कुछ पूछों मत। उन्हें वालमार्ट का प्रमोशन अच्छा लगता है। सादा जीवन उच्च विचार की कार्य शैली उन्हें पुराने सोच और जमाने की बात लगेगी। मनमोहन सिंह की सादगी, ईमानदारी और योग्यता के हम सभी लोग यहां तक उनके विरोधी तक कायल हैं। परन्तु अपने अभी तक के कार्यकाल में वह अपने इन गुणों से कोई सीख अपने सहयोगियों को नहीं दे पाये। उनके सहयोगियों के बेतुके बचकाने वयानों की लम्बी सूची है। परन्तु उनके कल दिए गए बयान से ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री पर उनके सहयोगियों का प्रभाव पड़ने लगा है। अन्यथा वह इस प्राचीन देश किसानों के देश के लोगों को पुरानी सोंच का व्यक्ति बताकर अपमानित नहीं करते। नया सब कुछ अच्छा नहीं है। पुराना सब खराब नहीं है। नये और पुराने को अपने विवेक के तराजू पर तौल कर उचित अनुचित का निर्णय करने की सलाह हमें हमारे पुरखों ने दी है। क्या आप इसे भी पुरानी सोंच की बात कहेंगे। क्या ‘‘सर्वभूत हितेरतः’’ ‘‘वसुधैव कुटुंबकम्’’ सर्वे भवन्ति सुखिना सर्वे सन्तु निरामया, गौतम, गांधी, गुरु नानक, तुलसी, सूर, कबीर आदि की बातें पुरानी सोंच की बताकर छोड़ दी जानी चाहिए। आज बस इतना ही। जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट

फर्रुखाबाद परिक्रमा – अबके राम गधा न छोड़ें लाख दुलत्ती सहने पर!

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Posted on : 09-12-2012 | By : जेएनआई डेस्क | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

 गड़करी साहब की जय जय बोलो!

कांग्रेस जो है सो है। परन्तु जवाब अपनी भाजपा का भी नहीं। कहावत है बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभान अल्लाह। नीति नियति, चाल चलन, चरित्र नैतिकता आदि आदि का सारा ठेका भाजपा ने ले रखा है। ठीक है भैया। तुम्हारी पार्टी है। त्यागपत्र दो या नहीं तुम्हारी मर्जी। संविधान में संशोधन करके आजीवन अध्यक्ष बन जाओ हमें क्या परेशानी। परन्तु हे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के अनन्य भक्तों और समर्थकों के सिरमौर गड़करी साहब। आपको यह अधिकार किसने दिया कि आप अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को स्वयं ही खारिज करके अपने आपको क्लीन चिट दे दें। भला यह भी कोई बात हुई। और किसी से न सही अपने वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण अडवाणी से ही सीख लेते। उन पर आरोप लगे। तत्काल त्यागपत्र यह कहते हुए दिया कि जब तक लगाए गए आरोपों की जांच नहीं होती वह निर्दोष साबित नहीं हो जाते, तब तक वह अपने पद पर नहीं रहेंगे। आप गड़करी साहब गंभीर आरोपों पर स्वयं वादी अदालत और न्यायाधीश बन गए। स्वयं के निर्दोष होने की घोषणा कर दी। बोलो जय श्री राम! बोलो गड़करी साहब की जय! सही कहा है-

एक राम ने सीता छोड़ी एक धोबी के कहने पर,
अबके राम गधा न छोड़ें लाख दुलत्ती सहने पर!

सर्वोच्च संसद के अजब गजब खेल और नजारे!

अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान संसद की सर्वोच्चता का बखान किन किन लोगों ने किया था।
संसद को शान्तिपूर्ण और नियमों के अनुसार चलने देने का संकल्प संयुक्त सत्र में किन लोगों ने लिया था।
संसद सदस्यों ने अपने वेतन भत्ते और सांसद निधि में बढोत्तरी का प्रस्ताव चंद मिनटों में एक स्वर और एक मत से कब पारित किया था।
लोकपाल बिल महिला आरक्षण बिल आदि संसद में कब से विचाराधीन है। सोचिये विचारिए सर्वोच्च संसद के माननीय सदस्यगण और नेता एफ.डी.आई. के समर्थन और विरोध के कितने खेल खेल चुके हैं। आगे कितने खेल और खेलेंगे।

सोचिए और विचारिए जब भाजपा के धुर विरोधी बाम पंथियों को एफ.डी.आई. के मुद्दे पर भाजपा के साथ खड़े होने में कोई परेशानी नहीं है। तब फिर एफडीआई और स्वयं भी एक दूसरे के प्रबल विरोधी सपा के साइकिल सिंह और बसपा के हाथी सिंह गांधी को भूल जाने वाली कांग्रेस के लिए तारनहार क्यों बन जाते हैं। वामपंथियों से सायकिल सिंह की दोस्ती जग जाहिर है। फिर यह कैसी बेरुखी-

कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगीं,
कोई यूं ही बेबफा नहीं होता!

हमारी अपनी राय में यह सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि हमारी सर्वोच्च संसद में हमारे माननीय सदस्यगण कम मत प्रतिशत और वोटों के बंटवारे के बल पर निर्वाचित होकर सदन में पहुंचते हैं। इसी कारण वह राजनीति की विसात पर अपनी मनमानी करने और स्वार्थ पूर्ण बाजियां खेलने में न शर्माते हैं, नहीं डरते हैं।

हमारा कहना है कि देश की सर्वोच्च संसद में इस प्रकार के घृणित खेलों और परिस्थितियों की पुनरावृत्ति न हो। इसके लिए निष्पक्ष और निर्भीक होकर शत प्रतिशत मतदान का संकल्प हमको आपको सबको करना होगा। कारण कोई भी हो। यदि हम आप सब यह नहीं करते हैं, तब फिर हममे से किसी को भी किसी भी राजनैतिक दल नेता या जनप्रतिनिधि को भला बुरा कहने का कोई हक नहीं है। नेताओं को भी देश हित में हिम्मत दिखानी होगी। वह जनता से अपील करें। वह चाहें जिसे वोट दें। परन्तु हर हाल में निष्पक्ष और निर्भीक होकर मतदान अवश्य करें। शत प्रतिशत मतदान अवश्य करें। सच मानिए किसी प्रकार के चुनाव सुधारों की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

करा के दिखाओ नकल विहीन परीक्षा

वर्षों पूर्व तत्कालीन जिलाधिकारी वी.एन. गर्ग ने नकल विहीन परीक्षा का कीर्तिमान स्थापित किया था। परीक्षा की तिथियां घोषित हो रही हैं। परीक्षा केन्द्रों की अंतिम सूची भी जारी हो रही है। प्रदेश में प्रगतिशील विचारों वाला युवा मुख्यमंत्री है। सकारात्मक परिवर्तन की बात हो रही है। जिले में वी.एन. गर्ग से भी कड़क और व्यवस्था प्रेमी जिलाधिकारी हैं। जिला विद्यालय निरीक्षक के भी बड़े नाम और काम हैं।

जिलाधिकारी जी, जिला विद्यालय निरीक्षक जी अपने सहयोगियों के सहयोग से यदि आप इस वर्ष परीक्षाओं को बिना नकल के संपन्न करा सके। तब फिर नेता या नेती आपसे या आपके लिए कुछ भी कहें। आपके नुकसान स्थानांतरण के लिए कितने भी पापड़ बेलें। इस जिले के लोग आपको याद रखेंगे।

हमें विश्वास है कि पूर्व जिलाधिकारी वी. एन. गर्ग की तरह आप जिले में नकल विहीन परीक्षायें सम्पन्न करने की हिम्मत अवश्य दिखायेंगे। हम सबकी शुभकामनायें आपके साथ हैं।

हम नहीं सुधरेंगे- हम हैं सलमान

ताबड़तोड़ गल्तियों और तुनकमिजाजी पर ही तरक्की मिलती हो! तब फिर सुधरने की क्या जरूरत है। सर्वोच्च संसद में हमारे विदेश मंत्री के वक्तव्य पर चर्चा होती है। उन्होंने भारत और चीन के बीच कोई एलओसी (लाइन आफ कन्ट्रोल- नियंत्रण रेखा) न होने की बात कही है। लंबे समय से उनके अनुसार इस पर वार्ता चल रही है।

सलमान साहब! आप यहां के सांसद हैं। देश के विदेश मंत्री हैं। सोच समझ कर बोलने में कुछ जाता नहीं है। ठीक है एल ओ सी तय नहीं है। आप या भारत सरकार जहां से भारत भूमि की शुरूआत मानती है। सर्वोच्च संसद में कांग्रेस सहित सारी राजनैतिक पार्टियों 1962 के चीनी आक्रमण के बाद लिए गए उस संकल्प को भूली नहीं है। इस संकल्प में चीन द्वारा कब्जा की गयी एक एक इंच भूमि वापस लेने तक चैन से न बैठने की बात कही गई है। चीन यदि वहां आकर, आगे आकर निश्चित रूप से हमारी भूमि में आकर अपनी सैनिक और असैनिक गतिविधियां अजमा देता हैं तब क्या हम एलओसी न होने की बात कहकर उसे ऐसा करने देंगे। बहुत हो चुका शब्दों का खेल। देश हित में सुधर जाओ। सोच समझ कर बोला करो।

पूर्व रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव सहित कई वरिष्ठ पूर्व एवं वर्तमान सैन्य अधिकारी और जानकार लोग एक बार नहीं अनेक बार चीन की ओर से बढ़ते जा रहे खतरे के प्रति सरकार को आगाह कर चुके हैं। देश के प्रथम प्रधानमंत्री की एक गलत वयानी के चलते हमने तिब्बती नेता दलाई लामा को अपने यहां शरण दे रखी है। वहीं चीन को तिब्बत और तिब्बतियों पर अमानवीय अत्याचार करने की खुली छूट दे रखी है। हम यह नहीं मान सकते कि आप इस ऐतिहासिक भूल और इससे हुए विनाश के विषय में नहीं जानते। हमारे और चीन के बीच स्वतंत्र प्रभुता सम्पन्न तिब्बत देश था। दलाई लामा उसके सर्वोच्च नेता हैं। परन्तु हमने हिन्दी चीनी भाई भाई की झोंक में तिब्बत को मिट जाने दिया। आज चीन हमारी भूमि पर अपनी सैनिक असैनिक गतिविधियां अंजाम दे रहा है। आप हैं जो एलओसी न होने की बात कहकर चीन को मनमानी करने के लिए उकसा रहे हैं। सुधर जाओ सलमान भाई। न सुधरने की बच्चों जैसी ऐसी जिद ठीक नहीं है।

मजाक बनकर रह गया सर्व शिक्षा अभियान

छात्रों को ड्रेस के साथ टाई नहीं, छात्राओं को ड्रेस के साथ दुपट्टा नहीं। पढ़ाई की जरूरत नहीं। फेल होंगे नहीं। हाजिरी होगी नहीं। मिड डे मील का कटोरा पहिले दिन से ही हाथ में है। जो मिल जाये उसे चुप चाप गृहण करो। सर्व शिक्षा अभियान के कर्ताधर्ताओं की जय जय कार करो। देश के भावी कर्णधारों के शिक्षकगणों की अपनी मजबूरियां समस्यायें शिकायतें हैं। निलंबन, स्थानांतरण समायोजन आदि आदि कई दरबाजों वाले इस विषम चक्रव्यूह में घिरा खड़ा है असहाय गोविंद का गुरू। गुरू को घेरे खड़े हैं त्रिपाठी कौशल और पटेल। उनके पीछे उनके अपने अपने काकश और सिन्डीकेट। शिक्षकों के विविध संगठन और उनके पदाधिकारी। साथी शिक्षकों के बीच वगावती तेवर। चाहें जो मजबूरी हो मांग हमारी पूरी हो। अधिकारियों के सामने सारी शेखी छूमंतर। भवन निर्माण, चाहर दीवारी निर्माण, मिड डे मील, ड्रेसों आदि ने किसी से नजरें मिलाने लायक ही नहीं रखा। गोविंदों के गुरुओं को। कौन किसके पायं लागे। चुपचाप पैसा फेंको। सर्व शिक्षा अभियान का कबाड़ा होते देखो।

सात माह में चले एक कोस

ऐतिहासिक तरक्की है। वर्षों से नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत चली आ रही है। यहां जिले में जिलाधिकारी को दिया गया एक प्रार्थनापत्र स्वास्थ्य विभाग से सम्बंधित था। उसे मुख्य चिकित्साधिकारी के पास पहुंचने में पूरे सात माह लगे। अब इस पर अपेक्षित कार्यवाही कब होगी। यह कौन बताएगा। कोई नहीं। किसी के पास फिजूल बातों के लिए फुरसत नहीं है।

हमारी यही सजा होनी चाहिए। हमारा काम केवल प्रार्थनापत्र देना और इस या उस कार्य के लिए लाइन में खड़ा होना भर है। कितने प्रार्थनापत्र जिलाधिकारी के यहां पिछले दिनों में दिए गये। कितनों पर प्रभावी कार्यवाही हुई। तहसील दिवस, विभिन्न दरबारों में क्या हुआ। कुछ नहीं हुआ। निराश लोग लखनऊ में जनता दर्शन के लिए लगने वाली लाइन में लग गए। इस सबकी जरूरत क्या है। यदि सारे कार्य लखनऊ से होंगे। डा0 एम के दरबार से होंगे। तब फिर दर्जनों अधिकारियों, विभागों, सैकड़ों हजारों छोटे बड़े कर्मचारियों का क्या मतलब है।

इस सबके बीच पुलिस की महिमा सबसे न्यारी है। पुलिस मित्र है। मित्रता निभाना अच्छी तरह जानती है। जिस काम को न करने देने के लिए नियुक्त की जाती है। पैसा लेकर उसी काम को करने देने की खुली छूट दे देती है। है न मित्र पुलिस। दोस्ती हो तो ऐसी।

हमारा कहना है कि अपनी जिम्मेदारी को समझने की आदत डालो। पैसा बहुत कुछ है। लेकिन पैसा ही सब कुछ नहीं है। इस बात को जितनी जल्दी समझ जाओ उतना ही अच्छा है। अन्यथा कही तुम किसी की मजबूरी का फायदा उठाओगे। कहीं कोई तुम्हारी मजबूरी का फायदा उठायेगा। पुलिस और प्रशासन का इकबाल राज्य करता है। अपना इकबाल बनाओ। लोभ, लालच, बेईमानी को छोड़ दो। निष्पक्ष और निर्भीक होकर काम करो। फिर देखो कितना आनंद आता है।

विज्ञापन की बेचारगी और फंस गया मीडिया!

जिंदल उद्योग समूह और जी न्यूज का प्रकरण अदालत में है। इसलिए उस पर कोई टिप्पणी करना उचित नहीं है। परन्तु इस प्रकरण ने मीडिया की ताकत और कमजोरी दोनो को एक साथ उजागर कर दिया है। मीडिया बहुत ताकतवर है। किसी की कहीं भी कभी भी ऐसी तैसी कर सकता है। करता है फिर अपनी ताकत पर प्रसन्न होता है। स्वतंत्र होने का दावा करता है। परन्तु विज्ञापन के लिए विज्ञापनदाताओं की गुलामी करने को सदैव तैयार रहता है। यह संक्रामक बीमारी कस्बों, नगरों, महानगरों से लेकर देश और प्रदेश तक में फैल गयी है। गांवों में विज्ञापन नहीं मिल सकता। मीडिया वहां नहीं जाता। पेड न्यूज प्रायोजित खबरों की बातें चुनाव आयोग तक के संज्ञान में हैं। विज्ञापन की बेचारगी ने मीडिया की गरिमा और मर्यादा को कमजोर किया है। मीडिया अब मिशन नहीं रही। रह भी नहीं सकती। व्यापार बन गयी है। लाखों करोड़ों नहीं अरबों, खरबों का निवेश है। व्यापार के अपने गुण दुर्गुण हैं। दुर्गुणों से बचना चाहिए। आप कितने भी ताकतवर हों। जिस क्षण आप किसी से कुछ मांगते हैं। भले ही वह विज्ञापन ही क्यों न हो। कमोवेश आप याचक की भूमिका में आ जाते हैं। आप कमजोर हो जाते हैं। वह चाहें हम हों, आप हों या मीडिया। कहा भी है-

अपनी अगराज किसी से कभी कहकर देखो,
फिर उसके बाद उसके बदलते हुए तेवर देखो।

और अंत में- कौन केजरीवाल – भुलक्कड़ विदेश मंत्री

ऐसी कमजोर याददाश्त लेकर विदेशों में देश के हितों की हिफाजत कैसे कर सकोगे। अरे वही केजरीवाल जिनके लिए लंदन से लौटकर आपको अपने आवास पर पत्रकार वार्ता में अपनी सफाई देनी पड़ी थी। वही केजरीवाल जिन्होंने आपको आपके उत्साही समर्थकों की तमाम कोशिशों के बाद भी आपके संसदीय क्षेत्र में जिला मुख्यालय पर लोहिया मैदान में अपनी बेहद कामयाब रैली की थी। वही केजरीवाल जिन्हें आपने गटर का कीड़ा और जाने क्या क्या कहकर अपमानित। सम्मानित किया था-
दुश्मनी जम के करो, मगर यह ख्याल रहे,
जब कभी फिर से मिलें शर्मिंदा न हों।

चलते चलते……………………….. लो कर लो बात

चुनाव न हों! तब फिर अपनी जमीन पर पुरखों की धरती पर आने की फुरसत कामयाब लोगों को कम ही मिलती है। पत्रकारिता और राजनीति में अनेक आयाम कायम करने वाले पूर्व सांसद संतोष भारती को कौन नहीं जानता। गणेशपुर, खिमशेपुर के सर्वोदयी भैरों सिंह भारती के इस छोटे ने बहुत कम उम्र में जिला छोड़ कानपुर, लखनऊ होते हुए दिल्ली की राह पकड़ी थी। जेपी आंदोलन, अमृत की शादी, वीपी सिंह का आंदोलन, सांसदी और जाने क्या क्या लंबी दास्तां है। वह व्यस्त होते चले गए। जिले में आना कम हो गया। सत्य के मनमोहन से आज सुबह सुना है कि संतोष आ रहे हैं। सुना है समर्थकों से मिलकर चुनावी संभावनाओं को तलाशेंगे। 1989 के ऐतिहासिक चुनाव में संतोष ने वर्तमान विधि मंत्री सलमान खुर्शीद को पटकनी दी थी। परन्तु उसके बाद दुबारा दल बदल करके भी नहीं जीते। सुरेश त्रिवेदी तब भी उनके हमराज, हम सफर और दोस्त थे। आज भी हैं। ऐसी दोस्ती बड़े भाग्य से मिलती है।

इस सादगी पे कौन न मिट जाए ए खुदा,
लड़ते हैं मगर हाथ में तलवार भी नहीं।

आज बस इतना ही। जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट

फर्रुखाबाद परिक्रमा: जहां टिकट वहीं ठौर-तू नहीं और सही, और नहीं और सही!

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Posted on : 02-12-2012 | By : जेएनआई डेस्क | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

हार की बदहवासी के बाद हाथी वाले कसमसाने लगे हैं। बार बार यकीन दिलाया जा रहा है- ‘घोषित प्रत्याशी ही चुनाव लड़ेगा’। परन्तु कोई यकीन करने को तैयार नहीं है। सही ही कहा है- ‘बद अच्छा बदनाम बुरा’।

दो पूर्व सांसद पूर्व सांसदों के बेटे, कई बार दल बदलने वाले, नई पार्टी बनाने वाले, उसे समाप्त करने वाले। अनेक दिग्गज नेता एक दो नहीं, तीन-तीन जगह टिकट की जुगाड़ में व्यापारियों की तरह लगे हुए हैं। लक्स की एजेंसी न मिले तो लाइफब्‍वाय की ही मिल जाए। उन्हें विचार, सिद्धान्त, रीति-नीति से, कहीं कोई कुछ भी लेना देना नहीं है। कब कौन कहां चला जाए, कुछ नहीं पता। कब फूल वाले सायकिल वाले हो जायें, लोकसभा और विधानसभा चुनाव में एक दूसरे को टक्कर देने वाले कब साथ साथ हो जायें, कुछ नहीं कहा जा सकता। मन की मुराद पूरी न हो, तब फिर एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोंकने लगेंगे।

सत्ताधारी होने के कारण सायकिल वालों के खेमे में जमकर हलचल और हंगामा है। टिकट के लिये मंत्री पुत्रों विधायक पुत्रों, पूर्व विधायकों की लम्बी लाइन है। परन्तु अभी तक दाल किसी की गल नहीं रही है। मामला अभी तक किसी का कुछ पक्का नहीं है। इस खेमे में कुछ अप्रत्याशित अजूबा और आश्चर्यजनक हो जाए। इसकी भी संभावनायें हैं। राष्ट्रपति भवन में होने वाली संगीत गोष्ठियों में हाथ वाली पार्टी के दिग्गज केन्द्रीय मंत्री और सायकिल वाली पार्टी के एक दिग्गज नेता की भेंट वार्ता में अब जिले के सियासी माहौल में चर्चित होने लगी है।

हाथ वाले खेमे में केजरीवाल के सुनामी के बाद बर्बादी की खामोशी है। यहां हमें और नहीं, और उन्‍हें ठौर नहीं जैसी स्थिति है। विधानसभा चुनाव में राहुलगांधी का वीटो लगने, करोड़ों रुपया पानी की तरह फूंक देने, संजयदत्त, अजहरुद्दीन, शीला दीक्षित सहित दर्जनों दिग्गजों की सभायें रोड शो करने के बाद भी जमानत जप्ती सहित पांचवे स्थान पर रहने वाली मंत्री की पत्नी ने अभी भी हिम्मत नहीं हारी है। मंत्री जी तो सुपर टाप हैं। इन दोनो में से कोई हाथ का साथ लेकर मैदान में आएगा।

लाख टके का सवाल यह है कि कमल वालों का कल्याण कौन करेगा। यहां भी दल बदल की अपार संभावनायें हैं। इस सारी उठापटक में जातिवाद का आंकड़ा सबसे महत्वपूर्ण है। गंगा गए तो गंगादास, जमुना गए तो जमुनादास।
इब्तदाये इश्क है रोता है क्या!
रफ्ता रफ्ता देखिए होता है क्या!

ऐसे समर्थकों से विरोधी भले

प्रदेश के कद्धावर मंत्री शिवपाल सिंह यादव के सामने सपा के दिग्गज कार्यकर्ता सार्वजनिक रूप से चीख चीख कर कहें कि ‘‘अधिकारी नेता को नेती कहकर सम्बोधित करते हैं। डीएम, एसपी, जक्रांपा, बसपा व अन्य विपक्षी दलों के बुलावे पर उनके कार्यक्रमों में जाते हैं। जबकि अधिकारी व्यावसायिक शिक्षा राज्य मंत्री के प्रस्ताव तक पर विचार नहीं करते। आठ माह हो गए अभी तक विकास कार्य तो दूर एक हैंडपम्प तक नहीं लगा।’’

जिले के लोग बहुत समझदार हैं। जरा सोंचकर बताइए कि वरिष्ठ मंत्री के सामने सपाइयों द्वारा दिया गया बयान प्रदेश सरकार, प्रशासन, जन प्रतिनिधियों, विरोधी दलों के समर्थन या विरोध में है। वास्तव में यदि यही हाल है। तब फिर प्रदेश सरकार की उपलब्धियों पर आयोजित प्रायोजित कार्यक्रम क्या है। सत्य के सरदार मनमोहन सिंह की दोस्ती की यह एक छोटी सी बानगी है।

बड़का मंत्री के जाने के बाद से स्थानीय मंत्री जी यही गाना गा रहे हैं -
दोस्तों से इस कदर सदमें उठाए जान पर,
दिल से दुश्मन की अदावत का गिला जाता रहा!

भाजपा : अर्न्तविरोधों की दास्तां – मोदी से येद्वयुरप्पा तक

गुजरात में अत्म विश्वास या अहंकार से भरी भाजपा नरेन्द्र मोदी को थाम नहीं पा रही है। मोदी बड़े नहीं बहुत बड़े हो गए हैं। ऐसा लगता है मोदी ने भाजपा का अंगवस्त्रम् नहीं भाजपा ने मोदी का अंगवस्त्रम् पहना हुआ हो। याद करिए बीस वर्ष पहिले इन्हीं दिनों बाबरी विध्वंस के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा और कल्याण सिंह की यही स्थिति थी। आज क्या स्थिति है। आप जाने माने या ठना ठन ठाने रहें। इससे किसी को कहीं कुछ लेना देना नहीं। सब अच्छे दिनों की कमाई पर राज कर रहे हैं। भाजपा कहीं नहीं दिखती। कल्याण सिंह की स्थिति भी हारे हारे हताश निराश परन्तु आकंठ पुत्र मोह में ग्रस्त धृतराष्ट्र से भी गई गुजरी प्रतीत होती है। गुजरात के नरेन्द्र मोदी की तरह सभी को लाल लाल करने वाली पार्टी और उत्तर प्रदेश में रामलला से सीधे टेलीफोन पर बात करने वाली उस समय के कल्याण सिंह की पार्टी। रहिमन चुप हुइ बैठिए देख दिनन के फेर।

भाजपा गुजरात में कांग्रेस को हताश निराश विभाजित देखकर इतनी आत्ममुग्ध है कि उसे गुजरात के चुनाव में प्रधानमंत्री के चुनाव का नजारा दिख रहा है। गुजरात में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष सहित पार्टी के सभी नेता अप्रासंगिक हो गए हैं। क्रिकेटर नवजोत सिद्धू से लेकर नेता प्रतिपक्ष गुजरात के प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री) का जयगान कर अपने को धन्य और कृतार्थ समझ रहे हैं। भाजपा के लोग महान राष्ट्रवादी हैं। गुजरात में सौराष्ट्र है। राष्ट्र में महाराष्ट्र है। बात गुजरात के गौरव की होगी। चुनाव गुजरात का होगा। बात राष्ट्र गौरव की नहीं होगी। विधानसभा चुनाव में बात प्रधानमंत्री के चुनाव की होगी। बात सरदार पटेल की होगी। परन्तु अपने ही दिग्गज वरिष्ठ साथी केशूभाई पटेल की फजीहत करने में प्रचारक अपना सब कुछ होम किए दे रहे हैं। सही बात यह है कि गुजरात में नरेन्द्र मोदी भले ही ऐतिहासिक बहुमत से जीत जायें। परन्तु भाजपा बहुत बुरी तरह हारेगी। मोदी के चरण कमलों में सास्ट्रांग प्रणाम करती दिखेगी।

कांग्रेसी गांधी को भूले। भाजपाई श्यामाप्रसाद मुकर्जी, दीन दयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी को भूले। मोदी शरणम् गच्छामी। नजर जरा पीछे दौड़ाइए। पांच वर्ष भी नहीं हुए। कर्नाटक दक्षिण में भाजपा का पहिला सशक्त किला बना था। येद्धयुरप्पा की सर्वत्र जय जयकार हो रही थी। आज क्या स्थिति है। कल का हीरो रो रहा है। भाजपा छोड़ रहा है। नई पार्टी बना रहा है। रामलला का हीरो रो रहा है। अपनी पार्टी समेट रहा है। भाजपा में अपनी शर्तों पर नहीं भाजपा की शर्तों पर आ रहा है। भाजपा में अब कश्मीर से कन्या कुमारी तक का जयगान नहीं होता। येद्धयुरप्पा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। शिवसेना के नहीं भाजपा के शिवा जी गड़करी साहब पूरी पार्टी की क्लीन चिट पा गए। कांग्रेस ने गुजरात में शायद अच्छी संभावनायें न होने के कारण मुख्यमंत्री पद के लिए अपने पत्ते नहीं खोले। परन्तु नरेन्द्र मोदी ने अपने पत्ते खोल दिए हैं। उन्होंने अपने उत्तराधिकारी की घोषणा कर दी है। जब मोदी प्रधानमंत्री होंगे। तब कांग्रेस के अहमद पटेल गुजरात के मुख्यमंत्री होंगे।

एक बुजुर्ग स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने दुखी होकर आंदोलन में जेल सहयात्री रहे अपने साथी से समस्या का समाधान पूछा। उसने बड़ी ही गर्मजोशी से कहा जिस दिन गुजरात गांधी के सत्य अहिंसा और सरदार पटेल की दृढ़ता के रथ पर सवार निष्पक्ष और निर्भीक होकर शत प्रतिशत मतदान करेगा। गुजरात ही नहीं सारे देश के गौरव की वापसी होगी। यकीन मानिए देर से ही सही किसी दिन ऐसा होकर रहेगा।

कैसे कैसे रिश्ते एनडी और मुलायम, विमल और सलमान!
रजत शर्मा जैसे वरिष्ठ मीडिया कर्मी अगर आपकी अदालत में बुलाने वाले वरिष्ठ नेताओं के क्षेत्रों का दौरा करके अदालत लगायें। उस स्थिति में उन्हें निश्चय ही नेताओं के सम्बंध में अपने संबोधन बदलने पड़ेंगे।

राजनीति कितनी बदल गयी है। एक ओर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपने बेटे के साथ अपने जमाने के दिग्गज नेता कांग्रेसी एन.डी. तिवारी के आवास पर जाते हैं। एक दूसरे को छोटा भाई, बड़ा भाई बताते हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को अपना भतीजा बताते हैं। कांग्रेस के विषय में पूछे जाने पर एन डी पूछते हैं। कौन सी कांग्रेस, कहां है उसका दफ्तर। पत्रकार वार्ता में केवल और केवल एन.डी. बोलते हैं। पिता पुत्र चुपचाप श्रोता बनकर सुनते हैं। मुलायम और अखिलेश की तारीफ करने के बावजूद बिना झिझक और संकोच के एन.डी. तिवारी एफ.डी.आई. के मुद्वे पर मुलायम सिंह यादव और सपा की लाइन के पूर्णतः विपरीत अपनी राय बता गए। परन्तु पिता पुत्र रंचमात्र भी विचलित नहीं हुए। विचार रीति नीति अलग अलग हो सकती है। परन्तु मानवीय और सामाजिक रिश्तों को पालना पोसना बहुत आसान होने पर भी आज के नेताओं को बहुत कठिन लगता है।

जो लोग सोनिया गांधी के लिए जान देने और राहुलगांधी को सचिन तेंदुलकर और भगवान कहकर सुर्खियां और प्रोन्नति बटोरते हैं। उन लोगों का अपने संसदीय क्षेत्र के वरिष्ठ पार्टी नेताओं के साथ कैसा व्यवहार रहता है। यह जानने के लिए मीडिया कर्मियों को नेताओं के क्षेत्रों में जाना होगा।

एन.डी. तिवारी के साथ 1977 में एटा में झंडा सत्यागृही के रूप में जेलयात्री रहे दिग्गज कांग्रेसी नेता स्वर्गीय विमल प्रसाद तिवारी से उनके जीवन के अंतिम दिनों में यदि कोई कांग्रेस के विषय में पूछता। तब वह निश्चित रूप से यही कहते। कांग्रेस कौन सी कांग्रेस। सलमान की कांग्रेस। कांग्रेस कार्यालय नगला दीना फतेहगढ़ नहीं नहीं पितौरा कांग्रेस कार्यालय। एटा जेल में एन.डी. और विमल दोनो एक साथ गाते थे-

कौन कहता है जबर्दस्ती हमें पकड़ा गया!
हमको शौके जेल खाना, जेलखाना ले गया।

मौका है। सुधरना चाहो। सुधर जाओ। वैसे तुम्हारी मर्जी

और अंत में – होश में रहो! नव्वे साल का पट्टा नहीं है।

पुराने लोग हमेशा सीख देते हैं। अगर कुछ सीखना है। तब अपने से योग्य विद्धान और अनुभवी व्यक्ति का संग साथ करो। लेकिन अपनी तारीफ और केवल तारीफ ही सुननी है। तब फिर अपने से अधिक वेवकूफ व्यक्ति का संग साथ करो। लगभग सभी राजनैतिक पार्टियों में आजकल यही हो रहा है।

एक साल पूर्व जो राग हाथी वाले अलापा करते थे। आज पूरे ताल स्वर से वही राग सायकिल वाले अलाप रहे हैं। जो अधिकारी हमारी नहीं सुनेगा। जिले में नहीं रह पाएगा। कार्यकर्ता सुधर जायें। गांवों में जायें लोगों से मिलें उनकी समस्यायें समझें और जाने क्या क्या। अब इनसे पूछो सब सुधर जायें। अच्छी बात है। लेकिन आप कब सुधरोगे। कार्यकर्ता गांवों में जायें। अनुशासित रहें। अच्छी बात है। परन्तु आप क्या केवल और केवल ठेकेदारी, रंगदारी, तीन तिकड़म, दंदफंद और पार्टी की रीति निति कार्यक्रमों की धज्जियां उड़ायेंगे। उड़ाते रहेंगे। हाथ वालों, हाथी वालों, फूल वालों का हश्र देख लो। हम तुम्हारे हितैषी हैं। विरोधी नहीं। यह पद और रुतबा अच्छा है। परन्तु नव्वे साल का पट्टा नहीं। तुम आज जहां हो। वहां पर चाल चलन चरित्र व्यवहार अनुशासन के बल पर अपना मुकाम बनाओ। जिससे आगे आने वाले दिनों में लोग आपको याद करें। आपकी दुहाई दें। बात बात में उखड़ जाने की आदत मत डालिए। निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय। अन्यथा जो हाथी वाले आपके आस पास घूम रहे हैं। यही हाल रहा तब वह दूर दूर तक नहीं दिखायी देंगे। अपने से बड़ों का सम्मान करके आप किसी पर एहसान नहीं करते। आपसे छोटे आपको जो करता देखेंगे। वहीं वह आपके साथ करेंगे। राजाओं, प्रिन्सों, राजपुत्रों आदि आदि को अकड़, उपेक्षा, अपमान, धौंस, धमकी, षड़यंत्र, तिरस्कार से केवल और केवल विनाश का मार्ग और मंजिल मिली है। मुक्त हंसी और सबसे प्रेम का मंत्र सीखना चाहो सीख लो।

चलते चलते-

दो बुजुर्ग आपस में बात कर रहे थे। एक शिक्षक रहे थे। बोले हम तो अपने जमाने में जो छात्र सबसे ज्यादा शैतान और उदंड होता था, उसे मानीटर बना देते थे। दूसरे बोले हम तो शैतान बच्चों से ग्रस्त पिताओं को अपने बच्चों की जल्द से जल्द शादी कर देने की सलाह देते हैं। सोच कर बताइए अरविंद केजरीवाल को मानीटर बनाने और राजनीति से शादी करने की सलाह किसने दी।

आज बस इतना ही। जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट

फर्रुखाबाद परिक्रमा- राजनैतिक पार्टियों का सच- कितना सही कितना गलत

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Posted on : 25-11-2012 | By : जेएनआई डेस्क | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की उत्ताल तरंगों पर सवार केजरीवाल की नवीन पार्टी ने राजनीति में प्रवेश के साथ कई सवाल खड़े कर दिए हैं। वैसे भी अल्प मतदान और वोटों के बटवारे ने राजनैतिक पार्टियों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गरिमा मर्यादा और उपादेयता पर लंबी बहस की स्थितियां पैदा कर दी हैं।

स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस को भंग कर देने की महात्मागांधी की सलाह को अनदेखा कर दें, तब फिर कांग्रेस पार्टी को देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी कहा जाएगा। देश और प्रदेश में यह पार्टी सर्वाधिक समय सत्ता में रही। वामपंथियों ने संघर्ष और आंदोलन की छोटी अवधि को छोड़कर अपने आपको देश की मुख्य धारा का हिस्सा नहीं बना पाया। समाज वादियों का भी जुड़ने बनने से पहिले ही टूटने और बिखरने का पुराना इतिहास है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा संचालित निर्देशित, जनसंघ से लेकर भाजपा तक आते आते देश की सबसे बड़ी दूसरी पार्टी का सेहरा भाजपा को लगभग स्थायी रूप से मिल चुका है। वैसे चुनाव आयोग में पंजीकृत राजनैतिक पार्टियों की संख्या डेढ़ हजार के आसपास है।

देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को कुल मतदाताओं का लगभग पन्द्रह प्रतिशत और भाजपा को लगभग दस प्रतिशत मत राष्ट्रीय स्तर पर मिलता है। शेष अन्य पार्टियों की स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है। सभी पार्टियां बूथ स्तर तक अपना संगठन मजबूत करने का दावा करती हैं। कुल मतदाताओं की बात न भी करें। तब भी आजादी के बाद से आज तक किसी भी सरकार का गठन कुल मतदान के 50 प्रतिशत या उससे अधिक के आधार पर नहीं हुआ। नतीजतन केन्द्र और प्रांत में अल्पमत की और अब जोड़ तोड़ की सरकारों का गठन हो रहा है। ऐसी स्थिति में अरविंद केजरीवाल की नवगठित पार्टी का भविष्य आशंकाओं और खतरों से मुक्त नहीं है।

लगभग सभी राजनैतिक पार्टियां बातें चाहें जैसी और जितनी भी करें सब की सब व्यक्तिगत और समूहगत महत्वाकांक्षाओं के कंधे पर सवार होकर मैदान में खड़ी हैं। इनमें से किसी पार्टी या किसी भी नेता में यह कहने का साहस नहीं है कि आप हमें मतदान करें या न करें। परन्तु निष्पक्ष और निर्भीक होकर मतदान अवश्य करें। ‘राइट टू रिकाल’ के प्रति अपनी प्रतिपद्धता प्रदर्शित करने वाली केजरीवाल की नयी पार्टी सहमति या असहमति की स्थिति में भी जन सामान्य से आम जादमी के जब निष्पक्ष और निर्भीक होकर मतदान करने के संकल्प के प्रति जागरूक करेगी। तभी वह पार्टियों के झुंड के बीच अपनी अलग पहिचान बना पायेगी।

अन्ना हजारे, केजरीवाल जैसे लोगों के आंदोलन में एक बात साफ हो गई है। देश की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, सहित सारी समस्याओं के लिए जिम्मेदार वह लोग हैं। जो अपने अपने कारणों से मतदान नहीं करते। हमारी सभी राजनैतिक पार्टियों और लोकतंत्र का सच यह है कि मतदान न करने वालों का प्रतिशत मतदान करने वालों से कम नहीं है। कहीं कहीं और कभी कभी ज्यादा तक हो जाता है। अरविंद केजरीवाल की पार्टी को इस गतिज जड़ता को तोड़ना होगा। लोकतंत्र की इस गतिज जड़ता को आपने तोड़ने का प्रयास भी प्रारंभ किया। तब फिर नए युग की शुरूआत हो सकती है। अन्यथा आप भी देश के बड़बोले सूचना और प्रसारण मंत्री के अनुसार पार्टियों के झुंड में खो जायेंगे। वर्तमान परिस्थितियों में देश का जनमानस ऐसा नहीं चाहता है।

लोकबंधु राज नारायण कहा करते थे कि नेता दो तरह के होते हैं। एक टाइपराइटर से पैदा होते हैं। ऊपर वाला टाइप कराकर किसी को भी राष्ट्रीय या प्रांतीय पदाधिकारी बना देता है। लेकिन जन नेता जन संघर्ष करते हुए आम जनता से आते हैं। संप्रति हाई कमानों के चहेते ही बड़े पदाधिकारी हो रहे हैं। जन नेता नहीं। विश्वास किया जाना चाहिए अरविंद केजरीवाल की नई पार्टी ग्राम स्तर से राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारियों को जन संघर्ष के बल पर आगे लाने का काम करेगी। इसके साथ ही साथ जन सामान्य में स्वतंत्र रूप से निष्पक्ष और निर्भीक होकर अनिवार्य मतदान का संदेश और संकल्प प्रसारित करेगी।

कितना सुधार कितना बदलाव

प्रदेश में पुरानी सरकार जाने और नई सरकार आने को लेकर पन्द्रह दिसम्बर को पूरे नौ महीने हो जायेंगे। विदाई का मातम और आगमन के जश्न के बाद दोनो पक्षों के रण बांकुरे मिशन 2014 के लिए अपने अपने नेता को देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर पहुंचाने और लाल किले पर तिरंगा फहराने की महत्वाकांक्षी योजना को पूरा करने में लग गए हैं। एक दूसरे को कोसा जा रहा है। अपनी पीठ थपथपाई जा रही है। दोनो ही देश की सारी समस्याओं के लिए जिम्मेदार देश की सबसे बड़ी पार्टी और उसके बाद वाली पार्टी को भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता के आधार पर कोसने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते। परन्तु पता नहीं अब जो रहस्य पूरे देश को पता है। उससे अनजान बने यह दोनो सूरमा भोपाली एक साथ एक स्वर में केन्द्र की सत्ताधारी पार्टी के साथ जुगलबंदी कर रहे हैं।

इन दोनो पार्टियों का व्यापक जनाधार एक दो अपवादों को छोड़कर केवल और केवल अस्सी लोकसभा सीटों वाले प्रदेश तक में ही सीमित है। दोनो को इसी में अन्य पार्टियों के साथ हिस्सेदारी करनी है। हम कम ज्यादा की बात नहीं करते। इतनी सीटों में ज्यादा से ज्यादा सीटें प्राप्त करके कौन इतने बड़े देश का प्रधानमंत्री बन जाएगा। जोड़तोड़ और परिस्थितियों के बल पर बन भी गया। तब फिर इनमें से किसकी स्थिति चौधरी चरण सिंह, वी पी सिंह, चन्द्रशेखर, इन्द्र कुमार गुजराल, देवगौड़ा से बेहतर होगी। इसकी क्या गारंटी है। गठबंधन सरकारों का नजारा देश और प्रदेश में सबके सामने है। भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता के भय से लोगों को डराने के स्थान पर जनसहयोग के बल पर इनसे लड़ने का आव्हान करिए संघर्ष करिए। जातीयता और कुनवा परस्ती के चक्रव्यूह से निकलने की हिम्मत दिखाइये। जनता आपको हाथों हाथ लेगी। आजादी के बाद देश की जनता के अच्छे फैसलों को स्वार्थी और महत्वाकांक्षियों ने ही बिगाड़ा है। देश प्रदेश के अच्छे भविष्य के लिए आप ऐसा न करें। अन्यथा चुनाव होते रहेंगे। लेकिन न कोई सुधार होगा और न कोई बदलाव।

जिले में कितना सुधार – कितना बदलाव

हाथी वाले गए सायकिल वाले आये- इन्हें भी अगले माह आए और गए पूरे नौ महीने हो जायेंगे। जश्न मन रहे हैं। गलतियां कमियां ढूंढीं जा रहीं हैं। परन्तु सुधार और बदलाव की प्रसव पीड़ा के लक्षण कहीं नहीं दिखाई दे रहे। पेड और प्रायोजित खबरों का इन्द्रधनुष रोज सुबह घरों की कुंडी न खटखटाए। तब फिर जन साधारण यह भी न जान पाए कि हो क्या रहा है।

शुरूआत बड़ी धमाकेदार थी। गुंड़ों को बख्शा नहीं जाएगा। अधिकारियों को सुधरना होगा। होर्डिंगें नहीं लगेंगी। अनाधिकृत लोग अपने वाहनों पर पार्टी झंडा नहीं लगा पायेंगे। परन्तु पैलगी, हाजिरी, विरादरी, नजराने, शुकराने, भेंट, गिफ्ट, सेवा, सुविधा शुल्क आदि आदि ने न कुछ सुधरने दिया। न कोई बदलाव ही दिखा। वरिष्ठता लोकलाज के चलते जो कार्य करने की हिम्मत बड़े नेता नहीं दिखा पाए। वह कार्य उनके चमचे समर्थक और पुत्रगण, परिवारीगण करने लगे। आंधी के आम हैं। लूट सके सो लूट। मीडिया की हिस्सेदारी से नहीं पड़ेगी फूट। फिर पछताए होत क्या जब प्राण जायेंगे छूट। जो विरोध करे ना नुकर करे। करने दो। वह साला तो सबसे बड़ा चोर है। परवाह मत करो। इतिहास गवाह है। जब लूटोगे तभी बड़ा ओहदा या जिम्मेदारी मिलेगी।

हाकिमों का हाल भी नेताओं से आलग नहीं है। मुख्यालय, पुलिस प्रशासन, विकास भवन सहित सारे कार्यालय शिक्षा स्वास्थ्य सहित सब जगह घूम आइए। हर जगह एक ही गाना सुनाई देगा। बड़े साहब बहुत सख्त हैं। सख्त हैं तब फिर रिश्वत सुविधा शुल्क क्यों बढ़ रहा है। बेबकूफ हो। सख्त हैं तभी तो सुविधा शुल्क बढ़ रहा है। सुधार और बदलाव। कभी नहीं हुआ तब फिर अब क्या होगा। जन सेवकों को यह जरा भी स्वीकार नहीं है कि कोई चरित्रवान समझे। अब सुधार और बदलाव नहीं है। तब फिर जनता का भाग्य

भाजपा- आ रही है- जा रही है!

क्षमा करें हम छिदान्वेषी नहीं हैं। लेकिन जब दाल कम हो और नमक ज्यादा नहीं बहुत ज्यादा हो। तब फिर हम क्या करें। अडवाणी की बात करें। तब लगता है कि लौह पुरुष की दुनिया बदलने वाली है। पार्टी कांग्रेस को धकिया कर आने वाली है। गड़करी की बात करें। तब लगता है कि अब गई तब गई। ऊपर से राम जेठमलानी, यशवंत सिन्हां और अब शत्रुघन सिन्हा। पता नहीं किस जनम का बैर है। यूपी वालों और विहारियों का। संघ के दुलारे प्यारे एक महाराष्ट्रियन राष्ट्रीय अध्यक्ष को बर्दाश्त नहीं कर रहे। एक महाराष्ट्रियन ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को मारा। एक ने भाजपा को मर्मांतिक पीड़ा पहुंचाई। देश समाज रानीति में महाराष्ट्र के महत्वपूर्ण योगदान और परम्पराओं को कलंकित कर दिया।

गुजरात के मोदी की बात करें। तब लगता है कि हिन्दुत्व के रथ पर सवार होकर नए भावी प्रधानमंत्री के रूप में भाजपा आ रही है। वहीं कर्नाटक के येदुरप्पा की बात आए। लगता है कि भाजपा जा रही है। पार्टी विद द डिफरेंश नहीं रही। पार्टी रही ही नहीं। कोई किसी की सुनता ही नहीं। कोई पार्टी का शुभचिंतक लगता है रहा ही नहीं। सब किसी के समर्थक या विरोधी हैं। जिलों जिलों प्रदेशों से लेकर केन्द्र तक तबेले में लतियाब ही लतियाब हैं। अब नियंत्रक निर्देशक संघ ने इलाहाबाद कुंभ से मंदिर का राग पुनः छेड़ने का अलाप प्रारंभ कर दिया है। कल्याण की इंट्री बड़े बेआवरू हो कर तेरे कूंचे में हम आए की तर्ज पर हो ही रही है। यहां जिले तक में सबकी सांसें थम गई हैं। चुनाव आते आते देखते रहिए। वचन भंग के दोषियों का भला बहुत मुश्किल लगता है।

(भाजपा) विनोदराय बनाम आर.पी. सिंह (कांग्रेस)

और अंत में- हम कहें वही सही- तुम कहो वह सब गलत

कैग रिपोर्ट को लेकर भाजपा और कांग्रेस में घमासान आने वाले दिनों में वोफोर्स जैसी तेजी पकड़ेगा। नतीजा भी वोफोर्स जैसा ही निकलेगा। इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगा।

इस प्रकरण में प्रारंभिक बढ़त के बाद अब कांग्रेस के मुकाबले भाजपा बैकफुट पर हो गई। दोनो ओर से आरोपों प्रत्यारोपों, तर्कों, कुतर्कों की फुलझड़ियों, अनार और पटाखे छूट रहे हैं। कोई किसी की सुन ही नहीं रहा है। सर्वोच्च संसद असहाय लाचार है। हम कोई काम ही नहीं होने देंगे। सवाल आने वाले चुनाव में वोटों की सैटिंग और विरोधी की पटकनी देने का है। नरेश अग्रवाल, देवेन्द्र यादव, अन्ना शुक्ला, धर्मराज पटेल जैसे कुछ लोग तो बैन्ड बाजे वाले बन कर रह गए। कल बसपा की बजाते थे। हाथी पर सवार थे। आज सपा में हैं। सायकिल पर सवार हैं। कल कहां होंगे। कोई नहीं जानता। परन्तु सही केवल और केवल यही लोग हैं। कल भी थे आज भी हैं और कल भी होंगे। रह गए बेचारे भाजपाई अटल बिहारी वाजपेयी के बाद इस बार सपा से लखनऊ में उतारे गए अशोक बाजपेयी। बेचारे यही गाना गा रहे हैं कि सपा में ब्राह्मणों का बहुत सम्मान है। देखा न अन्ना शुक्ला कैसे भी हों। हैं तो ब्राह्मण ही। अब धरती पुत्र मुलायम सिंह उनका सम्मान कर रहे हैं। तब फिर विरोधियों को पेट में मरोड़ क्यों होती है। अब अन्ना शुक्ला अपराधी हैं माफिया हैं अवसर वादी हैं दल बदलू हैं। क्या हुआ हैं तो ब्राह्मण ही। रावण भी तो ब्राह्मण था। उसकी कोई पूजा नहीं करता। परन्तु हमारे नेता जी तो सभी ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं। सपा में रावण वंशी और चाणक्य वंशी दोनो तरह के ब्राह्मण हैं। हम किसी से कम नहीं हैं। देश में लोकतंत्र है। हमारे नेता जी समदर्शी हैं। आप चाहें जिसे चुन लो। हम आपको रोक तो नहीं रहे हैं।

चलते चलते – सपा की प्रतीक संस्कृति अब जिले जिले में फैलेगी!

कहते हैं कि सही क्या है। यह पता होना लेकिन उसे न करना साहस का अभाव है। इस बार पहले आजमगढ़ से हुई है। लोहिया के अनुयायियों ने अब परिवारवाद का विरोध करना बंद कर दिया है। शिखर से अखिलेश, धर्मेन्द्र, रामगोपाल, डिंपल यादव, शिवपाल यादव, अक्षय यादव तक हुआ यह कारवां प्रतीक यादव तक आ गया है। घर में अब ज्यादती हो रही है, शिवपाल सिंह यादव के साथ। उनका बेटा जिला पंचायत का अपना पहिला चुनाव हार गया था। अब अगर घर से उसके लिए कोई मांग नहीं करेगा। तब फिर कल को हो सकता है। बाहर ही से कोई उसके लिए मांग कर दे। वह राजनीति में प्रतीक यादव से वरिष्ठ तो हैं ही।

महिला आरक्षण बिल पर यदि सपा की जिद के चलते यदि पिछड़ों दलितों और अल्पसंख्यकों को प्रथक आरक्षण की मांग मान ली गई। तब फिर आने वाले दिनों में देश के सबसे बड़े समाजवादी परिवार की महिलायें भी डिंपल यादव का अनुसरण करती हुईं अपने पतियों के साथ लोकसभा और विधानसभा की शोभा बढ़ायेंगीं।

सपा में नेताओं के चरण चिन्हों पर चलने वालों की लंबी जमात है। शिखर पर प्रारंभ हुई प्रतीक संस्कृति जब जिलों में अपने प्रारंभिक रूप के बाद आने वाले दिनों में तेजी से फैलेगी तब फिर प्रदेश में लोक सभा और विधानसभा की कितनी सीटें बढ़ानी पड़ेंगी। इसकी गिनती में देर लग सकती है। परन्तु जिले के अखिलेशों, धर्मेन्द्रों, डिंपलों, अक्षयों, प्रतीकों वह चाहें जिस पार्टी के क्यों न हों। उनकी गिनती तो तत्काल हो सकती है। इस कार्य को आज से अभी से प्रारंभ कर दीजिए। आज बस इतना ही। जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट

फर्रुखाबाद परिक्रमा: अन्ना हजारे बनाम मुलायम के अन्ना

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Posted on : 18-11-2012 | By : पंकज दीक्षित | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

खबरी लाल आज बहुत आछे मूड में लग रहे थे| दीपावली के पांच दिनी त्‍योहार की थकान उतरने के लिए छत पर गुनगुनी धुप का आनंद ले रहे थे| इतने में ही भारत निर्वाचन आयोग के मतदाता पंजीकरण शिविर से पंजीयन की औपचारिकताएँ पूरी करके लौट रहे कुछ नवयुवक आकर दरवाजे पर दस्तक देने लगे|

आनन फानन में खबरीलाल ने छत से उतर कर नीचे आकर दरवाजा खोला और हंस्ते हुए बोले| देश के भावी भाग्य विधाताओं बताओ यह खबरीलाल आपकी क्या सेवा कर सकता है? युवा एक स्वर में बोल पड़े| अंकल हम भी अब मतदाता बन जायेंगे| हम आपकी रिपोर्ट और खबरे बराबर पढ़ते हैं| हमने अच्छी तरह से समझ लिया है कि वर्तमान समस्यायों का समाधान तब तक नहीं होगा जब तक हर आदमी निष्पक्ष और निर्भीक होकर मतदान करना अपना कर्तव्य नहीं समझेगा|

खबरीलाल युवकों की बात सुनकर प्रसन्न हो रहे थे| एक युवक ने कहा खबरीलाल जी समाजवादी पार्टी ने जिन अन्‍ना शुक्ला को उन्नाव से लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी बनाया है वह क्या इंडिया अगेंस्ट करप्शन नायक अन्ना हजारे के भाई या परिवारी हैं| खबरीलाल अचानक उदास हो गए| बोले नहीं नहीं ऐसा कुछ भी नहीं| दोनों के नामो में आधी अधूरी समानता के अलावा कोई समानता नहीं है| यह दोनों एक दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जानते भी नहीं है|

एक नौजवान बोला यही तो हम लोग सोंच रहे थे| अन्ना शुक्ला के विषय में अखबारों में जो कुछ छपा है वह तो सब इतना कुछ है कि चुनाव और लोकतंत्र को मखौल बना देने के लिए काफी है| खबरीलाल जी कैसे इस प्रकार के लोग हर बार चुनाव में नया झंडा डंडा बिल्ला पार्टी नेता लेकर मैदान में आ जाते है| हम तो चुनाव मैदान के नए मतदाता है| हमें इन परिस्थियों में क्या करना चाहिए? एक बोला विधान सभा चुनाव में हमें बहुत अच्छा लगा था| जब भारी दबाब के बाबजूद समाजवादी पार्टी में डीपी यादव को प्रवेश नहीं दिया गया था| परन्तु इस बार तस्वीर बदल गयी है लगती है| खबरीलाल जी बताइए इन परिस्थियों में हम क्या करें?

खबरीलाल नौजवानों की जागरूकता से मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे| नौजवानों की पीठ थपथपाते हुए बोले| आप लोगो को कुछ भी ख़ास नहीं करना है| आपको हर चुनाव में निष्पक्ष और निर्भीक होकर शत प्रतिशत मतदान के संकल्प को पूरा करना है| खबरी लाल आपसे ये नहीं कहते कि किसे वोट देना| यह आपका अपना अधिकार और कर्तव्य है| इसमें हमें या किसी को भी कोई दखलंदाजी नहीं करनी है| परन्तु एक सामान्य मतदाता के नाते खबरी लाल का भी यह अधिकार है कि वेह आपसे कहे कि आपको निष्पक्ष और निर्भीक कोहर शत प्रतिशत मतदान के लिए हर सम्भव प्रयास करना है|

खबरी लाल बोले यदि आप निष्पक्ष और निर्भीक होकर शत प्रतिशत मतदान की राह पर चलेंगे तब फिर राजनैतिक मजबूरियों के चलते राजनैतिक पार्टियाँ किसी को भी प्रत्याशी बना कर चुनाव मैदान में उतारे| परन्तु जीतेगा वाही जिसे आम आदमी जितना चाहेगा| किसी को बुरा मत कहिये| वोटो की मूसलाधार बरसात से राजनीति की सारी गंदगी को बहा दीजिये| राजनैतिक पार्टियों केवल अपने प्रत्याशी चुनती है| उन्हें अपनी मनमानी करने दीजिये| आप चुनाव के समुद्र मंथन में निष्पक्ष और निर्भीक होकर अच्छे जन प्रतिनिधि के रूप में अमृत निकाल दीजिये|

नए नए मतदाता बनने जा रहे नौजवान खबरी लाल की बातो से बहुत प्रसन्न हो गए| सभी एक स्वर में बोले हम सब गाँव गाँव के लिए सभी सम्भव प्रयास करेंगे| खबरी लाल सभी को सफलता की शुभकामनायें देकर पुनः धुप सेंकने छत पर चले गए|

उन्हें फुसत ही नहीं है- विकास कार्य ठप पड़े है-

क्या आपको पता है कि जिला सतकर्ता एवं निगरानी समिति की एक वर्ष से कोई बैठक नहीं हुई है| शासनादेशो के अनुसार क्षेत्रीय सांसद इस बैठक की अध्यक्षता करता है| यह बैठक तीन माह में होनी चाहिए| परन्तु माननीय सांसद पूर्व विधि एवं कानून मंत्री तथा वर्तमान विदेश मंत्री को अपने जिले के विकास कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए पिछले एक वर्ष से फुर्सत ही नहीं मिली कि सतकर्ता एवं निगरानी समिति की बैठक हो| प्रस्तावों का अनुमोदन हो और धनराशी अवमुक्त हो| अरविन्द केजरीवाल को चुनौती देने वाले विदेश मंत्री अब शायद कुंठित हताश निराश होकर अपने जिले में आने से कतरा रहे है| क्यूंकि केजरीवाल यहाँ ठाठ से आये और चले गए|

एक सवाल समिति के सचिव जिलाधिकारी से| क्या आपने समिति के पड़ें अध्यक्ष को वास्तु स्थिति की जानकारी दी है| यदि दी है तो अध्यक्ष जी ने क्या कहा? यदि जानकारी नहीं दी तब फिर क्यूँ नहीं दी? जो कुछ भी है| जिले के अहम विकास कार्यों के सम्बन्ध में इस प्रकार की उदासीनता किसी भी दृष्टि से क्षम्य नहीं है|

और अंत में-

सपा के 55 लोकसभा प्रत्याशियों की सूची जारी हो गयी| फर्रुखाबाद का नाम गायब है| अपने को तीसमारखां समझने वालों के तोते उड़ गए| रातो रात मीडिया वालों की पूछ बढ़ गयी है| प्रायोजित खबरों की धूम मची है| चिट्ठी फैक्स का सञ्चालन बढ़ गया है| देखना है कि आने वाले दिनों में क्या गुल खिलाता है|

चलते चलते–=-

हर पिता यह चाहता है कि उसका पुत्र प्रगति करे| आगे बढ़े| इसमें कुछ भी गलत नहीं है| परन्तु तरीके समय के साथ बदल गए है| नगर और जिले में कहीं भी निकल जाईये| पिता पुत्र के बधाई संदेशो की होर्डिंग्स से सड़के पटी मिलेंगी| ऐसे माहौल में पिता पुत्र एक मीडिया कर्मी के यहाँ पुत्र जन्म पर अयोजीय कार्यक्रम में पहुच गए| पिता अनुभवी था| वह सभी से यथोचित अभिवादन के साथ मिला| होर्डिंगो की बरसात से भीगा पुत्र अकड़ा बैठा रहा| एक दिलजला नहीं माना| बोल बेटा तुम्हारी ही होर्डिंग्स लगी है| पुत्र बोला हाँ अंकल, कैसी लगी? बहुत अच्छी| परन्तु क्या तुम्हारे पिताजी ने तुम्हे अभिवादन का सामान्य शिष्टाचार भी नहीं सिखाया| इस पर पिता के निर्देश पर पुत्र ने वह सब किया जो उसे आते ही करना चाहिए था| आज बीएस इतना ही|
जय हिन्द

लेखक सतीश दीक्षित वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, चिंतक, आयकर के वकील एवं समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के करीबी है|
सम्पर्क पता-
आवास विकास कॉलोनी
फर्रुखाबाद
मोबाइल- 9415473845

दीपावली पर खबरीलाल की फुलझड़ियाँ, बम और धमाके!

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Posted on : 17-11-2012 | By : जेएनआई डेस्क | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

राजनितिक मंच के नए अंपायर रैफरी निर्याणक!

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी जी स्वामी विवेकानंद की तुलना दाउद इब्राहीम से करते हैं। कांगेस के सदाबहार महासचिव दिग्विजय सिंह इंडिया अगेंस्ट करेप्शन के नेता अरविन्द केजरीवाल की तुलना अभिनेत्री राखी सावन्त से करते है। भाजपा के नेता यशवंत सिंह कांग्रेस के महासचिव राहुल गाँधी की तुलना बारात के घोड़े से कर रहे हैं। कोई मोदी को बंदर और गुजरात को अंधेर नगरी चौपट राजा बना रहा। योगगुरू बाबा रामदेव रामलीला मैदान में हुई कांग्रेस की रैली को रावण लीला बता रहे हैं। अन्ना को सेना का भगोड़ा बताने वाले बेनी प्रसाद वर्मा और अन्ना को ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार में डूबा व्यक्ति बताकर बाद में माफ़ी मांगने वाले मनीष तिवारी के शुरूआती दौर के बाद इस समय राजनीति के मंच पर उतरे नए अंपायर रैफरी निर्याणक लोग अपने-अपने सोच आकुलन और मानसिकता के अनुसार लोगो की तुलना करने में लगे हुए हैं।

भारतीय राजनीति में शुरू हुए इस खेल में इस समय दनादन चौके छक्के पड रहे हैं। कल तक शालीन, शिष्ट, सुलझे हुए समझे जाने वाले लोग इस गंदे खेल में इस तरह उलझ गए हैं। जैसे इसे राष्ट्रीय खेल बनाकर ही दम लेंगे। अब राहुल को बरात का घोडा बनाये जाने पर कांग्रेसी नेता भले ही भाजपा और भाजपा नेताओ पर लाल पीले होते रहें। परन्तु भाजपा नेता ने तुलना के साथ यह भी इशारा कर दिया कि बरात के घोड़े की शादी नहीं हो सकती। वह केवल लोगो की शादी करा सकता है। हममें से कोई. नहीं चाहेगा कि राहुल गाँधी भारतीय राजनीति के नए डॉ राममनोहर लोहिया  या अटल विहारी बाजपेयी बनें। कांग्रेसजनो, भले आपको बुरा लगे। विनम्रता और क्षमा याचना के साथ में यही कहूँगा। राहुल गाँधी में इतनी स्वीकारोक्ति का साहस नहीं है। वह अटल बिहारी बाजपाई की तरह कुंवारे तो हैं। परन्तु बह्म्चारी नहीं हैं। राहुल गाँधी और उनके दरबारी छाती ठोंक कर पूरा विश्वास के साथ यही कहेंगे। राहुल भैया कुंवारे भी है और बह्म्चारी भी है। भला कोई कांग्रेसी नेता यह कैसे स्वीकार करेगा कि उसकी तुलना भाजपा के सबसे बड़े नेता से की जाये।

परन्तु अपने गडकरी साहव है ना अरे वही अपने नागपुर वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वंय सेवक संघ के चहेते भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष। वह जब बोलते हैं तब बोलते ही रहते हैं। उन्हें डर किसी का नहीं है। और तो और अपने अरविद केजरीवाल तक दांव खा गए। उन्होंने सोचा था चाल चलन और चरित्र में अपना कथित रूप से अलग स्थान रखने वाली भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर प्रमाणों के साथ हमला बोलेंगे। तब फिर आन बान शान के धनी गडकरी साहव किसी बादशाह सिंह, बाबू सिंह कुशवाह या राजनीति में उनके प्रमोटर रामलला के सबसे बड़े उपासक बजरंगी विनय कटियार जैसे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष को अपना चार्ज देकर नागपुर जाकर शरद पवार के सच्चे उत्तराधिकारी बनने का पूरे मनोयोग से प्रयास करेंगे।

केजरीवाल साहव राजनीति के नए खिलाडी हैं। वह नहीं समझ पाए कि कांग्रेसी राबर्ट वाड्रा की तरह गडकरी साहव भाजपा के राबर्ट वाड्रा हैं। कम से कम राजनीति के भ्रष्टाचार में वह आगे हैं। ऐसा न होता तब शालीनता, सुचिता, नैतिकता, सभ्यता ,संस्कृति, संस्कारो, मूल्यों की दुहाई देने वाली भाजपा उन्हें अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष और वह भी दो–दो बार बनाने को तैयार नहीं होती। केजरीवाल साहव आप अभी राजनिति के  नौसिखिए हो। धीरे-धीरे सब हकीकत पता लग जाएगी। भाजपा गडकरी को क्लीन चिट दे रही है। आपकी टीम में भी फर्रुखाबाद से लेकर लखनऊ दिल्ली तक कई मिनी गडकरी हैं। आप अन्ना हजारे नहीं हो सकते। बाबा रामदेव आप होना नहीं चाहते। इसलिए अभी जो दूसरों के दामन पर कीचड़ उछाल कर सुर्खियों में छाये  हुए हो। कल तक अपनी टीम के छोटे बड़े गडकरियो,  वाड्राओ को क्लीन चिट देनी पड़ेगी। जब वकौल आपके राजनिति के हमाम में सब नंगे ही हैं। आप इसी माह राजनितिक पार्टी बना रहे हैं। तब फिर लोग जो आपसे जले फुंके बैठे हैं। दीवाली से शुरू कर होली तक आपके कपडे  उतरेंगे नहीं। फाड़ देंगे और आपको और आपकी टीम को राजनिति के हमाम में अपने से ज्यादा बड़ा नंगा साबित करने के लिए कुछ भी बकाया नहीं रखेंगे। हम सबको अच्छा लगेगा यदि भाजपा की तरह अपने आपको पार्टी बिद द डिफरेंस साबित करने में कामयाब हो।  हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं और रहेंगी।

गडकरी साहव! आप तथा विभिन्न राजनैतिक दलों में मौजूद आपके साथी महान हैं। कुछ भी कहो। यह मानेंगे नहीं। यह कभी भी किसी की तुलना किसी से कर सकते हैं। कोई भी आरोप लगा सकते हैं। रामजेठमालानी भी अब आपकी लाइन में आ गए हैं। उन्हें आप तो भ्रष्ट लगते ही हैं। भगवान राम भी अच्छे पति नहीं लगते। खैर मनाइए उन्होंने राम की तुलना रावण से नहीं कर दी। यदि वह ऐसा कर भी देते तब फिर आप उनका कर भी क्या लेते। अभी तक कांग्रेसियों को भला बुरा भ्रष्ट बेईमान डूबता जहाज आदि कहने के अलावा आपने अपनी पार्टी के कांग्रेसी समकक्षों के विरुद्ध क्या तीर मार लिया है। सबके सब मजे कर रहे हैं। अपनों के द्वारा लगाये गए आरोपों पर सर धुन रहे  हैं। साथ ही साथ दाउद इब्राहीम और स्वामी विवेकानंद की फोटो अपने घर से पार्टी के राष्ट्रीय ,प्रादेशिक और जिला कार्यालयों में तत्काल लगाने का परिपत्र स्वयं अपने नाम और हस्ताक्षरों से जारी करने की जुगत भिड़ा रहे हैं। हकीकत यह है कि पावन पुनीत कार्य अतुलनीय तुलना का ऐतिहासिक प्रयास आपके अलावा कोई दूसरा करने की हिम्मत नहीं जुटा सकता है। सुषमा स्वराज, सोनिया गाँधी के प्रधानमंत्री बनने पर मुखर विरोध कर सकती हैं।

गोस्वामी जी ने सही कहा है “मोहन नारि नारि के रूपा” परन्तु अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नागपुर वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष की इस दिव्य अनुभूति और आईक्यू की नई व्याख्या करने वाली तुलना पर कुछ भी नहीं कह सकती। आखिरकर भाजपा में संभावित प्रधानमंत्रियो की लम्बी लाईन में सुषमा स्वराज जी पहले पांच लोगो में हैं। पता नहीं कल को किसकी जरुरत पड़ जाये। कौन किस वक्त काम आ जाये। अपने गडकरी साहब जो भी हैं जैसे भी है। अपनी प्यारी दुलारी अनोखी राष्ट्रीय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष आज की तारिख में हैं। ऐसे में कौन उनसे पंगा ले। जो कहते हैं कहने दो चुप रहने में हर्ज ही क्या है।

गडकरी जी ! आप और आप जैसे विभिन्न पार्टियों में मौजूद राष्ट्रीय प्रांतीय और स्थानीय नेता कभी भी किसी पर कोई भी आरोप लगा सकते हैं, कुछ भी कह सकते हैं। यह अपने ऊपर लगाये गये आरोपों को झूठ का पुलिंदा और बेबुनियाद बताकर स्वयं ही क्लीन चिट ले लेते हैं। इन्हें येन केन प्रकारेण मीडिया की सुर्खियो में रहने का शौक है। कभी अपनी ही बातों के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं। तब फिर मीडिया को बुरी तरह गरियाने लगते हैं। ऐसा लगता है। मीडिया न हुई गरीब की लुगाई हो गई। जिससे सब नैन मटक्का करते भौजाई भौजाई कहते हैं।

गडकरी जी ! मौजूदा रजनीति में अहंकार के प्रतीक पुरुष गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की तुलना आप महात्मा गाँधी ,सरदार पटेल, मोरार जी देसाई ,केशू भाई पटेल आदि में किससे करेंगे। नरेन्द्र मोदी जी! क्या आपमें अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी जी की तुलना डा० श्याम प्रसाद मुकर्जी, दीन दयाल उपाध्याय ,अटल बिहारी बाजपेयी या अडवाणी जी से करने की हिम्मत है। गडकरी जी की तुलना थोड़े किन्तु परन्तु के साथ बंगारू लक्ष्मण के साथ हो सकती है। फिर भी पूरी पार्टी गडकरी जी को क्लीन चीट दे रही है। इसे आप क्या कहेंगे। कुछ नहीं फोटो शोटो अपनी जगह। अब न तू मेरी कह। न मैं तेरी कहूं। तू मुझे क्लीन चिट दे। मैं तुझे क्लीन चिट दूं।

राष्ट्रपिता महात्मागांधी की तुलना सोनिया गांधी राहुलगांधी तो क्या इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी से भी नहीं हो सकती। परन्तु अपने गड़करी साहब तो गड़करी साहब ठहरे। ऊपर से नागपुर वाले। अंदर से विवेकानंद, दाउद इब्राहीम, शिवाजी, नाथूराम गोडसे और जाने जाने क्या हैं। गड़करी साहब! सुजन या दुर्जन किसी की किसी से तुलना नहीं की जानी चाहिए। क्या दिन और रात की तुलना हो सकती है। क्या धरती और आकाश की तुलना हो सकती है। योग गुरू बाबा रामदेव का जो गोरख धंधा सामने आ रहा है। उसकी तुलना क्या किसी से विशेषत: भ्रष्टाचार के विरुद्ध जंग लड़ रहे अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल से हो सकती है। नहीं हो सकती, करनी भी नहीं चाहिए। अगर रामलीला मैदान की कांग्रेस की रैली रावण लीला थी। तब फिर विगत वर्ष रामलीला मैदान में आपकी लीला जिसमें आप महिलाओ के कपड़े पहन कर भागे थे। उसे क्या कहा जाएगा। आपके अनुसार ही हानि, लाभ जीवन मरण यश अपयश ईश्वर के हाथ में है। विधाता के हाथ में है। यदि हमारे क्रांतिकारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एसे ही रण छोड़दास होते। तब यह देश कैसे आजाद होता। विशुद्ध जातीय आधार पर राजनीति कर रहे रामलला की अनुयायी साध्वी उमा भारती और कल्याण सिंह की तुलना क्या शबरी निषाद राज और केवट से की जा सकती है। नहीं की जा सकती। करनी भी नहीं चाहिए।

परन्तु अपने गड़करी साहब के क्या कहने स्वामी विवेकानंद की तुलना दाउद इब्राहीम से कर डाली। बबाल हुआ। अब सफाई दे रहे हैं। मीडिया को कोस रहे हैं। किसी भी रूप में किसी भी संदर्भ में यह तुलना नहीं होनी चाहिए थी। नहीं की जानी चाहिए थी। परन्तु गड़करी साहब के साथ पूरी पार्टी खड़ी है। सब उन्हें क्लीन चिट दे रहे हैं। सब उनका हौसला बढ़ा रहे हैं। शौक है। तब फिर दाउद इब्राहीम की तुलना हाजी मस्तान ओस्मा विन लादेन से करिए। आपके विचार बहुत ऊंचे और धर्म निरपेक्ष हैं। तब फिर यह तुलना रावण कंस और गोडसे से हो सकती है। वैसे इसकी कोई जरूरत नहीं है। अपने यहां तो वक्त पड़ने पर गधे तक को बाप बनाने का चलन है। मतलब निकल जाए तब फिर बाप तक को गधा बना लेते हैं।

दिग्विजय सिंह जी, राम विलास पासवान, लालू यादव, बेनी प्रसाद वर्मा, मनीष तिवारी तुलना करने में किसी से पीछे नहीं हैं। अत: आपको घबड़ाने की जरा भी जरूरत नहीं है। दिग्विजय सिंह, अन्ना हजारे, की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से सांठ गांठ मिली भगत जताने में जरा सी भी देर नहीं करते। राम विलास पासवान चुनाव के दिनों में वीर अब्दुल हमीद का हमशक्ल नहीं तलाशते हैं। ओसामा बिन लादेन का हमशक्ल खोज वोट बैंक की सियासत करते हैं। लालू प्रसाद जी के लिए दुनिया में उनके और उनकी पत्नी रावड़ी देवी की तरह आदर्श पति पत्नी और नेता ढूंढने से नहीं मिलेगा। वह आदर्श सांसद हैं। पति पत्नी दोनो आदर्श मुख्यमंत्री हैं। चारा घोटाला सीबीआई जांच पड़ताल आदि जैसी सारी प्रक्रियायें उनके लिए व्यर्थ बेमतलब हैं। बिहार के कांग्रेसी नेता सीताराम केसरी की तर्ज पर लालू प्रसाद भी खाता न वही लालू रावडी कहें वही सब सही। उनकी बातों पर हंसिए तालियां बजाइए और चाहें अपना सर धुनिए।

सपा से कांग्रेस में आये वेनी प्रसाद वर्मा को अन्ना हजारे सेना का भगोड़ा लगता है। मनीष तिवारी को अन्ना हजारे ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार में सने नजर आते हैं। उनकी इसी विशेष योग्यता पर उनका प्रमोशन भी हो जाता है। नतीजतन सौम्य, सुशील, शिष्ट कहे जाने वाले सलमान खुर्शीद जैसे जोग भी वही रास्ता अपनाते हैं। परन्तु अनगिनत आरोपों के बाद भी प्रमोशन पा जाते हैं।

गड़करी जी ने आईक्यू के हवाले से विवेकानंद और दाउद इब्राहीम की आलोचना क्या की। बैठे ठाले लोगों को अपने अपने हिसाब से एक दूसरे की तीसरे से चौथे की दनादन तुलना होने लगी। लोग सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की तुलना डा० राममनोहर लोहिया से करने लगे। यह तुलना नहीं हो सकती। करनी भी नहीं चाहिए। लोहिया के समाजवादी दौर में पैसा प्रधान नहीं था। जाति की तब चर्चा भी नहीं होती थी। जाति तोड़ो की चर्चा होती थी। मुलायम सिंह यादव के समाजवादी दौर में पैसा और जाति ही महत्वपूर्ण हैं। दबंगई धौंस धमकी विश्वासघात अतिरिक्त योग्यता है। नरेश अग्रवाल आज आधुनिक गांधी और लोहिया हैं। कांग्रेस भाजपा लोकतांत्रिक कांग्रेस, सपा और बसपा में होते हुए पुन: पठ्ठा धड़ल्ले से सपा में है। लाखों करोड़ों खर्च करके मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की उपस्थिति में जन्म दिन का जश्न मनाया है। कोई उसका बाल भी टेड़ा नहीं कर पाता। यही आज का समाजवाद है।

आज के दौर में डा० लोहिया और नरेश अग्रवाल दोनो अगर मुलायम सिंह यादव से चुनाव लड़ने हेतु टिकट मांगते। तब फिर डा० लोहिया पर विचार भी नहीं होता। नरेश अग्रवाल शान से टिकट ले उड़ते। बताओ किससे किसकी तुलना करोगे। गड़करी साहब हमारे यहां के धीरपुर नरेश आपकी पार्टी छोड़कर सपा में गए। दो बार जीते। तीसरी बार हार गए। तब फिर आपके पार्टी में हाजिर हो गए। बताइए इनकी तुलना किससे करिएगा। यकीन मानिए कल को आपने इन्हें लोकसभा चुनाव में पार्टी का टिकट न दिया। यह श्रीमान जी आपके यहां रहेंगे नहीं। आप इनकी तुलना चाहें जिससे करें। करते रहें। सब इनके ठेंगे पर है।

गडकरी जी! स्वामी विवेकानंद और दाउद इब्राहीम की तुलना आपकी अपनी खोज है। अच्छी क्षमताओ उपलब्धियों वाले महान लोगों की आपस में तुलना नहीं करनी चाहिए। आपने ऐसा महान कार्य कर दिया कि बदनाम लोगों तक को बोलने का मौका दे दिया। बाबा जय गुरुदेव, सत्य सांई बाबा आशाराम बापू, निर्मल बाबा सहित धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में सक्रिय किन लोगों की तुलना किससे करोगे।

विवेकानंद, दयानंद, रामकृष्ण परमहंस, सूरदास, तुलसीदास, मलिक मोहम्मद जायसी, गौतम, गांधी, नानक, महावीर, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, बीर अब्दुल हमीद, अशफाक उल्ला खां आदि अनगिनत महान विभूतियों में किसकी तुलना किससे करोगे। क्यों करोगे। क्या जरूरत है।

महादेव अब गुन भवन वष्णु सकल गुण धाम,

जाको मन जामें रमे ताहि ताहि सन काम!

गड़करी जी! कश्मीर से कन्या कुमारी तक महाराष्ट्र से बंगाल तक इस पावन पवित्र देश में हर जाति धर्म वर्ग की एक से एक महान विभूतियां हुईं हैं। आज भी हैं। इनके सबके बीच विवेकानंद की किसी आधार पर दाउद इब्राहीम से तुलना करके आपने अच्छा नहीं किया। आपने वीर सपूतों की आत्मा को दुख पहुंचाया है। आपकी पार्टी भले ही आपको माफ कर दे क्लीन चिट दे दे। परन्तु इस देश का जन मानस जो मीडिया की सुर्खियों में नहीं आता। आपको कभी माफ नहीं करेगा। तुलना की जो नई पद्धति आपने खोजी है। वह भारतीय राजनीति में आने वाले दिनों में गंदगी संड़ांध को और बढ़एगी। इसके जिम्मेदार होंगे आप और केवल आप।

चलते चलते _

अब जब खबरीलाल म्यान से बाहर हुए जा रहे हैं। तब फिर राखी सांवत कैसे खामोश रहतीं। कांग्रेस के महा सचिव दिग्विजय सिंह द्वारा उनकी तुलना अरविंद केजरीवाल से किए जाने पर वह घायल शेरनी की तरह विफर पड़ीं। बोलीं देख मुझे ऐसी वैसी मत समझियो। मुझे बदनाम करने की कोशिश मत करना। मैं मुन्नी नहीं हूं जो तेरे जैसों के नाम पर बदनाम हो जायें। मैं हूं राखी सांवत। बना रहे तू कांग्रेसी भड़भूजा। तेरी हिम्मत तू मेरी तुलना अरविंद केजरीवाल से करेगा। केजरीवाल की केजरीवाल जाने। उसके एक्सपोजर से तुझे खाज खुजली या गुदगुदी नहीं होती। यह तुम दोनों जानों और तुम्हारा काम जाने।

लेकिन दिग्विजय सिंह! मुए मेरे एक्सपोजर से तुझे गुदगुदी नहीं होती। तेरा मन सीटी बजाने का नहीं होता। तब इसमें मेरा या मेरा एक्सपोजर का क्या दोष। करम जला तू है ही ऐसा। ऐसा न होता तब फिर खजुराहो वाले मध्य प्रदेश को छोड़कर दिलजली खुदगर्ज दिल्ली के वियावान में बौराया, मन्नाया यूं घूमता। और पार्टियों की बात छोड़। सोंच कर बता तेरी अपनी पार्टी में कांग्रेस पार्टी में पांच लोग भी ऐसे हैं। जो वास्तव में तुझे पसंद करते हों और तू उन्हें पसंद करता हो।

बात को ज्यादा बढ़ाऊंगी नहीं। मैं इज्जतदार स्वाभिमानी महिला हूं। दिलजलों के मुहं नहीं लगती। अब अगर मेरे एक्सपोजर से तुझे गुदगुदी नहीं होती। तेरा मन सीटी बजाने का नहीं करता तब फिर कमजोरी और मजबूरी को समझ। इस कमजोरी और मजबूरी की दवा अपने पिता समान और मेरे बाबा समान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता उत्तर प्रदेश उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केन्द्रीय मंत्री आंध्र प्रदेश के पूर्व राज्यपाल पंडित नारायणदत्त तिवारी से पूंछ ले। आगे के लिए हिदायत दे रही हूं। कभी मेरे ही नहीं किसी के लिए भी इस तरह की बेहूदा बात कही। तब फिर सरे बाजार तेरी इज्जत नीलाम कर दूंगी। नाच न जाने आंगन टेड़ा। जब नहीं जरा भी दम तब क्या करेगा बम। समझ गया दिग्गी राजा की दुम। मैं अपनी इज्जत और प्रतिष्ठा की भरपाई के लिए तेरे विरुद्व ५० करोड़ की मानहानि का दावा करने जा रही हूं। आ जाएगी तेरी भी अक्ल ठिकाने।

राखी सांवत और जाने क्या कहतीं। परन्तु हमी ने रोक दिया। आप तो दयालु मंद महिला हैं। इतना जुलाब काफी है। इतने पर भी न सुधरें तब फिर आगे देखना। राखी सांवत जिस अंदाज में आई थीं। वैसे ही तेवर और अंदाज के साथ वापस चली गईं।

खबरीलाल भी अच्छा तो हम चलते हैं!  कहते हुए अपने अगले शिकार की तलाश में चल दिए। पुन: दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ सम्बंधित लोगों से विनम्र क्षमायाचना के साथ आज बस इतना ही। जय हिन्द!  हमें भरोसा है विश्वास है जिस तरह आप आज दीपावली पर दिया जलाना नहीं भूलेंगे। ठीक उसी तरह आने वाले हर चुनाव में निष्पक्ष और निर्भीक होकर वोट डालना भी नहीं भूलेंगे।

सतीश दीक्षित

एडवोकेट