बाल दिवस विशेष: टेक्नोलॉजी से बचपन में ही खो रहा बचपना

0

JNI NEWS : 14-11-2017 | By : JNI-Desk | In : FARRUKHABAD NEWS, जिला प्रशासन, सामाजिक

फर्रुखाबाद: खिलखिलाती हंसी, बेपरवाह सी भागमभाग, शरारते, रूठती इठलाती पर फिर मनाने पर झट से मान जाने कि आदतें, यही सब तो बच्चों का बचपना होता है. बचपन की उम्र एक ऐसी शुरूआती अवस्था होती है जीवन की, जिसमे बच्चा सीखता तो है पर अपनी बेपरवाह और बेखौफ़ खिलखिलाहट के साथ और साथ साथ बड़ों की डांट-डपट भी होती थी.

आज बाल दिवस है, नेहरु जी की याद दिलाने बाला दिन. बालदिवस एक ऐसी शख्सियत की याद दिलाने बाला दिन, जो बहुत लज्जत से रहते थे लेकिन बच्चो को असीम प्यार करते थे. और यही कारण है कि यह दिन बच्चो को समर्पित है| बाल दिवस का यह दिन उन बच्चो की भी याद दिलाता है, जो बेवाक थे जिनकी आँखों में सपने तैरते थे किन्तु ये सपने किसी टैलेंट हंट शो में टॉप आने के नहीं थे, ना ही कॉम्पटीसन में अच्छा स्कोर करने के थे. बच्चों के सपने तो उनके बचपने जैसे ही होते थे. उनके सपने पतंग उड़ाने के होते थे और उस पतंग के साथ खुद आसमान में उड़ने की कोरी कल्पनाओं के भी|

अब बो दिन नहीं रहे, अब बच्चे बचपन में ही समझदार हो गए हैं बड़े हो गए हैं. अब बो कोरी कल्पनाएँ नहीं करते, हाँ लेकिन दूसरो की कल्पनाओ से बनी दुनिया में खो गए हैं. आज वो दूसरो की कल्पनाओ को सहेजते हैं उनके बनाये वीडियो गेम खेलते हैं, लेकिन क्या ये बनी बनाई, बाजार में बिकने वाली कल्पनाएँ वीभत्स नहीं हैं? आज टेक्नोलॉजी के इस भागते दौड़ते दौर में जो वीडियो गेम बच्चों के हांथो में मिलते हैं उस गेम में इनका नायक गोलियां चलाता है दूसरो को अपनी गाड़ी से रौंद देता है। क्या असर होता होगा बचों के दिमाग पर?

किन्तु हाँ आज के इस माहौल में सिर्फ बच्चो को दोष देना बिलकुल सही नहीं होगा क्योंकि बच्चे सच में बच्चे ही होते है फिर वो किसी भी दौर के क्यों न हो, बिलकुल कोरे कागज की तरह. उनके लिए हम जैसा माहौल उबलब्ध कराते हैं वो उसमे ही ढल जाते हैं. अल्बर्ट आइस्टीन ने कहा था कि अगर आप अपने बच्चों को बुद्धिमान बनाना चाहते हैं तो उन्हें परियो की कहानी सुनाये और अगर और जायदा बुद्धिमान बनाना चाहे तो और ज्यादा परियो की कहानीयां सुनाये, लेकिन क्या आज माता पिता उन्हें सच्चे और अच्छे चरित्रों से बाकिफ करा पा रहे हैं? उन्हें दादी और नानी से मिलने वाली सच्ची सीखें मिल रही हैं? अगर नहीं तो फिर बच्चों का दोष कहाँ हैं?

आज के समय में तो माता पिता खुद बच्चों पर अच्छे मार्क्स लाने की जिम्मेदारी, भविष्य में क्या बनना है और कितना कमाना है ये अभी से सोचने कि ललक को बढ़ावा दे रहे हैं. ये सही है कि बचों ओ पथ-भ्रष्ट नहीं होना चाहिये पर सफलता की दौड़ में बचपना भी नहीं खोना चाहिए. बचों ओ बचपन में जीने कि सीख भी आज के समय में मिलना जरुरी है, कही ऐसा ना हो के वो अपने बचपन को मन के किसी कोने में दबाये हुए अपना जीवन बिताएं और परिवार व समाज से दूर होते जाएँ|

आज के समय में जो कुछ भी हो रहा है वो आज के बच्चों के नेचर में आये बदलाबों के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है. मैं यहाँ बात कि शुरुआत करुँगी बच्चे के जन्म से, आज जब एक महिला गर्भवती होती है तो उसे अच्छे और शांत माहौल में रहने की सलाह दी जाती है क्यूंकि गर्भ में भी बच्चे पर बाहर के वातावरण का बहुत असर पड़ता है. आज चारो तरफ शोरगुल है ध्वनि प्रदुषण है जो गर्भ में ही बच्चे पर असर डालता है और जब वो इस दुनिया में आता है तो भी उसे अपने आस पास का वातावरण और माहौल बिगड़ा हुआ मिलता है और बच्चा चिडचिडा और उग्र हो जाता है|

आज के समय में परिवार कि अहमियत बहुत कम हो गयी है लोग होड़ में भाग रहे हैं. संयुक्त परिवार बहुत कम हो गए हैं, और एकल परिवार में माँ और पिता को समय ही नहीं है अपने बच्चे के साथ अच्छा समय बिताने का. जिससे बच्चे में एक कड़वाहट आ जाती है. पहले संयुक्त परिवार में अगर बच्चे के माँ पिता के बीच कोई बात होती थी तो बाकी परिवार उसे सँभालने के लिए संस्कारित करने के लिए रहता था.| बच्चे शेयरिंग सीखते थे. लेकिन आज का माहौल सिर्फ सेल्फिशनेस का बन गया है. और बच्चे को जैसा माहौल मिलेगा वो उस में ही ढल जायेगा. पहले घर बड़े होते थे तो जो भी लड़ाई झगड़ा होता था वो बच्चों से अछूता रहता था लेकिन आज घर और परिवार दोनों छोटे हो गए हैं तो बच्चा ना चाहते हुए भी वो सब देखता है जो उसे नहीं देखना चाहिये. उसके सामने ही परिवार आपस में एक दूसरे पर चिल्लाते चीखते है तो बच्चों में भी वही सब देखने को मिलता है. आज सोसाइटी भी ऐसी है जहाँ पर बच्चों को कड़वाहट और कठोरता ही देखने को मिलती है. बच्चे का बचपना हो या फिर टीनेज कि अवस्था हो उसे अपने माता पिता का अमूल्य समय कि जरुरत होती है लेकिन आज के समय में माता पिता अपने कामों में ही लगे रहते हैं और पैसों की रेस में भागते रहते हैं बच्चा घर आता है तो माइक्रोवेब में गर्म कर या फिर बाई के हाथों से खाना ले कर खा लेते हैं|

पैसा आज रिश्तों पर भारी पड़ रहा है| बच्चों में भी यही भावना आना स्वाभाविक है वो भी आज पैसों को ज्यादा महत्त्व देते हैं, संस्कारों को कम. बच्चो को प्यार और परिवार के समय कि जरुरत है जो उन्हें नहीं मिलता यहाँ तक की स्कूलों में भी टीचर्स पर बहुत ज्यादा काम का बोझ रहता है वह भी किसी को समय नहीं है कि बच्चे से पूछा जाए कि उसकी परेशानी क्या है? पहले जब हम कार्टून देखते थे परियों कि खानी सुनते थे तो सीखते थे लेकिन आज कमे कार्टून और बच्चों के लिए बनाये जाने वाले कार्यक्रम भी बहुत ही भद्दे हैं जिनसे शायद ही बच्चा कुछ सीखता है लेकिन फिर भी माता पिता बच्चों कि शरारतों से बचने के लिए और शांति बनाये रखने के लिए उन्हें इस कार्टून्स को देखने देते है वो ये भी जानने कि कोशिश नहीं करते कि बच्चो पर क्या असर हो रहा है|

आज का समय टेक्नोलॉजी का है और बच्चों को कम्प्युटर, मोबाइल आसानी से मिल जाते हैं, और आज बच्चे को माँ कि गोद में सर रख कर सोने कि फुर्सत नहीं है और ना ही माँ के पास समय है उनको दुलारने का. मैं तो अपनी माँ कि गोद में सर रख कर बैठती थी और सो जाती थी. लेकिन आज यह सब बहुत कम देखने को मिलता है. जिससे बच्चों में वो कोमलता नहीं रही है. आज बच्चे को स्कूल में भारती कर तो दिया जाता है लेकिन वो अपने आस पास के माहौल से अपने आप ही सीख रहा है जिसका असर बहुत घातक है. टेक्नोलॉजी कि वजह से बच्चे सेल्फ एजुकेट हो रहे हैं, यहाँ तक कि बच्चों के रोल मोडल भी उनके परिवार में नहीं बहार के होते हैं|

आज इन सब समस्यायों से बच्चों को बचाने के लिए बच्चों को क्वालिटी टाइम देना जरुरी है. बच्चो को सही सीख देने के लिए माता पिता और सोसाइटी को इस टेक्नोलॉजी के इस युग में ज्यादा ज़िम्मेदार होने कि जरुरत है. उन्हें बाहर निकला कर प्रकृति को समझना और महसूस करवाना जरुरी है|

इस लेख/समाचार पर अपनी प्रतिक्रिया लिखें-