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ओ जाने वाले, हो सके तो लौट के आना, न आना तो मनचाही पोस्टिंग पा जाना!

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Posted on : 13-01-2013 | By : JNI DESK | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

पक्की खबर है कि कड़क और हनक रखने वाले अपने जिलाधिकारी जी पुनः लंबी छुट्टी पर चले गए हैं। अपने एक साल से भी कम समय में जब जब जिलाधिकारी जी छुट्टी पर गए। विध्न संतोषियों ने यही खबर उड़ायी और उड़वायी। अब गए अब वापसी नहीं। परन्तु साहब बहादुर इन विध्न संतोषियों की छाती पर पुनः दाल दलने के अंदाज में उसी हनक और ठसक के साथ लौट आए। लोग फिर अपने अपने अंदाज में उल्टी गिनती गिनने लगे।

इस बार छुट्टी पर नहीं स्थायी रूप से जाने की बात है। अपने अपने दरबारों में ही नहीं कंपिल से लेकर खुदागंज और मदनपुर मुहम्मदाबाद से लेकर शमसाबाद, अमृतपुर, राजेपुर, नबावगंज, कमालगंज तक ही नहीं फतेहगढ़ फर्रुखाबाद बढ़पुर के हर गांव गली बाजारों में केवल एक ही चर्चा है। अब गए, अब वापसी नहीं होगी। अभी बड़े दिनों की छुट्टी में तो गए ही थे। उससे पहले भी गए थे। नेती के सबसे बड़े दरबार में तो रामराज्य की वापसी जैसा वातावरण बन गया है। कुछ चमचों ने तो मिष्ठान वितरण तक करवा दिया। लगभग बाईस वर्ष पहिले भी सायकिल सिंहों ने तत्कालीन जिलाधिकारी के स्थानांतरण पर ऐसे ही तेवर दिखाए थे। क्योंकि जिला अधिकारी ने जिले भर में व्याप्त ठेके पर खुली सामूहिक नकल की बीमारी पर नकेल डाल दी थी। सायकिल सिंहों को अपनी बादशाहत पर खतरा नजर आने लगा था। सायकिल सिंहों ने तब भी यही समझा था। स्थानांतरण के खेल में वह जीत गए। परन्तु तबके अविभाजित जिले में स्थानांतरित जिलाधिकारी को पूरे एक सप्ताह जनता के द्वारा जो जीवंत भाव भीनी विदाई मिली। उसकी बाद में अभी तक कोई दूसरी मिसाल नहीं है।

जानकार लोगों का कहना है कि इस बार भी तमाम छोटी बड़ी बातों के साथ ही मामला दो माह बाद होने जा रही परीक्षाओं को लेकर ही है। परीक्षाओं में अगर ठेके पर खुली सामूहिक नकल का खेल बंद हो गया। तब फिर साल भर शिक्षा माफिया और मीडिया का लुकाछिपी का खेल कैसे चल पाएगा। नहीं समझे समझने की कोशिश करो। इसी लिए नेता इस बार विशेष रूप से सावधान है। अपने आप सफाई देने लगते हैं। सोते सोते बुदबुदाने लगते हैं। नहीं नहीं हम ट्रांसफर पोस्टिंग के लफड़े में नहीं पड़ते। जो भी आएगा जाएगा हमारे काम तो करेगा।

परन्तु जब नेती नेता यह देखता है कि उसकी बात का सुनने वाले पर कोई विशेष असर नहीं पड़ रहा। तब वह धीरे से रहस्य बताने के अंदाज में कहता है। अरे नहीं भाई। लोगों का क्या चाहें जो कुछ कहें। सवाल जाने का नहीं है। अच्छी पोस्टिंग का है। क्या रखा है सवा दो तहसीलों वाले इस जिले में। फिर और धीरे बोलता है-

झांसी गले की फांसी दतिया गले का हार,
ललितपुर न छोड़िए जब तक मिले उधार!

छोटे सिंह उर्फ सहकारिता सिंह!

सहकारिता विभाग के एक बहुत बड़े अधिकारी सपा के एक बहुत बड़े सिंह की तगड़ी झाड़ खाने के बाद रुआंसे अंदाज में बताने लगे। हम क्या करें भइया! हमारी समझ में ही नहीं आता। सहकारिता के जिले में हुए चुनावों में सपा के एक बहुत बड़े सूरमा ने हमें पटक पटक कर मारने के अंदाज में बुरी तरह से डांटा। स्वयं तो वह अपने पूरे जोड़ तोड़ के बाद भी सहकारिता चुनाव में कुछ अपने पक्ष में कर नहीं पाए। हम पर खुले आम एक तरफा पक्षपात का आरोप लगाकर कड़ी कार्यवाही करवाने का भय दिखाने लगे। यह तो वही बात हो गई कि घोड़े पर बस नहीं चला और लगे लगाम मरोड़ने। अब बात आपको बुरी लगे तब फिर हम क्या करें। जिले में सहकारिता सिंह का मतलब है छोटे सिंह। जिले में सहकारिता के इस चक्रव्यूह या शंकर जी के धनुष चाहें जितने जतन करो, मंत्री रहो चाहे संत्री रहो तोड़ नहीं पाओगे। ऐसे में हम क्या करेंगे। कमल सिंह हाथी सिंह या हाथ सिंह सहकारिता के इसी मिनी ओलंपिक में इसी लिए हाथ ही नहीं डालते।

पूरे प्रदेश में सहकारिता भले ही सपा कार्यालय बनी हो। परन्तु जिले में सहकारिता सिंह का मतलब है छोटे सिंह। यहां सपा सिंह चाहें गरजें बरसें कोई कला किसी की चलने वाली नहीं। छोटे सिंह चाहें हाथी सिंह बने या हाथ सिंह। वह चाहें लोक सभा विधानसभा का चुनाव जीतें या हारें। परन्तु सहकारिता चुनाव में उनकी कोई सानी नहीं है। सहकारिता में छोटे सिंह बड़े बड़े सिंहों और सपा सिंहों के छक्के छुड़ा देते हैं। सही ही कहा है-

इस सादगी पर कौन न मर जाए ए खुदा,
लड़ते हैं मगर हाथ में तलवार भी नहीं।

विवेक आनंद हास्य और प्रेम- इन्हें अपनाकर तो देखो!

इस बार स्वामी विवेकानंद वर्ष भर याद किए जायेंगे। अगले वर्ष 11 जनवरी को हास्य दिवस पुनः मनायेंगे। हर पंथ मजहब सम्प्रदाय हमें प्रेम का ही तो उपदेश देते हैं।

प्रेम है जीवन हमारा प्रेम प्राणाधार है,
प्रेम ही सुख शांति का सच्चा सबल आधार है।

परन्तु हम जयन्तियां पुण्य तिथियां संकल्प दिवस के बल मनाते हैं। मनाते नहीं। हमारे आज के सारे कष्टों चाहें वह पारिवारिक सामाजिक, राजनैतिक हों प्रादेशिक हों या राष्ट्रीय कारण यही है कि हम प्रेम और उन्मुक्त हंसी को भूल गए। कितनी भी विपरीत परिस्थितियां हों। हम हंसना मुस्कराना अवसर के अनुरूप खिलखिलाना और आपस में प्रेमभाव से रहना न छोड़ें। सच मानिए हमारी सच्ची हंसी और प्रेमभाव हमें सहज रूप से सफलता के मार्ग पर ले जाएगा। प्रेम या उसे विवेक और आनंद का रूप मान लीजिए। उसमें निर्मल हंसी का भाव दे दीजिए। हमारे सारे छल कपट द्वेष दंभ, पाखंड आदि को स्वतः भस्मीभूत कर देंगे। बात उपदेश या प्रवचन की नहीं है। बात केवल और केवल स्वयं ही सोचने विचारने और अपनाने की है। हमारा जागृत विवेक हमें शास्वत आनंद के मार्ग पर ले जाएगा। आओ उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक सक्रिय रहो। फिर कहता हूं इन्हें मनाओ नहीं। मन वचन कर्म से अपनाओ। अन्यथा-

दीप इनके जले दीप उनके जले वर्तिका आदि से अंत तक जल गई,
राम तुमने कहा राम हमने कहा राम की जो कथा थी सपन बन गई।

हमने तुमने राम कहा माना नहीं। इनके उनके दीप जले। परन्तु मन के दीप नहीं जले। आइए! विवेकानंद जी स्मृति में मन के दीप जलायें।

सबको अपना गणित याद है!

दुर्भाग्य ही है कि राजनीति की तुलना शैतानियत से होने लगी है। यदि ऐसा न होता तब फिर आधे के लगभग मतदाता मतदान से अरुचि नहीं दिखाता। इससे भी अधिक दुर्भाग्य पूर्ण यह है कि किसी भी पार्टी का बड़े से बड़ा नेता यह अपील करने की हिम्मत नहीं दिखाता। मतदाता किसी को भी मतदान करें। परन्तु मतदान अवश्य करें।

एक बहुत बड़ी पार्टी के बहुत बड़े नेता पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में कह रहे थे। जिसका जो व्यवसाय व्यापार है। वह उसे जीवन भर करता है। परन्तु हम राजनीतिज्ञों को हर चुनाव में अपने काम का नवीनीकरण कराना पड़ता है। हम अपने कार्यकाल में कितना भी अच्छा कार्य क्यों न करें। उनके कहने का मतलब यही था कि असली सफलता केवल और केवल चुनाव जीतने में है। इसके अतिरिक्त किसी में नहीं। वोट बैंक की राजनीति का सही मतलब है। जातिवाद की निकृष्ट राजनीति। इसके आगे चुनाव सुधार दागियों को मैदान में न उतारने मतदान का प्रतिशत बढ़ाने आदि की सब बातें व्यर्थ बेमतलब और बेकार हैं।

नए साल के साथ ही लोक सभा चुनाव की गतिविधियां जोर पकड़ने लगी हैं। बातें कुछ भी हों मकसद लक्ष्य चुनाव जीतने सरकार बनाने तक ही सीमित है। मतदान कम हो न हो। चुनाव सुधार हों न हों। वास्तव में दागी मैदान में न उतारे जायें। इससे किसी को कुछ भी लेना देना नहीं है। सबके गणित साफ हैं। सबको अपने गणित याद हैं। भाजपा मोदी को राजधर्म की सारी नसीहतें भूलकर जिताऊ घोड़ा मानकर चुनाव रण संग्राम के नेतृत्व के लिए तैयार कर रही है। कांग्रेस को राहुलगांधी से अधिक आगे पीछे कुछ दिखता ही नहीं है। गुणगान चाहें जिसका चाहें जितना करो। परन्तु हकीकत यही है कि वर्तमान में महात्मागांधी, राहुलगांधी तथा दीनदयाल उपाध्याय, नितिन गड़करी में चुनावी नायक या प्रत्याशी राहुलगांधी नितिन गड़करी या फिर नरेन्द्र मोदी को ही बनाया जाएगा। लोकतंत्र के अतीत और वर्तमान के अंतर को भविष्य में पाटा जा सकता है। यदि हम सब एक जुट होकर खड़े हो जायें। निष्पक्ष और निर्भीक होकर मतदान हर हाल में करने का संकल्प करें।

और अंत में……

अधिवक्ताओं के चुनाव

अधिवक्ता संघ का चुनाव हो चुका है। लंबे समय के बाद काफी जद्दो जहद खींचतान के उपरांत बार एसोसिएशन टैक्स बार एसोसिएशन के चुनाव भी इसी माह सम्पन्न हो जायेंगे। क्या होता रहा। क्यों होता रहा। इस पर चर्चा अब बेमानी है। आप समाज के मार्गदर्शक हैं। कानून के ज्ञाता हैं व्याख्याकार हैं। आपको जिन्हें चुनना है। अपना नेता बनाना है। उन लोगों के बीच आप प्रतिदिन रहते हैं। निष्पक्ष और निर्भीक होकर अपने प्रतिनिधियों को चुनने का साहस दिखाकर औरों के लिए मिसाल कायम करिए। ध्यान रखिए आजादी की लड़ाई के अनेक महानायक आपके ही समाज के थे। नए साल में विश्वास करना चाहिए कि सदर तहसीलवार एसोसिएशन के चुनाव हो जायेंगे।

चलते चलते………..

व्यापारियों के सम्बंध में कहा जाता है कि उन्हें दो पैसे का फायदा होता हो तो, वह मिट्टी को सोना बनाने और बताने के लिए जमीन आसमान एक कर देंगे। अब यही बात राजनीतिज्ञों पर भी लागू होने लगी है। दुनिया के चुनिंदा रईसों में शुमार मुकेश अंबानी, अनिल अंबानी ने नरेन्द्र मोदी को महात्मागांधी और जाने क्या क्या बना दिया। अब बारी नए महात्मागांधी उर्फ नरेन्द्र मोदी की है। देखना है वह कब अंबानी बंधुओं को जमनालाल बजाज और घनश्यामदास बिड़ला बताते हैं। हे महानुभावों, आपका अपना निर्णय है, परन्तु यह क्यों भूल जाते हो कि पूज्य बापू ने ही कहा था महान लक्ष्य अच्छे और सच्चे साधनों से ही प्राप्त करने चाहिए। विभिन्न घोटालों के उजागर होने पर अंबानी बंधुओं के माध्यम से कथित रूप से यह बात सामने आई थी। रिलायंस वाले भाजपा और कांग्रेस दोनो को अपनी जेब में रखते हैं।

कभी सदी के महानायक के होर्डिंग से यूपी का हर नगर मीडिया पटा पड़ा था। आज यही खेल गुजरात में चल रहा है। बड़े लोगों की बड़ी बातें हैं। परन्तु हैं तो यह लोग भी हाड़मांस के प्राणी। गरीब किसान मजदूर नौजवानों के बीच से पाई गई अपार लोकप्रियता के बल पर अकूत धन के खातिर यह खेल हो रहे हैं। पैसा पैसा पैसा। यदि सदी के महानायक का भी यही लक्ष्य है। तब फिर हम आप क्या कर सकते हैं। कभी दिल्ली से लेकर यूपी के सम्मेलनों में सर पर पल्ला खींच कर मुलायम सिंह यादव को अपना जेठ (पति का बड़ा भाई) बताने वाली जया बच्चन को अपने पति के सक्रिय सहयोग से नरेन्द्र मोदी के रूप में देवर (पति का छोटा भाई) मिल गया है। अब मुलायम और मोदी में कौन श्रेष्ठ और अनुकरणीय है। यह बात लोकसभा चुनाव से पहले या बाद में तय होगी। क्योंकि दोनो ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदबार हैं। यूपी में अनिल अंबानी का बिजली घर भी लग रहा था। वह सपा से राज्यसभा सदस्य भी बने थे। क्या कहेंगे आप इसे। कहने को बहुत कुछ है। परन्तु जब तक आप निष्पक्ष और निर्भीक होकर मतदान करना नहीं सीखेंगे। तब तक होना कुछ नहीं है। महात्मागांधी कहते थे ‘‘हर आंख का आंसू पोंछना होगा तभी जनतंत्र आएगा।’’ आज हम सब असहाय होकर जनतंत्र को धनतंत्र में बदलते देख रहे हैं। यदि हम आप सब अब भी निष्पक्ष और निर्भीक होकर मतदान करने वालों की जमात में शामिल नहीं हुए। तब फिर न तो हमें महात्मागांधी कभी माफ करेंगे। नहीं हमारी आगे आने वाली पीढ़ियां। आज बस इतना ही। जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट

फर्रुखाबाद परिक्रमा – अपनों ने अपनों को ही दे मारा- न कोई जीता न कोई हारा!

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Posted on : 06-01-2013 | By : JNI DESK | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

अपनों ने अपनों को ही दे मारा- न कोई जीता न कोई हारा!

पंचायतों के चुनाव लोकतंत्र के मजाक बनकर रह गए हैं। जहां से भी शुरू करोगे। अंत धनबल बाहुबल और शासन प्रशासन के बेशर्मी पूर्ण सहयोग असहयोग पर ही होगा। रही बात जश्न मनाने की, सत्ता के नशे में पांच साल बसपाई यही तो करते रहे। वही आज सपाई कर रहे हैं। आंखें बंद कर लो। कुछ दिखेगा ही नहीं।

सही बात यह है कि हमारे लोकतंत्र में दिन प्रतिदिन लोक का अभाव होता जा रहा है। तंत्र हावी होता जा रहा है। बढ़पुर विकासखण्ड में 62 बीडीसी हैं। इसमें से 27 बीडीसी ने मतदान में ही हिस्सा नहीं लिया। 35 ने मतदान किया तीन मत निरस्त हो गये। सपा के जीते प्रत्याशी को मात्र 21 (कुल मतदाताओं के लगभग एक तिहाई) मत मिले। जश्न मनाना आपके हाथ में है। कोई आपको रोक तो सकता नहीं। परन्तु यह लोक नहीं तंत्र तिकड़म धौंस, धमकी और दबाव का ही खेल है। वास्तविकता को उजागर करने के स्थान पर मीडिया भी बेशर्मी से हिस्से का मखमली रूमाल में सहेज कर रखा गया चांदी का जूता पाकर या खाकर इस खेल में अपना प्रभावी योगदान कर रहा है।

जन साधारण से सीधे और प्रति दिन जुड़ी रहने वाली कोई सेवा जब ब्रान्डेड हो जाती है। तब उससे इससे अधिक की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए। ऊपर से नीचे तक नेताओं, नौकरशाहों, ठेकेदारों, माफियाओं को और अधिक निरंकुश भ्रष्ट लंपट, उद्दड बनाने का एक मुश्त ठेका भी तो विज्ञापन के नाम पर लोकतंत्र में सबसे अधिक ताकतवर होते जा रहे मीडिया ने ही ले रखा है। तंत्र और मीडिया तंत्र में अब केवल अपवादों का ही अंतर है। वैसे दोनो का चोली दामन का साथ है। इस जिले में आप खांटी समाजवादी हैं। बगल के जिले में आप खांटी भाजपाई हैं। हमें हमारा नेग दे दीजिए। हम आपकी वैसी ही गायेंगे बजायेंगे। जैसा आप आदेश करेंगे। इससे लोकतंत्र की मर्यादाओं का क्षरण होता है। होता रहे हमारे ठेंगे से। पैसा फेंकते रहो। तमाशा देखते रहो। पैसा हजम तमाशा खतम। क्या समझे नहीं समझे। समझोगे भी नहीं।

वैसे क्रिकेट की भाषा में कहें तो बसपा और सपा के बीच की इस चुनावी सीरीज में जिला पंचायत अध्यक्ष की सुपर शील्ड या ट्राफी जो भी कहो के साथ बसपा सपा से काफी आगे हैं। जब तक सायकिल सिंह हाथी सिंहों से कायमगंज, राजेपुर, शमशाबाद, नबावगंज सहित सुपरशील्ड नहीं जीत लेते तब तक जश्न मनाने का कोई खेल बनता नहीं। लेकिन यदि आपको अपनी नाक कटाकर दूसरों का अपशकुन करने में ही मजा आता है तब फिर आपकी मर्जी।

जनता से सीधे मतदान के बिना पंचायत चुनावों का कोई मतलब नहीं है। यह बात अब दिन प्रतिदिन साफ होती जा रही है। इससे गांवों, विकासखण्डों और जिले के ग्रामीण अंचलों का विकास होने के नाम पर चंद लोगों का ही खेल मजबूत होगा।

रघुकुल रीति के नए व्याख्याकार-

भाजपा आज नरेन्द्र मोदी की गुजरात में शानदार जीत के बाद दिन में ही लोकसभा चुनाव के काफी दूर होने पर भी दिल्ली की कुर्सी के सपना देख रही है। बाबरी विध्वंस के बाद उत्तर प्रदेश में उस समय नरेन्द्र मोदी से भी कहीं अधिक ठसक और हनक रामलला से सीधे बात करने वाले अयोध्या कांड के महानायक कल्याण सिंह की थी। क्योंकि इस मुद्दे ने पूरे राष्ट्र को झकझोर दिया था। वैसे भी उत्तर प्रदेश गुजरात से कई गुना बड़ा है। वही महानायक कल्याण सिंह जी आज कहां हैं। रामराज्य के असली ठेकेदार तो भारतीय जनता पार्टी के लोग ही हैं।

खबर है कल्याण सिंह का बेटा 21 जनवरी को अपनी पार्टी का विलय भाजपा में कर देगा। परन्तु पिता श्री तकनीकी कारणों से भाजपा में नहीं शामिल होंगे। आपको मालूम है कि वह तकनीकी कारण क्या है। हम बताते हैं। यदि कल्याण सिंह जी 21 जनवरी को भाजपा में शामिल हो जायेंगे। तब फिर लोकसभा से उनकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी। यह हैं राम की मर्यादा, सीता की लक्ष्मण रेखा, भारत और इण्डिया नैतिकता चाल चलन चरित्र संस्कारों आदि के वर्तमान व्याख्याकार – फर्क देख लीजिए-
रघुकुल रीति सदा चलि आई
प्राण जायें पर वचन न जाई।

एक बार फिर दोहराते हैं-
एक राम ने सीता छोड़ी एक धोबी के कहने पर,
अबके राम गधा न छोड़ें लाख दुलत्ती सहने पर।

भागवत की नयी भागवत

‘‘शाइनिंग इण्डिया’’ के उदघोषकों ने नहीं उनके संरक्षकों और मार्गदर्शकों ने दिल्ली के जघन्य रेप काण्ड पर एक नई बहस छोड़ दी है। इण्डिया में सब कुछ गलत होता है। इसके मुकाबले भारत बिल्कुल सीधा सादा सरल और दुर्गुण रहित है।

भागवत जी! आपकी भागवत कहां से प्रारंभ करें। अगर आपकी स्वयं की मानसिकता इतनी विक्रत है। तब फिर सामान्य जनों की बात ही छोड़ दीजिए। भारत भारत ही है और भारत ही रहेगा। जब भारत अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। तब आपके पूर्ववर्ती  भारत को इण्डिया कहने वालों की मदद कर रहे थे। जरा यह भी बता दीजिए कि महात्मा गांधी और नाथूराम गोडसे में कौन भारत है और कौन इण्डिया है। अटल जी और अडवाडी जी में कौन इण्डिया है और कौन भारत है। सुषमा स्वराज्य और अरुण जेटली में कौन इण्डिया है और कौन भारत है। नरेन्द्र मोदी और कल्याण सिंह में कौन क्या है। शहनवाज खां और मुख्तार अव्वास नकवी में कौन क्या है। वसुन्धरा राजे और येदुरप्पा में कौन क्या है। दीनदयाल उपाध्याय और नितिन गडकरी में कौन क्या है। सूची बहुत लंबी है। आप भी जानते हैं। हम भी जानते हैं। जनता सब कुछ जानती है। अब आपका अयोध्या में मंदिर निर्माण का सपना संकल्प कहां। मोदी का शहरी ग्लोबल विकास और स्वदेशी का नारे के बीच इण्डिया और भारत कहां है।

आप स्वघोषित महान हैं। आपकी रेखायें लक्ष्मण रेखायें हैं। राम की बात मत करिए। आपकी कथनी और करनी का फर्क तो लंकापति रावण से भी अधिक प्रतीत होता है। नारी सीता सी पत्नी चाहते हो। तब फिर स्वयं भी तो राम बनने का संकल्प करो। आपके चंगू मंगू उपकृत आपके वक्तव्य पर कुछ भी कहें। परन्तु आपने ऐसा ओछा वयान देकर पूरे देश को अपमानित किया है।

सर्दी ही सर्दी हाय राम यह बेदर्दी

सर्दी में कुड़ता भिगो कर उसे सुखाने के नाम पर आग तापने वालों का जमाना खत्म हो गया। आज हालात पूरी तरह से बदल गए हैं। सर्दी का आलम यह है कि बच्चों से लेकर प्रौढ़ और बूढ़े भी ऊपर से नीचे तक मोजों, टोपों, दस्तानों आदि से ढ़के मुंदे होने और चाय काफी की चुस्कियों, बीड़ी सिगरेट के लंबे कसों और अलावों की गर्माहट के बाद भी सर्दी सर्दी ही चिल्ला रहे हैं। गजब की सर्दी हाय सर्दी, वाह री सर्दी ऐसी सर्दी आज तक नहीं पड़ी। हर जगह सुबह से शाम तक सर्दी और केवल सर्दी की चर्चा। कोई हाथ आपस में रगड़ रहा है। कोई हाथ आग ताप रहा है। हमेशा बेपरवाह रहने वालों के हाथ भी पूर्ण अनुशासन की मुद्रा में जेबों में अंदर हैं।

भुने आलू, उबले अंडे, गर्म मूंगफली, सूखे मेवे, ऊनी कपड़े लत्ते, प्राश केसरी कल्प भांति भांति के सोमरस का भारी उपभोग सर्दी के असर को तोड़ नहीं पा रहा है। स्कूलों, कार्यालयों, सड़कों, बाजारों में सन्नाटा छाया है। हर ओर यही आवाज हाय राम यह बेदर्दी। कभी न देखी ऐसी सर्दी।

और अंत में …………….… पिछले हफ्ते सैफई से सेन्ट्रल हाल और लखनऊ से धीरपुर नगला दीना और आवास विकास तक एक खबर जोर से उड़ी या उड़ायी गई। खबर थी दो पूर्व सांसदों के पुत्र बहुत शीघ्र सपा की सदस्यता ग्रहण करेंगे तथा प्रस्तावित लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी होंगे। नागपुर में प्रदेश के मुख्यमंत्री के मेजवान और फर्रुखाबाद में एक केन्द्रीय मंत्री की पत्नी के आश्रयदाता कांग्रेसी नेता के यहां आयोजित कार्यक्रम में इस बात को लेकर तरह तरह के दावे खुलेआम किए जा रहे थे। कहा जा रहा है कि भाजपा में कल्याण सिंह की कथित वापसी को लेकर धीरपुर नरेश कुछ ज्यादा ही अधीर हो रहे हैं। कल्याण सिंह के खास रहे कुछ स्थानीय सजातीय नेता इस समय विभिन्न दलों में विराजमान हैं वह भी अपनी जोड़ तोड़ में लगे हैं। दोनो पूर्व सांसद पुत्रों में एक अंतर यह है कि एक के विषय में बातें चाहें जितनी उड़ी या उड़ायी गई हों। परन्तु वह रहे अपने स्वर्गीय पिता की पार्टी में। वहीं दूसरे सांसद पुत्र को बसपा छोड़ कर सभी प्रमुख दलों में लंबा समय गुजारने का अच्छा अनुभव है। हाल यह है कि कोई भी इस बात को नकारने या स्वीकार करने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा है।

और अंत में ………...जैसे जैसे व्यापारिक संगठन बढ़े वैसे ही सड़कों पर अतिक्रमण बढ़ा। जाम स्थायी समस्या बन गया। संभवतः पहली बार पुलिस और प्रशासन ने सही और कड़ा कदम उठाया है। अब वाहन, दुकानों के सामने नहीं सड़क के बीचों बीच लंबाई में खड़े किए जायेंगे। नतीजतन ट्रैफिक वनवे हो जाएगा। फुटपाथों पर अतिक्रमण नहीं होगा। यह पुलिस प्रशासन का अच्छा प्रयास है। इसे कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए। दुकानदारों, व्यापार मण्डलों और जनता को इसमें सहयोग करना चाहिए। अतिक्रमण कराने में नहीं अतिक्रमण हटाने में सहयोग करिए। क्योंकि यह शहर जिला हमारा, आपका, सबका है। आज बस इतना ही। जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट

फर्रुखाबाद परिक्रमा- चाची बन गई “चटनी वाली चाची”

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Posted on : 30-12-2012 | By : JNI DESK | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

नए वर्ष की दस्तक ! आओ कुछ सोचें, कुछ विचारें- गतिज जड़ता को कैसे तोड़े !
जड़ता जहाँ भी है| हेय है, त्याज्य है| गतिज जड़ता का तो कोई मतलब ही नहीं है| परिवर्तन जीवन का नियम है| अपना आदर्श स्वयं चुनो| अपना आदर्श स्वयं बनो| किसी का सुधार उपहास से नहीं उसे उसे नए सिरे से सोचने और बदलने का अवसर देने से ही होता है|
चीजो को देखने परखने की हमारी द्रष्टि क्या है| सब कुछ उसी पर निर्भर करता है| गिलास में पानी है| गिलास आधा भरा है या गिलास आधा खली है, यह हमारी सोच पर निर्भर करता है|
जिस व्यक्ति को हम आप बहुत ही निक्रष्ट और हेय समझते है| उसमे भी कुछ न कुछ ऐसा होता है जो सीखने और सराहने योग्य है| हमें श्रेष्ठ को चुनने और शेष को छोड़ देने की आदत डालनी होगी|
मनुस्मृति अपने समय का संबिधान है, संबिधान आज की मनुस्मृति है| दोनों में परिवर्तन की जरुरत है और रहेगी| पुराना सब कुछ बुरा नहीं है और नया सब कुछ सही नहीं है| विवेक के तराजू पर निष्पक्ष और निर्भीक होकर नए और पुराने को तौलो| त्याज्य को त्याग दो| स्वीकार्य को स्वीकार लो|
हम जो कुछ जानते है, मानते है| उसके अनुसार चलने से हमको आपको कौन रोक सकता है| कोई नहीं| परन्तु जो हम जानते है, मानते है उसे हम अपनाते नहीं| हम दूसरो को गाली देकर उन्हें निक्रष्ट हेय बताकर अपनी श्रेष्ठता के दंभ डूबे रहना चाहते है| यही है गतिज जड़ता| इसे ही हमें स्वयं अपने प्रयासों से तोडना है, नए वर्ष में हम आपको सबको वह बनना है जो हम आप वास्तव में बनना चाहते है—

अजानी मंजिलो का,
राहगीरों को नहीं तुम भेज देते हो
जकड कर कल्पना इनके पारो की मुक्ति को
तुम छीन लेते हो
नहीं मालूम तुम को है कठिन कितना
बनाये पंथ को तजकर
ह्रदय के बीच से उठते हुए स्वर के सहारे
मुक्त चल पड़ना
नए अलोक पथ की खोज में
गिर गम्भरो से झाड़ियो से झंझटो से
कंकडो से पत्थरो से रात दीन लड़ना
नए आलोक पथ की खोज, भटकने के लिए भी
एक साहस चाहिए
जो भी नए पथ आज तक खोजे गए
हुए इन्सान की देन है |

नव वर्ष में आप गतिज जड़ता को तोड़े, आप अलोक पथ को खोजे, उस पूरे उत्साह उमंग के साथ सतत चलते-चलते अपने लक्ष्य को प्राप्त करें / इसी आशा और शुभकामनाओ के साथ आप सबको नव वर्ष की हार्दिक बधाई |

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हर व्यक्ति बहुत उदास है आज !
साल बीतते-बीतते दिल्ली में गैंगरेप की शिकार जीवन और मृत्यु के बीच लम्बे संघर्स में करोडो लोगो की दुआओं के बाद अंततः हार गई| छात्रा के साथ जो कुछ भी हुआ उसके बाद जीने की बात हो भी कैसे सकती है| इस घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया| लम्बे समय से चली आ रही सामाजिक निर्लज्जता उदंडता दबंगई का शिकार होती चली आ रही देश की आधी आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा इस इस अमानुषिक बर्बर घटना के बाद स्वतः स्फूर्त ढंग से करो या मरो के अंदाज खड़ा हो गया है| तब जाकर कहीं प्रशासन सरकार को स्थिति की गम्भीरता का अंदाजा हुआ| आनन् फानन में हरकत में आये सत्‍ताधारी किंकर्तव्यविमूढ़, गलतिया करते चले गए| महंगाई और भ्रष्टाचार के कष्टप्रद द्वार के बीच आनन फानन में अपने वेतन भत्ते बढा लेने बाली संसद और सांसद समझ ही न पाए की क्या करे| पीडि़ता की मौत के बाद हालात गंभीर हो गए| हर ओर बहुत कुछ कहा सुना जा रहा है| सबकी अपनी कसौटियां और निर्णय हैं| लेकिन एक बात पूर्णतः सही है, कि हर व्यक्ति इस प्रकरण पर बहुत ही उदास हताश निराश है|

हम सब लोकतंत्र में जीते है| बड़ी बड़ी बातें करते है| परन्तु बारूद के ढेर पर टिका बसा हमारा समाज कितना विकृत है| छात्रा से गैंगरेप की घटना ने सरे देश ही नहीं सारी दुनिया के सामने यह स्पष्ट कर दिया| सुबह से रात तक घर आँगन गली मोहल्ले गावं शहरो में होने वाली अमर्यादित अश्लील निंदनीय गैर-जिमेदाराना घटनाओ की अनदेखी की चरम चरम परिणिति है| दिल्ली गैंगरेप की घटना| हम बातें कितनी भी बड़ी बड़ी करें परन्तु हर और आये दिन होने वाली घटनाओ पर हमारा नजरिया कायरता पूर्ण ही रहता है| विरोध करना ही हमारे संस्कारो में नहीं रहा| कौन दोषी है इसके लिए| वह सब लोग जो अपने को बहुत शिक्षित सभ्य योग्य और संस्कारित समझते हैं|
हमारी सबकी जड़ता और उदासीनता को इस घटना ने झकझोरा है, हजारो शिक्षाओ को उपदेशो को नजर अंदाज कर इस एक घटना ने रातो रात हमारे को जगा दिया| अब हम स्वयं से चिंतन और मंथन की स्थिति में आ गए है| पीड़ित छात्रा ने जीवन मृत्यु से संघर्ष करते हुए अपने प्राणों की कीमत पर देश को झकझोरा है जगाया है| उसका ये बलिदान व्यर्थ न जाये| यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है|
इस घटना ने चरम वलिदान के बाद हमको परिपक्व बना दिया है| अन्यथा सरकार हो या नेता किसी को भी हमें कोई नियम कानून कायदे को बनाने समझाने की जरूरत नहीं है क्यों की इन लोगो में न इस बात की पात्रता है और न विश्वसनीयता|
अब हमें नए साल में प्रवेश से पूर्व स्वतः निर्णय कर अपना फैसला लेना होगा, रास्ता बनाना होगा| हमें स्वयं अपने आस पास के माहौल, फिल्मों, टीवी, समाचार पत्रों में जो बातें कार्यक्रम अच्छे नहीं लगते उनकी सूची स्वयं के विवेक से निष्पक्ष व् निर्भीक होकर बनानी होगी| स्वयं ही उन पर फैसला करो| स्वयं ही उन पर अमल करो| यकीं मानो आज की नम आँखों और पीड़ित मन ने साल दस्तक दे रहे साल में अपने स्वयं के निर्णय पर अमल किया तभी बीत रहे साल का कलुषित विकृत निंदनीय कलंक हमारे माथे से पुछ पायेगा|
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शाहखर्च जनप्रतिनिधि
देश में गरीबी है, गरीबी है, भ्रष्टाचार का बोल बाला है, तमाम समस्यायें है| परन्तु हमारे जनप्रतिनिधि सरकारों के मुखिया नौकरशाह इन सबसे बेपरवाह है| उन्हें अपनी शानौशौकत फिजूलखर्ची को लेकर कोई चिंता नहीं है| आजादी के साथ ही सत्तारूढ़ हुई कांग्रेस कुर्सी पर आते ही सादगी और उच्च विचारो को छोडती चली गई| फिजूलखर्ची शानशौकत और दिखावे के नित नए कीर्तिमान बनते चले गए| इन्ही के गर्भ से भ्रष्टाचार के नए नए कारनामे उजागर होते चले गए| पुराने कांग्रेसी रहे तब तक कुछ लाज शर्म बची रही| अब तो जितने ठाठ बात से रहे उतना ही बड़ा नेता|

परन्तु कांग्रेस के इस चकाचौंध भरे खेल में अपने आपको पार्टी विद द डिफ़रेंस गाने वाली भाजपाई सत्ता के गलियारे में प्रवेश करते ही बड़ी खिलाडी बन गयी| भ्रष्टाचार के प्रकरणों से कांग्रेस और भाजपा के नेता बुरी तरह घिरे हुए हैं| प्रांतीय क्षेत्रो के खेल भी आये दिन चौकांते है| एक भाजपाई मुख्यमंत्री अपने राज्य स्थापना दिवस समारोह में दस मिनट मिनट के एक नृत्य पर एक करोड़ से अधिक रूपए लुटा देते है| वही सारी दुनिया में सीएम नहीं भाजपा के भावी पीएम बनने की भी सुर्खिया बटोरने बाले एक सादगी पसंद संघ से स्वयं सेवक से मुख्यमंत्री बनने बाले नेता जी पूरे एक सौ पचास करोड़ रूपए खर्च करके अपना नया कार्यालय बनाया है| पंचमूर्ती के नाम से पैंतीस हजार वर्ग फीट बने इस चार मंजिला दफ्तर कौन क्या करेगा| यह समझ पाना आसान नहीं है| निश्चय ही महात्मा गाँधी, लाल बहादुर शास्त्री, गुलजारी लाल नंदा, मोरार जी देसाई,चन्द्रभानु गुप्ता, दीनदयाल उपाध्याय, सरदार पटेल, डा० लोहिया जैसे अनगिनत नेता अपने अपने वर्तमान उत्तराधिकारियो की इस वेहिसाब तरक्की पर खुश हो रहे होंगे| सादगी समर्पण का प्रतिमूर्ति कहे जाने बाले राष्ट्रीय स्वयं संघ के हजारो पूर्णकालिक स्वयं सेवक अपने इस पुराने साथी के क्रांतिकारी परिवर्तन पर आश्चर्य चकित होंगे| सादा जीवन उच्च विचार में रक्खा क्या है| तामझाम झांपा फिजूलखर्ची जिंदाबाद|

अंत में –

भीषण सर्दी है –सभी के सभी बेहाल है कम्बल बंटे कि नहीं, अलाव जले कि नहीं| हर ओर इसी बात की चर्चा है| सर्दी के बचाव में भी गरीबी अमीरी का फर्क साफ़ सामने दिखाई देता है| इण्डिया और हिंदुस्तान भी यहीं है| सर्दी बचाने के हर तरह के सामानों का टीवी समाचार पत्रों में घनघोर विज्ञापन है| इसके चलते उपभोक्ता सामानों की कीमत बेतहासा बढ़ रही है|
परन्तु हमारे गली मोहल्लो में रहने बसने वाली दादियो बुआओ चाचियो के सर्दी बचाओ ही नहीं सर्दी भगाओ नुस्खे कम कीमत पर और बेहतर फायदे के बल पर अब भी अपना महत्व बनाये हुए है| दादी का सोंठ मिला गर्म दूध, महिलाओ को प्रसव के समय दिया जाने वाला हरीरा किसी प्राशकल्प से बेहतर है| कीमत भी बहुत कम| बुआ की मेथी की सब्जी, गुड और बाजरे की रोटी की जबरदस्त धूम है| धनिया लहसुन टमाटर आदि मिलाकर बनाई जाने वाली चटनी तो आस पास के मोहल्ले में ऐसी छा गई कि चाची “चटनी वाली चाची” बन गई|

और चलते चलते ….
प्रधानमंत्री जी! गृहमंत्री जी ! बड़े पदों पर हो| सोंच भी बढ़ाईए| आपकी अपनी तीन बेटियां ही नहीं है| इस देश की सारी बेटियां आपकी ही है| नए वर्ष में हम सब इसी सोच के साथ प्रवेश करे| आज बस इतना ही जय हिन्द !
सतीश दीक्षित
एडवोकेट

फर्रुखाबाद परिक्रमा- हिम्मत हो तो मोदी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाओ, प्रधानमंत्री तो बन ही जायेंगे

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Posted on : 23-12-2012 | By : JNI DESK | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

निश्चय ही गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने शानदार इतिहास रचा है। मोदी लोकप्रियता की उत्ताल तरंगों पर तैर रहे हैं। अच्छी बात है। मौका है, दस्तूर भी है। मीडिया की राजनैतिक विश्लेषकों की अपनी अपनी व्याख्यायें हैं। उन्हें अपने अपने सोंच के हिसाब से गृहण करने वाले हैं। यहां तक सब कुछ ठीक है। देश के किसी भी मुख्यमंत्री ने आज तक इतनी बड़ी उपलब्धि इतने शानदार तरीके से शायद ही पायी हो। परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में मोदी की इस शानदार जीत के जो मतलब निकाले जा रहे हैं। वह सबके सब अति उत्साह के ज्वार भाटे में डूबे हुए हैं। यह जोश के साथ होश की अनिवार्यता को नहीं स्वीकारते। परन्तु यह रातों रात एक सौ बाइस करोड़ की जनसंख्या वाले विविधता पूर्ण देश में स्वीकार्य नहीं बना सकता।

याद कीजिए आपात काल के दिन। मीडिया तब आज की तरह ताकतवर और विवादित नहीं था। अपने निहित स्वार्थों के कारण कहीं कहीं कुछ भयभीत जरूर था। इन्दिरा इज इण्डिया, इण्डिया इज इंदिरा कहने वाले ढोपरशंखी कांग्रेस अध्यक्ष और कुंभ के अवसर पर इंदिरा गांधी को शानदार जीत का आशीर्वाद देने वाले चारों शंकराचार्य भी थे। परन्तु यह सब भी मिलकर बंगला देश के उद्भव के समय पंडित अटल विहारी बाजपेयी द्वारा दुर्गा के रूप में स्वीकार की गई इंदिरागांधी को पतन और शर्मनाक हार से बचा नहीं सके।

याद कीजिए बाबरी विध्वंस के बाद गुजरात से बहुत बड़े प्रदेश और देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और लाखों की भीड़ में रामलला से टेलीफोन पर बात करने वाले कल्याण सिंह। महा नायक से आज महा याचक के रूप में पुर्नवापसी के लिए भाजपा के दरबाजे पर खड़े हैं। हमारा उद्वेश्य नरेन्द्र मोदी की शानदार जीत के महत्व को कम करना नहीं है। परन्तु लोकतंत्र की गरिमा और मर्यादा को कम करने की षडयंत्र पूर्ण कोशिशों को देखना समझना जरूरी है।

लोकसभा चुनाव जब होंगे तब होंगे। देश नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकारेगा तब स्वीकारेगा। यह किसी के हाथ में नहीं है। यह हिन्दुस्तान के पचहत्तर करोड़ से अधिक मतदाताओं के हाथ में है। परन्तु हिमाचल (छोटा प्रदेश) की हार को भूलकर गुजरात (मझोले प्रदेश) की जीत पर बेबजह बेमतलब इतराने वाले भाजपाइयों होश में रहो। जोश छोड़ो या बनाए रखो यह तुम्हारी मर्जी।

फिलहाल आपके यहां पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की शानदार कुर्सी वर्तमान अध्यक्ष के वावादित क्रिया कलापों की बजह से खाली है। आपने स्वयं ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव को आगे खिसका दिया है। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बना सकना बड़े से बड़े भाजपाई के हाथ में नहीं है। परन्तु लोकसभा चुनाव से पूर्व नरेन्द्र मोदी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष सर्व सम्मति से बना देना सभी भाजपाइयों के हाथ में है। भाजपा के बहिन-भाइयों! यदि आप इतनी हिम्मत दिखा सके, तब सच मानो कांग्रेस चाहे या न चाहे, लोकसभा का चुनाव मोदी बनाम राहुलगांधी स्वयं से स्वयं हो जाएगा। क्योंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नरेन्द्र मोदी स्वतः ही प्रधानमंत्री के सशक्त सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार माने जायेंगे। त्याग की मूर्ति कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी प्रधानमंत्री पद को अस्वीकार कर चुकी हैं। नतीजतन लोकसभा चुनाव में मोदी के राहुल बाबा और कांग्रेसियों के प्रिय नेता उत्तर प्रदेश के ऐंग्री यंग मैन और गुजरात के गांधी भक्त राहुल गांधी ही कांग्रेस के तारनहार होंगे।

भाई बहिनों!

भाजपा के लोगों भाई बहनों! इस बिन मांगी सलाह पर विचार करना। वक्त बार बार नहीं आता। नया साल और लोकसभा का चुनाव दोनो दस्तक दे रहे हैं। मोदी नहीं यह आंधी है। गुजरात का ही नहीं देश का नया गांधी है। आप अपनी मर्जी से श्यामा प्रसाद मुकर्जी दीन दयाल उपाध्याय, पंडित अटल बिहारी बाजपेयी या कोई अन्य राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय नाम ले सकते हैं। नरेन्द्र मोदी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर उनके प्रधानमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त करो। यह कोई जोर जबर्दस्ती नहीं है। आपकी पार्टी आपका नेता आपकी मर्जी। एक बात गुजरात में मोदी की ऐतिहासिक शानदार जीत पर सामने आई। बिना लाग लपेट के आपको अपना समझ कर कह दी। बांकी आप जानें और आपका काम जाने।

इतना और समझ लेना। केवल गुजरात के मुख्य मंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी जी मानेंगे नहीं। वह बात बार बार मनमोहन सिंह, सोनिया और राहुल बाबा सहित राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय संदर्भों की ही करेंगे। क्योंकि अब गुजरात में उनके लिए कुछ करने को है ही नहीं। छह करोड़ गुजरातियों ने दिशा और दशा बदलने की अपील करने वाली कांग्रेस को बुरी तरह से ठुकरा दिया है। इसलिए भाजपाइयों का यह पावन पवित्र कर्तव्य है। देश की दिशा और दशा को बदलने के लिए पूरी धूमधाम से नरेन्द्र मोदी की पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर राहुल बाबा के मुकाबले उतारें।

दिल्ली में गेंग रेप

इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया है- सब के मन में जबर्दस्त आक्रोष है। हम सभ्य और सुसंस्कृत होने, प्रगतिशील होने का दम भरते हैं। परन्तु इस प्रकार की घटनायें यह साबित करतीं हैं कि हम कबीलाई जंगली और बहशी तौर तरीकों को छोड़ नहीं पाये हैं। बलात्कारियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले। इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। इससे शायद ही किसी को आपत्ति हो। परन्तु सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर उस देश में यह सब हो क्यों रहा है! जहां नारियों की पूजा होती है। जन्म देने वाली मां और जन्मभूमि को स्वर्ग से श्रेष्ठ माना गया है। इसका कारण कमोवेश सबको मालूम है। परन्तु पिछड़ेपन का संकीर्ण विचारधारा का होने का आरोप चस्पा होने के डर से खुलकर इस पर कुछ कहने से लोग डरते हैं।

अगर ऐसा न होता तब फिर राजा भैया जैसे प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री इस प्रकार का ओछा वयान नहीं देते। अपने सामंती चरित्र के चलते उन्होंने इस प्रकार की घटनाओं को सामान्य और पूरे प्रदेश में रोज होते रहने वाला बताया। साथ ही दिल्ली में हुई स दुस्साहसिक घिनौनी हरकत का विरोध करने वालों की टीवी पर दिखने और सस्ती लोकपिय्रता अर्जित करने की कोशिश बताया। इससे अधिक घृणित और निकृष्ट बात क्या हो सकती है। तब फिर बात सबसे पहले इन लोगों से शुरू करो जो इस प्रकार की निकृष्ट और निंदनीय घटनाओं पर भी आश्चर्य जनक ढंग से बेशर्मी से भरी बातें करते हैं। इस घटना ने हमारे देश में फैलने वाली चिनगारी को शोला बनाकर क्रांति परिवर्तन सुधार की ज्वाला बना दिया है। देश की आधी आबादी को हमने यदि भयभीत असुरक्षित बने रहने दिया। तब फिर हम बातें चाहें जितनी बड़ी करें, न घर के रहेंगे न घाट के।

राष्ट्रपति भवन से लेकर दिल्ली और देश के कोने कोने में फैल गया यह आक्रोश वर्षों से गली कूंचों बाजारों, ट्रेनों, बसों, कार्यस्थलों आदि में हमारी आपकी सबके घरों की महिलाओं लड़कियों के साथ होने वाले उस शोषण दुर्व्यवहार और छींटाकसी बदतमीजियों उद्दडताओं का कुपरिणाम है। जिसे समाप्त करने का विचार किसी के मन में आता ही नहीं। आता भी है तब फिर प्रतिरोध की हिम्मत हममें नहीं है। सब कुछ हमारी नजरों के सामने होता रहता है लेकिन हम प्रतिरोध प्रतिकार की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते।

इस घटना ने देश को झकझोर दिया है। सरकार शासन प्रशासन नेता क्या करते हैं क्या करेंगे। यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा। लेकिन तब तक हमें शांत होकर नहीं बैठना है। हमें अपने आपको एक अच्छे और जिम्मेदार शहरी के रूप में समाज में रहना होगा। अन्याय, अत्याचार, ज्यादती आदि का साहस के साथ प्रतिकार और विरोध की स्वाभाविक आदत डालनी होगी। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि अन्याय सहने वाला अन्याय करने वाले से कम जिम्मेदार और दोषी नहीं होता। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है-

अनुज वधू भगिनी सुत नारी- सुन सठ यह कन्या समचारी,
इनैहिं कुदृष्टि बिलोकै जोही, ताहि वधे कछु पाप न होई।

और अंत में………. घर में ही लाग लग रही घर के चिराग से!

जिलाधिकारी जी छुट्टी से लौटते नए साल में सावधान हो जाइए। सामान्यतः जिले में लोग आपको ठीक ठाक और ईमानदार मानते हैं। परन्तु आपके निजी सचिवालय के कुछ गुरुघंटाल लोगों ने आपको कथित रूप से बेईमान सिद्ध करने का अभियान अपने निहित स्वार्थों के लिए छेड़ रखा है। इनमें वह लोग भी शामिल हैं जिनकी सेवा निवृत्ति में अधिक समय नहीं बचा है।

अपने आवंटित कार्य के अतिरिक्त आपके आंख और कान बन गए इन सिद्ध पुरुषों ने पूर्व में कई जिलाधिकारियों और वरिष्ठ अधिकारियों की लुटिया डुबोई है। इनका स्थानांतरण नहीं होता केवल सीट बदलती है। इनमें से कुछ तो इतने गुरु घंटाल हैं कि इन्हें अगर लहरें गिनने तक का काम सौंप दिया जाए। यह उसमें भी अपना खेल खेलने का रास्ता निकाल लेंगे।

अपने निहित स्वार्थों के लिए ही यह लोग जब तब प्रभावी नेताओं और गर्जमंद लोगों के बीच यह अफवाह भी फैलाने से नहीं चूकते कि चुनिंदा मामलों में साहब डायरेक्ट नहीं इन डायरेक्ट खेल बना लेते हैं। कुछ अधिकारी भी अपने को सुरक्षित रख कर यह खेल इन्हीं गुरु घंटालों की मंत्रणा मार्गदर्शन में खेलते हैं। इन दिनों प्रमुख रूप से ऐसे दो बड़े खेलों की चर्चा यही गुरुघंटाल अपने अपने स्टाइल में कह रहे हैं। एक है मन्नीगंज लिंजीगंज मिलावटी तेल का मामला। बताते हैं खेल हो गया। किसी का भी भारी शोर शराबे के बाद भी कुछ नहीं हुआ। सब अपने अपने तरीके से तीरथ कर आए और प्रसाद पा गए।

दूसरा मामला वर्षों पुराना है। पूर्णतः नियम और विधि विरुद्व है। काफी कोशिशों के बाद मामला पट नहीं पाया। अब जिनके ऊपर कार्यवाही होनी चाहिए उनका कुछ नहीं बिगड़ा। परन्तु लगभग चार दर्जन कर्मचारियों पर गाज इस लिए गिर गयी क्योंकि गुरुघंटाल द्वारा कथित रूप से साहब बहादुर का नाम घसीटने पर भी वह कार्य नहीं हो पाया, जिसे श्रीमान जी संपादित करना चाहते हैं। इस प्रकरण में कब कब कितना खेल हुआ है। इसे जानने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है। केवल सम्बंधित पत्रावलियों का मूवमेंट ही देख लीजिए। तब फिर सारा खेल दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा। बिना कसूर मुअत्तिल कर्मचारियों और उनके परिवारीजनों को फांका कशी पर मजबूर कर देना और वास्तविक दोषियों को छुट्टा छोड़ देना कहां का न्याय है।

चलते चलते

पता नहीं जिला बार एसोसिएशन अपनी फजीहत कराने पर क्यों आमादा है। अनेक बार की घोषणाओं के बाद आप अपने चुनाव तो समय से करा नहीं पाए। परन्तु बाहर जाहां कहीं चुनाव हो वहां बेमतलब अपनी नाक जरूर घुसेड़ देते हैं। विधानसभा, नगर पालिका चुनाव में प्रत्याशियों को समर्थन देकर अपनी और अपने प्रत्याशियों की फजीहत के बाद बढ़पुर ब्लाक के प्रमुख पद के लिए 4 जनवरी को होने जा रहे उप चुनाव में भी बसपा प्रत्याशी को समर्थन देने की आनन फानन में बिना बैठक बुलाए घोषणा कर दी गई है। नतीजा सब जानते हैं ढाक के तीन पात से अधिक नहीं निकलेगा। परन्तु हम क्या करें हमें कार्य बहिष्कार और चुनाव में मनमाने तरीके से इसे उसे समर्थन देने की घोषणा आनन फानन में कर देने के अलावा कुछ आता ही नहीं। आज बस इतना ही। जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट

फर्रुखाबाद परिक्रमा – अजब गजब हैं खेल सपा के- सायकिल सिंह बोले हाथ नचा के!

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Posted on : 16-12-2012 | By : JNI DESK | In : फर्रुखाबाद परिक्रमा

अजब गजब हैं खेल सपा के- सायकिल सिंह बोले हाथ नचा के!

पूरे सम्मान के साथ हम फिर दोहराते हैं। खड़ा खेल फरक्कावादी। जो मान जाए वह सपाई क्या। जो जलेबी न बनाये वह हलवाई क्या। एक थे डा0 राम मनोहर लोहिया। पूरे पचास साल पहिले यहां से चुनाव लड़े थे। कांग्रेस की, पंडित जवाहरलाल नेहरू की फजीहत करते हुए शान से जीते थे। आज के समाजवादी उसी कांग्रेस की कठपुतली बने हुए हैं। वह भी केवल और केवल इसलिए कि कहीं सांप्रदायिक शक्तियां आगे न बढ़ जायें। हम विरोध भी करेंगे। मतदान में बहिष्कार भी करेंगे। चित्त भी मेरी। पट भी मेरी, टैया मेरे बाप को। डा0 लोहिया होते आज के समाज वादियों की प्रशंसा के पुल बांध देते।

चलिए अब आगे बढ़ते हैं। डा0 लोहिया की इसी कर्मभूमि में पूरे नौ माह हो गए। युवा होनहार प्रगतिशील अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बने। जिले के सपाई खरबूजे ने कन्नौज के सपाई खरबूजे को देखकर रंग नहीं बदला। कहने का मतलब यह है कि जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में हुई कलंक कथा को कन्नौज की तर्ज पर समाप्त करने की हिम्मत बड़े से बड़े सूरमा भोपाली उर्फ सायकिल सिंह ने नहीं दिखाई। हाथी सिंह खुलेआम छाती पर मूंग दल रहे हैं। सायकिल सिंह अभी भी शर्म हया जमीर बेंच देने के बदले में मिले नोटों की ठाठ से जुगाली कर रहे हैं। भ्रष्टाचार ताकतवर होता है होता रहे। महंगाई बढ़ती है ठेंगे से। परन्तु कमल सिंह को खिलना नहीं चाहिए बढ़ना नहीं चाहिए। क्योंकि उनसे लड़ने की हिम्मत और फुरसत हमें इसलिए नहीं है। क्योंकि हमें अपनों से ही लड़ने से फुरसत नहीं है।

सायकिल सिंहों में किसी को अपनी एक भाभी को (दूसरी भाभी को नहीं) किसी को अपनी बहू को और किसी को अपने भाई को ब्लाक प्रमुख बनवाने की जल्दी है। संकल्प 2014 अभी दूर है।

तब फिर रिहर्सल कर लेने में क्या परेशानी है। आपको परेशानी है तो बनी रहे। हम हैं सायकिल सिंह। हमें किसी की परवाह न कभी थी। न है और न कभी रहेगी। हम नए जमाने के समाजवादी हैं। बाकी ब्लाक प्रमुखों से डील हो जाने के कारण उन्हें हमने मतलब हम सायकिल सिंहों ने खाने कमाने लूटने के लिए छुट्टा छोड़ दिया है। आखिर वह भी तो हमारे ही भाई हैं। आप इतनी छोटी सी बात नहीं समझते। खैर आप अपनी जानो। हमने सब अच्छी तरह समझ लिया है। भीषण सर्दी हो इज्जत पर बन आई हो। तब फिर अर्ना-वर्ना मत करना। गर्म पानी न मिले, ठंडे पानी से चुपचाप नहा लेना। क्या समझे नहीं समझे। नहीं समझे तब फिर तुम जानो और तुम्हारा काम जाने। हम अभी 28 दिसम्बर को होने वाले महज दो अदद ब्लाक प्रमुखों के चुनाव में बिजी हैं। इसके चलते हमें सैफई महोत्सव फर्रुखाबाद महोत्सव और नये साल के जश्न का मजा खराब करने में भी कोई गुरेज नहीं है। परन्तु जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में पार्टी प्रत्याशी की आन बान शान की वापसी की चिंता बड़े से बड़े सपाई को नहीं है। इस मोर्चे पर लगता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

ब्लाक प्रमुखों के उप चुनाव तो बहाना हैं। पूरी पटकथा लिखी जा चुकी है। अमल अभी बाकी है। इसके लिए सही समय इंतजार है। समझने वाले घोषित अघोषित लक्ष्यों का जान रहे हैं। समझ रहे हैं। जब संगठन से लेकर सरकार तक में कोई कानून कायदा व्यवस्था न हो। मनमानी हो। तब फिर किसी को किसी का क्या डर। सबके पास सबका बही-खाता है। जब ऐसा करके, वैसा करके भी उनका कुछ नहीं बिगड़ा। उल्टे प्रमोशन हो रहा है। तब फिर हमारा कोई क्या बिगाड़ लेगा। कब कहां क्या करना है। क्या कहना है। इसके बहाने खोजे नहीं जा रहे हैं तैयार हैं। सपाई अपने नेता धरती पुत्र की संघर्ष यात्रा तथा अन्य निर्देशों पर अमल कभी नहीं करते। करेंगे भी नहीं। क्योंकि वह सच्चे और सच्चे सपाई हैं। परन्तु नेता जी के कथित परिवारवाद को पूरी बेशर्मी से अपनाने में सायकिल सिंहों को किसी प्रकार की कोई गुरेज नहीं है। सभी सायकिल सिंहों को अपने परिवारीजनों का राज तिलक करने कराने की जल्दी है। उसके लिए कुछ भी करना पड़े करेंगे। लोहिया की कर्मभूमि में समाजवाद के प्रवर्तक और जाति तोड़ो आंदोलन के नायक डा. राममनोहर लोहिया को नए समाजवादियों की इससे अच्छी श्रद्धांजली और क्या हो सकती है।

वह आये भी चुपचाप और चले भी गए चुपचाप


कभी अपनी खुद की दुनिया के स्वयंभू बेताज बादशाह रहे पूर्व सांसद के अपने समर्थकों से यहां आकर मिलने परामर्श करने रणनीति बनाने की खबर परवान नहीं चढ़ सकी। वह स्थानीय मीडिया किंग के हमराज की मेजबानी से भी मीडिया की सुर्खियों में नहीं आ पाये। यह दिनों का फेर ही कहा जाएगा। वैसे भी अपने यहां नगर पालिका से लेकर संसद तक मीडिया से चलकर राजनीति में आने वालों का रिकार्ड कोई बहुत अच्छा नहीं रहा। भले ही अब भी कुछ लोग अपने को तीस मार खां समझते हों। हमला करना और हमला झेलना दो अलग चीजें हैं। राजनीति में विशेष रूप से चुनावी राजनीति में कूदने के इच्छुक मीडियाकर्मी इस बात को जितनी जल्दी समझ लें उतना ही अच्छा है। पूर्व सांसद के कथित गेट-टुगेदर में गिनती के लोग ही आए। जो आए भी वह भी किसी न किसी मजबूरी में। भले वह पुराने रिश्तों को ढोने या निभाने की ही मजबूरी क्यों न रही हो। मिलने वालों में बहुतों के नए नेता और गाडफादर हैं। वह हालात का जायजा लेने गए थे। सच्चाई यह है कि कुछ निजी रिश्तों को छोड़कर आजकल राजनीति में बहुत कम लोग ही नेताओं से बिना स्वार्थ के जुड़ते हैं। दस माह पूर्व और आज बसपा, सपा नेताओं के दरबारों की रौनक के फर्क से इस बात को अच्छी तरह से समझा जा सकता है।

जो राजा कभी फकीर था। देश की तकदीर था। पूर्व सांसद अब उसका सार्वजनिक रूप से नाम लेने में पर्याप्त सावधानी बरतते हैं। कई दलों और गुटों के सफर के कारण साख भी पहले जैसी नहीं रही। परन्तु बात चीत केवल बात चीत की मीठी मुस्कराती अदा अब भी अच्छी लगती है। उनके पुराने दिनों की याद दिलाती है। जब उनकी तूती बोलती थी। तब वह किसी से कुछ भी कह देते थे। व्यस्तता का ओर छोर नहीं था। दोस्त शुभचिंतक निराष हताश होते गए। क्योंकि उन्हें यह भ्रम हो गया था कि सच और सही केवल और केवल वही बोलते हैं। व्यस्तता उनकी आज भी पहले से कम नहीं है। ठाठ-बाट में भी कोई परिवर्तन नहीं है। परन्तु स्थानीय स्तर पर उनके वर्षों पुराने समर्थक कुछ सजातीय और उपकृत लोगों को छोड़कर हताश और निराश हैं। कभी उनके स्थानीय प्रतिनिधि रहे लोक समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष से पूर्व सांसद की भेंट वार्ता हुई या नहीं। हुई तो क्या हुई। इसकी खोजबीन जारी है। पता लगा तो बतायेंगे। आओ! तुम तो अपने हो घर को हो। हम फर्रुखाबादी बाहरी लोगों को दोनो हाथ फैलाकर गले लगाते हैं। एक बार फिर से लोकसभा का चुनाव लड़ लो। हो सकता है तुम जीत जाओ और देश का विदेश मंत्री हार जाए।

ककड़ी के चोर को कटारी से मत मारो जिलाधिकारी जी!

बड़ी खबर है। कड़क और सख्त जिलाधिकारी ने नगर पालिका फर्रुखाबाद में वर्षों से कार्यरत 48 कर्मचारी निलंबित कर दिए। परन्तु निलंबित कर्मचारियों को नियुक्ति देने में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका निभाने वालों के विरुद्व उद्धरणीय कार्यवाही क्यों नहीं की गई, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

जानकार लोगों के अनुसार इनमें से कोई भी नियुक्ति कथित रूप से बिना भारी रकम लिए नहीं की गई। नियुक्ति अधिकारी को भी यह अच्छी तरह पता था कि वह पूर्णतः नियम विरुद्व ढंग से लोभ, धमकी या धौंस के चलते नियुक्ति कर रहा है। अब इतने लम्बे समय तक कार्यरत रहकर यह सभी कर्मचारी जिनकी नयी सेवा की आयु भी निकल चुकी है। अब क्या करेंगे और कहां जायेंगे। कई निलंबित कर्मचारी तो नगर पालिका में कार्यरत। सेवा निवृत्त वरिष्ठ अधिकारियों के पुत्र हैं। कुछ तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष के विशेष कृपा पात्रों के सगे सम्बंधी हैं। उन्हें पता था कि उनके पाल्य की पूर्णतः गलत नियुक्ति हो रही है। फिर भी उन्होंने यह सब होने दिया।

जिलाधिकारी जी! यह बहुत बड़ा स्केन्डल है। केवल कर्मचारियों को निलंबित करना ही पर्याप्त नहीं है। 48 लोगों के भविष्य से कथित रूप से भारी धनराशि वसूल कर खिलवाड़ करने वाले लोगों के विरुद्व कड़ी से कड़ी विधि सम्मत कार्यवाही भ्रष्टाचार को समूल नष्ट करने के आपके अभियान की सफलता के लिए बहुत जरूरी है। विश्वास है आप इतनी हिम्मत दिखायेंगे।

प्रोन्नति में आरक्षण क्यों!

सही है परिवार में कोई बच्चा कमजोर है। तब फिर स्वस्थ बच्चों को मिलने वाले दूध में कटौती करके अस्वस्थ और कमजोर बच्चे को देने में कोई हर्ज नहीं है। परन्तु बीमार कमजोर बच्चे के स्वस्थ हो जाने पर भी यह व्यवस्था जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। प्रोन्नति में आरक्षण हमारी समरसता और आपसी भाईचारे, प्रेम, व्यवहार के माहौल में विष घोलने का कार्य करेगा। सरकारी कर्मचारी सहयोगी सहकर्मी न होकर एक दूसरे के विरोधी और दुश्मन बन जायेंगे। राजनीति के कुशल खिलाड़ी अपने निजी स्वार्थों के लिए यही चाहते हैं। आरक्षण को विकास की की सीढ़ी ही बनाए रखिए। अपने घर का जीना मत बनाइए। आरक्षण लीजिए। परन्तु आरक्षण का लाभ लेकर अपनी दक्षता और योग्यता को बढ़ाने का प्रयास पूरे मनोयोग से करिए। केवल बैसाखियों पर कोई भी लंबी रेस का घोड़ा साबित नहीं हो सकता।

यह आरक्षण का स्वार्थ पूर्ण प्रयोग ही है। जिसके चलते साठ से अधिक सालों से प्रभावी आरक्षण के बाद भी साठ दलित भी सीना तान कर और छाती ठोंक कर यह कहने की हिम्मत नहीं दिखा सकते कि अब उन्हें या उनके परिवार को आरक्षण की आवश्यकता नहीं है। अब हमारे समाज के ही अन्य कमजोर लोगों को आने दीजिए। मायावती जी आज प्रोन्नति में आरक्षण की प्रबल पक्षधर हैं। अगर उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वह सामान्य सीट से चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं दिखा पातीं। तब फिर उनके समाज के अंतिम व्यक्ति को आरक्षण का लाभ कब मिलेगा। प्रोन्नति में आरक्षण के विरोधियों के अपने कुछ स्वार्थ हो सकते हैं। परन्तु प्रोन्नति में आरक्षण का समर्थन अपने ही समाज की अनदेखी करने के साथ ही स्वार्थ वादिता की पराकाष्ठा है। वोट बैंक की इसी निकृष्ट राजनीति सहित राजनीति की सारी गंदगी और सड़ांध को समाप्त करने के लिए निष्पक्ष और निर्भीक होकर शत प्रतिशत मतदान करना वर्तमान हालातों में अनिवार्य हो जाता है।

और अंत में- गुजरात के चुनाव का सबक- भाजपा कांग्रेस कुछ भी कहे। गुजरात और उससे पहले हिमाचल में हुए भारी मतदान ने नेताओं को अंदर से हिला कर रख दिया है। लोकतंत्र का जागृत लोकतंत्र का यही कमाल है। जनता मतदाता जब जागता है, तब सत्ता लोलुप नेताओं पर कहर बन कर टूटता है।

विडंबना देखिए घनघोर हाईटेक चुनाव प्रचार के दौरान किसी भी पार्टी के किसी भी नेता ने मतदाताओं से यह कहने की हिम्मत नहीं दिखाई कि वह चाहें जिसे मतदान करें। परन्तु मतदान अवश्य करें। राजनीतिक पार्टियों और नेताओं की अपनी सीमायें हैं। वह उन्हें तोड़ नहीं सकते। उनकी चुनाव सुधारों में कोई दिलचस्पी नहीं है। लोकतंत्र में असली मालिक जनता है। अब पश्चिमी बंगाल हिमाचल और गुजरात की तर्ज पर पूरे देश की जनता को मतदाता को निष्पक्ष और निर्भीक होकर शत प्रतिशत मतदान करने का संकल्प करना होगा।

चलते चलते – मनमोहन सिंह जी अब आपको क्या हो गया!

प्रधानमंत्री ने नयी और पुरानी सोंच का मामला उखाड़ कर अच्छा ही क्या। अब जो भी किसी नयी चीज का विरोध करेगा। उसे पुरानी सोंच वाला बताकर दरकिनार किया जाएगा। एक अरब बीस करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश का प्रधानमंत्री यदि ऐसी बात कहे और करे। तब फिर इसे देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जाएगा।

संयोग कहिए या लोकतंत्र की बलिहारी। ऊंचे ऊंचे पदों पर ऐसे लोग आकर बैठ गए हैं कि कुछ पूछों मत। उन्हें वालमार्ट का प्रमोशन अच्छा लगता है। सादा जीवन उच्च विचार की कार्य शैली उन्हें पुराने सोच और जमाने की बात लगेगी। मनमोहन सिंह की सादगी, ईमानदारी और योग्यता के हम सभी लोग यहां तक उनके विरोधी तक कायल हैं। परन्तु अपने अभी तक के कार्यकाल में वह अपने इन गुणों से कोई सीख अपने सहयोगियों को नहीं दे पाये। उनके सहयोगियों के बेतुके बचकाने वयानों की लम्बी सूची है। परन्तु उनके कल दिए गए बयान से ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री पर उनके सहयोगियों का प्रभाव पड़ने लगा है। अन्यथा वह इस प्राचीन देश किसानों के देश के लोगों को पुरानी सोंच का व्यक्ति बताकर अपमानित नहीं करते। नया सब कुछ अच्छा नहीं है। पुराना सब खराब नहीं है। नये और पुराने को अपने विवेक के तराजू पर तौल कर उचित अनुचित का निर्णय करने की सलाह हमें हमारे पुरखों ने दी है। क्या आप इसे भी पुरानी सोंच की बात कहेंगे। क्या ‘‘सर्वभूत हितेरतः’’ ‘‘वसुधैव कुटुंबकम्’’ सर्वे भवन्ति सुखिना सर्वे सन्तु निरामया, गौतम, गांधी, गुरु नानक, तुलसी, सूर, कबीर आदि की बातें पुरानी सोंच की बताकर छोड़ दी जानी चाहिए। आज बस इतना ही। जय हिन्द!

सतीश दीक्षित
एडवोकेट