फर्रुखाबाद परिक्रमा: युवाओं व किसानों के सपनों की खुली आम नीलामी पर माननीयों की चुप्पी??
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मुख्यमंत्री के सत्तारूढ़ होते ही प्रारंभ हुई बोर्ड की परीक्षाओं से खुली सामूहिक नकल को सारी रणनीति के बाद भी रोका नहीं जा सका। शिक्षा माफिया मालामाल हो गया। सारे प्रबंध धरे के धरे रह गए। यह प्रदेश की उस युवा पीढ़ी के साथ धोखा है जिसके जबर्दस्त सहयोग और समर्थन से अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली है। प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री ने शुक्रवार को प्रदेश भर के आला अफसरों को 15 दिन के अंदर सारी व्यवस्थायें सुधारने के कड़े निर्देश दिए। जाहिर है कि अपनी सरकार की दो माह की कारगुजारी से मुख्यमंत्री संतुष्ट नहीं हैं। संतुष्ट होने जैसी कोई बात है भी नहीं। जिस जर्बदस्त जनादेश को लेकर अखिलेश यादव ने सरकार बनाई है, उस सम्बंध में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। परन्तु शासन प्रशासन में बैठे पुराने खुर्राट खिलाड़ियों के बीच मुख्यमंत्री का जर्बदस्त उत्साह उमंग, हताशा, निराशा के मंजर में न फंस जाए। ऐसा डर कभी-कभी सताने लगता है।
युवाओं के बाद किसानों का जबर्दस्त समर्थन सपा की सरकार बनने का कारण बना। परन्तु प्रदेश भर में गेहूं खरीद में जो लूट धांधली भ्रष्टाचार दबंगई का नजारा देखने को मिल रहा है उसने शासन प्रशासन की लाचारी और बेचारगी को उजागर ही नहीं किया किसानों के सपनों की खुली नीलामी कर दी। यहां पर भी सारे प्रबंध इंतजाम धरे के धरे रह गए। किसी भी मंडी में चले जाइए सब कुछ साफ-साफ दिखता है। परन्तु बेहयाई पूर्ण यह लूट रुक नहीं पा रही है। 1285 रुपये प्रति कुन्तल की दर से किसान को गेहूं का मूल्य निर्धारित है। परन्तु मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी के सर्वाधिक प्रभावी कहे जाने वाले कन्नौज फर्रुखाबाद मैनपुरी एटा, इटावा में किसान को सारी खुली और पूर्णतः गैर कानूनी कटौतियों के बाद 1030 रुपये से अधिक दाम प्रति कुन्तल अपनी गेहूं की फसल का नहीं मिल रहा है। गेहूं चावल आदि की खरीद विक्री और वितरण का तंत्र विगत कुछ वर्षों से ऊपर से नीचे तक इतना ताकतवर हो गया है कि उसके सामने शासन प्रशासन किसान यूनियन व्यापार मण्डल, राजनैतिक दल सबके सब बहुत छोटे और बौने नजर आते हैं। लूट की इस मण्डी में किसान इतना असहाय और लाचार है कि दिन रात की जबर्दस्त मेहनत से तैयार अपनी फसल की लूट देखता रहता और खून के आंसू रोता जाता है।
किसान की भलाई के लिए बनाई गयीं मंडियां किसानों की सबसे बड़ी शोषक बन गयी हैं। यहां सारे लूटेरे, जमाखोर, मुनाफाखोर, एक तरफ है। दौलत, पहुंच, असलाह और दबंगई से लैस हैं। सामने मुकाबले में लुटा पिटा किसान- वाह रे जय जवान और जय किसान। पूर्व सरकार में दमन उत्पीड़न के शिकार नई सरकार में तीन-तीन मंडियों के प्रभारी हैं। ठाठबाट देखें हैरत में पड़ जायेंगे। इतनी कम पगार में यह कैसे संभव है। परन्तु ए कुछ सामने हैं। हारे हुए राजनैतिक धुरंधर और सत्तासीन माननीय मौन हैं। चुनाव की चौसर पर किसान हितैषी सरकार बनाकर भी किसान अपने सपनों की नीलामी और लूट को रोक नहीं पा रहा है। सबके सब सत्ता की हिस्सेदारी में व्यस्त हैं। ऐसे में किसान की सुधि लेने वाला कहीं कोई दिखाई नहीं देता। किसानों को अब स्वयं एक जुट होकर अपनी लूट और दुर्दशा को रोकने की हिम्मत दिखानी होगी। जागो किसानों जागो। सोमवार से गेहूं की ट्रालियां जिलाधिकारी कार्यालय/ निवास पर खड़ा करने के अल्टीमेटम से ही शनिवार से सातनपुर मण्डी में गेहूं की खरीद शुरू हो गई। याद रखो अन्याय करने से अधिक दोषी अन्याय सहने वाला होता है।
देश तो आजाद होते-होते हो गया किन्तु तूने क्या किया
घूसखोरी, ढील, और सत्ताधता भाई भतीजावाद
महज तेजी और यह बाजार काले,
क्रोध से सब दूषणों की फेर माला
दूसरों को गालियों से पाट डाला
गालियां तुझको न कोई दे सके इसके लिए
बोल तूने क्या किया।- जय जवान – जय किसान!
अब साठ दिन की प्रदेश सरकार के सम्बन्ध में
उत्तर प्रदेश की विधानसभा के सामने प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत की आदम कदम प्रतिमा है। स्वतंत्रता संग्राम की जीवंत गाथा की तरह संपूर्ण भारतीय परिवेश से सजा देश और प्रदेश को समर्पित एक महामानव। प्रतिमा को देखते ही मन श्रद्धानत हो जाता है। श्रेष्ठ और सामान्य मुख्यमंत्रियों की एक लंबी श्रंखला है हमारे प्रदेश में।
इस श्रंखला की वर्तमान कड़ी के रूप में युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कार्यकाल मंगलवार को 60 दिन पूरे हो गये। विशाल उत्तर प्रदेश का छोटा सा सौम्य चेहरे पर हर समय मुस्कान सजाये रखने वाला पढ़ा लिखा अच्छी और सार्थक सोच वाला मुख्यमंत्री बिना व्यक्तिगत मेलजोल के बहुतों के मन में आशा और उमंग का संचार करता है। इस प्रदेश में आजादी के बाद से बहुत से बुजुर्ग और प्रौढ़ मुख्यमंत्रियों के क्रिया कलापों को देखा समझा और अपनी आलोचना का पात्र बनाया है। परन्तु देश के सबसे बड़े प्रदेश का युवा मुख्यमंत्री केवल यह चाहता है कि उसे जनादेश के अनुरूप कार्य करने का सामान्य अवसर मिले। उत्तर प्रदेश की विशालता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि यदि यह उत्तर प्रदेश देश होता तब दुनिया के छठे बड़े देश के रूप में इसकी गिनती होती। युवा हाथों में प्रदेश की बागडोर है। राजनैतिक दुरागृहों को किनारे रखकर कार्य करने का मौका दिया जाना चाहिए। परन्तु प्रदेश सरकार को भी अपनी कार्यप्रणाली से यह आभास नहीं देना चाहिए कि वह अपने एजेंडे पर विकास और सुधार के स्थान पर बदले और प्रतिशोध को वरीयता दे रही है। लूट खसोट अनियमितताओं की विधि सम्मत जांच पड़ताल हो। इसमें किसी को एतराज नहीं होना चाहिए। परन्तु कार्यकाल का एक एक दिन प्रदेश और प्रदेश वासियों के कल्याण और विकास के लिए समर्पित होना चाहिए। तभी तो युवा पीढ़ी एकजुट होकर कह पाएगी-
जिस ओर जवानी चलती है उस ओर जमाना चलता है!
हम और हमारे माननीय!
पंडित रामकृष्ण सारस्वत सदर सीट से विधायक रहे। पुराने लोगों को याद है कि जरूरतमंद की सायकिल पर बैठकर सम्बंधित अधिकारी के यहां पैरवी करने चले जाते थे। यादराम शाक्य, महरम सिंह भी इसी श्रेणी के माननीय थे। एक की सवारी सामान्य स्कूटर और दूसरे की रिक्शा। पंडित विमल प्रसाद तिवारी और ब्रहृमदत्त द्विवेदी को भी लोगों ने सामान्य स्कूटर या रिक्शे पर अपने विधान सभा क्षेत्र में घूमने जनसम्पर्क करते देखा है। यह सादगी और ईमानदारी का दौर था। ग्रीशचन्द्र तिवारी, अनवार खां, सियाराम गंगवार, जिमीं मियां, मथुरा प्रसाद त्रिपाठी, बाबू राजेन्द्र सिंह यादव, रामरतन पाण्डेय, होरीलाल यादव, कालीचरन टंडन, बिहारीलाल दोहरे, कप्तान सिंह यादव, अनवार अहमद, अबधेश चन्द्र सिंह, डा0 मन्ना आदि का दौर भी कमोवेश साफ सुथरा था।
यह सब याद करने की की नौवत इसलिए आन पड़ी कि आज एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में आगरा से एक समाचार प्रकाशित हुआ। इस समाचार के अनुसार फर्रुखाबाद के एक माननीय ने एक धन्नासेठ को माननीय बनाने के नाम पर लाखों रुपये ठगे। ठगी के शिकार सेठ जी अब अपनी लूट की कहानी मुख्यमंत्री के दरबार में सुनाने जा रहे हैं। इस समाचार के अनुसार जिले के चारों माननीय हैरान परेशान हैं और जनता की प्रश्न वाचक आंखों के शिशिर हो रहे हैं। समाचार में जो टिप्स दिये गए हैं उससे जानकार लोग समझ गए हैं। परन्तु जो नहीं समझ पाए वह हैरान परेशान हो रहे हैं।
अब माननीयों के साथ लक्जरी गाड़ियों का काफिला हीरे जवाहरात की अंगूठियों से सजी उंगलियों वाले शास्त्रधारी सहयोगी वरिष्ठ नेता और क्लास वन ठेकेदारों का जमावड़ा रहता है। येन केन प्रकारेण धन कमाने का योजनाबद्ध प्रयास। कौन हमारा क्या कर लोग इस प्रकार की दबगई है।
दोष किसका है इस पर विचार करें। सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा। हमारा वोट न डालना, विरादरी के नाम पर वोट डालना, कथित रूप से दारू पीकर पैसे लेकर वोट डालना। इस सबके चलते हम ऐसे माननीयों का सृजन करते हैं जिनके क्रिया कलापों से हमारा सर शर्म से झुक जाता है।
इस समय इस जिले में ऐसे माननीय हैं जो हत्या के सिद्धदोष अभियुक्त हैं। उच्च न्यायालय द्वारा लंबे समय से जमानत पर हैं। यह हमारी न्याय प्रणाली की शिथिलताका नजारा है। पिता के हत्यारे के हाथों चुनाव हारने वाले सुपुत्र के क्रिया कलापों की बानगी है। इससे पूर्व के माननीय अपने पूरे कार्यकाल में यह सिंह गर्जना ही करते रहे कि हमसे बड़ा गुन्डा कोई नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित स्वास्थ्य घोटाले के सम्बंध में सीबीआई दफ्तरों के चक्कर पूछताछ के सम्बंध में काट रहे हैं। जिले सहित पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं का कबाड़ा करने और अरबों रुपयों की कथित लूट के बाद अपनी गिरफ्तारी का इंतजार कर रहे हैं।
आखिर ऐसा क्यों होता है- इसलिए कि हमने सादगी, ईमानदारी, संघर्ष त्याग और राजनीति के शब्दकोष से निकाल दिया है। हमें यह सब गुजरे जमाने की बातें लगती हैं। दबंगई, झांपा, तिकड़म, धौंस, धमकी, लूट, कलह, षड़यंत्र जिनकी राजनीति के आभूषण हैं। तब फिर माननीयों के द्वारा आगरा जैसे दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति कौन रोक पाएगा। कहा भी है लोगों को वैसे ही जनप्रतिनिधि मिलते हैं जैसे जनप्रतिनिधि के वह पात्र हैं। अब यह आपके ऊपर है कि आप कैसा जनप्रतिनिधि चाहते हैं। भैया मेरे जो बोओगे वही काटोगे। सारे काम बहुत कठिन हैं आपके वश के नहीं हैं। तब फिर अपने और अपनी आने वाली पीढ़ी की भलाई के लिए निष्पक्ष और निर्भीक होकर वोट डालने की आदत तो डाल लो। राजनीति की सारी सड़ांध और गंदगी साफ हो जाएगी।
हिला कर रख दिया था मुख्यालय
आप अपने अपने कारणों से सर्वोदयी सामाजिक संघर्षकर्ता लक्ष्मण सिंह से असहमत हो सकते हैं परन्तु उनकी संघर्षशीलता का लोहा उनके विरोधी भी मानते हैं। अपने-अपने एजेंडे पर कार्य कर रहे लोगों के बीच जिला मुख्यालय पर जन समस्याओं के लिए संघर्षरत लक्ष्मण सिंह अपने आमरण अनशन के माध्यम से लोगों को अन्याय के विरुद्व शांतिपूर्ण अहिंसक संघर्ष करने का जो पाठ अपनी वाणी से नहीं कर्म से पढ़ा रहे हैं। वह निश्चय ही प्रशंसनीय है। उनका समर्थन जन सामान्य के बीच बढ़ रहा है। उनकी न्यायोचित और जनता से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए प्रशासन को प्रयास पूरे मनोयोग से करना चाहिए। अन्यथा आने वाले दिनों में स्थिति विस्फोटक हो सकती है।
लक्ष्मण सिंह और उनके बहादुर साथियों से भी अनुरोध है कि अपनी लड़ाई को व्यक्तिगत न बनायें सार्वजनिक ही बनाये रखें। कोटेदारों के कारनामें कौन नहीं जानता। नीति और नियम के अनुरूप सब जगह खुली बैठक में कोटेदारों की नियुक्ति होनी चाहिए। केवल एक गांव में ही नहीं जैसा कि आप चाहते हैं। यह प्रकरण व्यक्तिगत और जातिगत अहंकारों का टकराव है और न्यायालय में विचाराधीन भी है। दूसरे जिन माननीयों के विषय में आप अच्छी तरह जानते हैं जिनके क्रिया कलापों के विरुद्व आपने संघर्ष किया है। उन्हें उनके निहित स्वार्थों के कारण अपने आंदोलन में नाक घुसेड़ने की इजाजत न देना। यह हमारा सुझाव है मानना न मानना आपका काम है। हम छिद्रान्वेषी नहीं है। आपके समर्थक और प्रशंसक हैं। परन्तु गल्तियां किसी से भी हो सकतीं हैं। आपसे भी और हम से भी। परन्तु गल्तियां किसी से भी हो सकती हैं। आपसे भी और हमसे भी। परन्तु गल्तियों को बार-बार दोहराने की गल्ती हमको आपको क्या किसी को भी नहीं करनी चाहिए। आप सर्वोदय के अपने अपने मिशन में कामयाब हों यही हमारी कामना है।
शुरू हो गया आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला
राजनीति का वर्तमान दौर इतना विचित्र हो गया है कि छोटे से लेकर बड़े नेता तक में धैर्य नहीं है। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुए दो माह ही हुए हैं। परन्तु दोनो पक्ष महाभारत के युद्ध की तर्ज पर आमने सामने आकर डट गए हैं। हमले शुरू हो गए हैं। आने वाले दिनों में इनमें तेजी और गर्मी आएगी। विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो गए। बसपा गयी सपा आई। नीचे से लेकर ऊपर तक स्थानांतरणों का दौर चला जो अभी तक जारी है। सबसे पहले बसपा सुप्रीमो बहिन जी ने ही शुरूआत की। उन्होंने स्वयं ही अपना स्थानांतरण लखनऊ से दिल्ली के लिए कर लिया। पता नहीं लखनऊ में रहकर अपनी लड़ाई आगे बढ़ाने में उन्हें क्या परेशानी थी। मुलायम सिंह यादव उनसे भी आगे निकल गए। वह लखनऊ का राजपाट अपने युवा पुत्र को सौंपकर आगे की लड़ाई की तैयारी में तथा बेटे को सिखाने समझाने बताने के साथ ही राजनीति की रपटीली राहों में आए दिन होने वाले षड़यंत्रों से बचाए रखने के लिए लखनऊ दिल्ली नियमित रूप से आने जाने लगे।
इन दो महानुभावों की भूमिकायें तय हो जाने के बाद विभागों के बंटवारों, नियुक्तियों का दौर चला। जल्दबाजी इतनी कि अपने ही निर्णय बार-बार बदलने पड़े। लखनऊ यह चल रहा था और जिलों में पार्टी नेता कथित बसपाई मानसिकता वाले अधिकारियों को सुधर जाने का उपदेश और अल्टीमेटम दे रहे थे। जो दरबार में हाजिर हो गए वह सुधर गए जो हाजिर नहीं हुए वह दूसरे जिलों में सिधार गए। बिजली विभाग के एक बड़े अधिकारी ने अपने कार्यालय नई सरकार बनते आना जाना बंद सा कर दिया था। एक मंत्री जी के दरबार में हाजिर मीडिया ने प्रमुखता फोटो छापा। अब हाल यह है कि न मंत्री जी को अधिकारी से कोई शिकायत है न ही अधिकारी को मंत्री जी का कोई भय है। अब यह दूसरी बात है कि बिजली की व्यवस्था सुधार नहीं रही है। घुड़सवार सही हो कुशल हो, निष्पक्ष और निर्भीक हो त बवह कैसा भी घोड़ा हो उसे काबू में कर लेगा। आप बसपाई, सपाई, कांग्रेसी, भाजपाई मानसिकता का लेबिल अधिकारियों पर क्यों लगाते हो। उन्हें सक्षम ईमानदार अधिकारी क्यों नहीं बनाए रखना चाहते।
इसके बाद घपलों घोटालों के सनसनी खेज खुलासों का दौर शुरू हो गया। चाहे अनचाहे मुख्यमंत्री भी इसमें शामिल हो गए। अब ऐसे में बहिन जी कहां चुप बैठने वाली थीं। उन्होंने प्रदेश सरकार के खिलाफ जोरदार हल्ला बोल दिया। आने वाले दिनों में यह वार और पलटवार का दौर और तेज आक्रामक और संवेदनशून्य होगा। यह नहीं होना चाहिए। बसपा सरकार यदि कायदे से चली होती तब फिर सपा को इतना प्रचंड बहुमत नहीं मिला होता। लोकतंत्र में जनता से बड़ा निर्णय किसी का नहीं होता। जनता ने फैसला दे दिया। अब जिस एजेंडे को लेकर जीत हो उस पर पूरी मुस्तैदी से काम करो। सामान्य विधि सम्मत जांच पड़ताल से किसी को डरना नहीं चाहिए और किसी को अपने विरोधी को डराना भी नहीं चाहिए। जांच पड़ताल के नतीजे आने दीजिए। किसी भी पक्ष के लिए अधीरता जनहित में नहीं है। इससे जनता में गलत संदेश जाना है। प्रदेश को विकास के मार्ग पर ले चलिए जाने वाले लौटकर नहीं आ पायेंगे और आपको जनता की सेवा करने का अवसर भी मिलता रहेगा।
यह सब कहने की आव्ष्यकता इसलिए पड़ी कि कहीं अतीत की पुनरावृत्ति न हो। सपा प्रदेश में बसपा के कथित कुशासन की प्रतिक्रिया स्वरूप जिस शानदार ढंग से जीती है। उसके कई गुना शानदार ढंग से 1977 में आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी जीती थी। इंन्दिरा गांधी सहित कांग्रेस के लगभग सभी नेता बुरी तरह हार गये थे। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल पाया था। इतना प्रबल जन आक्रोष था श्रीमती इंदिरागांधी और कांग्रेस के खिलाफ। परन्तु कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा की तर्ज पर बनी जनता पार्टी के दिग्गज नेता देश के कल्याण और विकास की बातें करने के स्थान पर अपनी आपसी लड़ाई और इंन्दिरागांधी के विरुद्व जांच पड़ताल जांच कमीशन आदि में बुरी तरह उलझ गये। दो अक्टूबर 1977 को इन्दिरागांधी को उनकी आगरा मं हुई शानदार रैली के बाद दिल्ली में गिरफृतार कर लिया गया। मरी हुई कांग्रेस जिंदा हो गयी और 1980 में हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी को बुरी तरह पराजित कर इन्दिरागांधी पुनः देश की प्रधानमंत्री बन गयीं। हमें आप युवा मुख्यमंत्री का समर्थक माने तो मान लें। परन्तु हम नहीं चाहेंगे कि उत्तर प्रदेश में ऐसे घटना चक्र की पुनरावृत्ति हो। कम करिए चुनाव होने दीजिए और फैसला जनता को ही करने दीजिए। जांच घोटालों अनियमितताओं पर विधि सम्मत कार्यवाही होने दीजिए। उनका ढोल पीटकर आरोप प्रत्यारोप का कड़ुआ और मत्रशुर करिये। बाकी आपकी मर्जी। यह भी मत भूलिए कि सपा और बसपा को मिले वोटों में केवल तीन प्रतिशत का ही फर्क है। इसलिए ऊपर से लेकर नीचे तक जोश के होश की जरूरत केवल सपा को ही नहीं बसपा सहित सभी को है।
और अंत में – साठ साल की संसद और साठ दिन की प्रदेश सरकार!
पिछले रविवार को भारतीय संसद साठ साल की हो गई। सभी ने उस पर अपने-अपने सोच के अनुसार विचार प्रतिक्रिया दी। कोई भी देश अपनी मातृभाषा के बिना गूंगा होता है। हम यहां पर हिन्दी या अंग्रेजी की बात नहीं कर रहे हैं। मातृभाषा की बात कर रहे हैं।
संसद के इस ऐतिहासिक समारोह में जितने भी माननीयों ने अपने विचार अंग्रेजी भाषा में व्यक्त किए। उनमें अपवाद स्वरूप ही किसी की मातृ भाषा अंग्रेजी होगी। वह अपने संसदीय क्षेत्र में वोट भी अपनी मातृ भाषा में ही मांगत होंगे। फिर अपनी संसद में अपनी बात अपनी मातृभाषा में कहने में इन माननीयों को क्या परेशानी है। यह बात समझ में नहीं आती। हमारी संसद एक तो मतदान के कम प्रतिशत की बजह से कभी भी बहुमत की सरकार नहीं बनाती। दूसरे कम बैठकों और संसद सदस्यों में अपनी बात अपनी मातृ भाषा में न कहने की आदत के कारण हमारी संसद जनमानस तक नहीं पहुंच पाती। संसद की कार्यवाही सुनने और जानने के सम्बंध में लोगों की निरंतर घटती रुचि का एक कारण यह भी है।
यह अच्छी बात है कि लगभग सभी सांसदों ने पार्टी लाइन से ऊपर यह स्वीकार किया कि वह परिस्थितियों या जो भी कारण रहे हों उनके चलते अपने दायित्वों का अपेक्षित निर्वाह नहीं कर पाए। आगे से ऐसी स्थिति न बनने देने का संकल्प भी किया गया। परन्तु सोमवार से शुक्रवार तक की संसदीय कार्यवाही में इस संकल्प के प्रति गंभीरता का अपेक्षित प्रभाव देखने को नहीं मिला।
और बातें जानें दें। हमारी संसद अपने ही सर्वसम्मत प्रस्तावों के प्रति गंभीर नहीं है। 1962 में चीन से मिली शर्मनाक पराजय के बाद हमारी संसद ने सर्व सम्मत प्रस्ताव में यह संकल्प किया था कि हम चीन द्वारा कब्जे में लिए गए अपने भूभाग को अपने कब्जे में लेकर ही चैन से बैठेंगे। हम बिना अपना भूभाग चीन से वापस लिए कितने चैन से बैठे हैं। यह इसी बात से स्पष्ट है कि साठ साला समारोह में किसी भी माननीय ने इस सर्व सम्मत प्रस्ताव का किसी भी रूप में जिक्र करने तक की आवश्यकता नहीं समझी। इन्हीं माननीयों ने अनेक बार बिना बहस के सर्वसम्मति से अपना वेतन भत्ता बढ़ाया है।
लालू प्रसाद जी यादवइ स बात पर प्रसन्न हो सकते हैं कि संसद में उनकी बात पर सर्वाधिक मेंजें थपथपाई जाती हैं। सांसद भी जमकर अपनी पसन्नता व्यक्त करते हैं। परन्तु वास्तव में ऐसी है नहीं। क्षमा करें विदूषक की तरह उनकी बातों पर हंसा जा सकता है परन्तु उनकी बातों को जन सामान्य गंभीरता से नहीं लेता। यह बिहार में उनके निरंतर कम हो रहे जनाधार से स्पष्ट हो जाता है। एक बात और दूसरे को गाली देकर अपनी सर्वोच्चता का बखान करके हम अच्छा और सर्वोच्च नहीं बन सकते। इसके लिए हमें स्वयं अपने स्तर से ही प्रयास करने होंगे। पता नहीं हमारे माननीय इस बात के लिए कितने गंभीर हैं। सोनिया गांधी और मुलायम सिंह यादव के साथ अनेक वक्ताओं ने महात्मागांधी के रास्ते पर चलने की बात कही। परन्तु राष्ट्रपिता जैसी सादगी और ईमानदारी कितने माननीयों के पास है। सांसद निधि में कथित रूप से कमीशन खाने का कलंक किसके माथे पर नहीं है। यह शोध का विषय है।
हमारे सांसदों को पहली संसद के दौरान क्या मिलता था। आज सर्वसम्मत प्रस्तावों के परिणाम स्वरूप जो कुछ मिल रहा है उसमें जमीन आसमान का अंतर है। क्या सांसदों ने अपनी कुशलता, कर्तव्यनिष्ठा उसी अनुपात में बढ़ाई है। इसका निर्णय हम अपने माननीयों पर ही छोड़ रहे हैं। कोई सांसदों की, माननीयों की, कितनी भी प्रशंसा करे, आलोचना करे। वह वास्तव में क्या है। यह हमारे सांसदों, माननीयों से बेहतर कोई नहीं जानता। अपने सीने पर हाथ रखकर स्वयं अपने से संवाद करिए। जो अंतरात्मा कहे उसका अनुसरण कीजिए। सच मानिए संसद के 75 वर्ष पूरे होने पर सारा देश सच्चे मन से आपकी प्रशंसा और अनुसरण करेगा।
इसी सम्बंध में एक बात और चुनाव को सादगी पूर्ण बनाने का संकल्प कीजिए। झांपे और दिखावे की राजनीति के चलते सभी आपको भ्रष्ट और बेईमान ही समझेंगे। अपनी गल्तियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने की राष्ट्रपिता महात्मागांधी की शैली को अपनाते हुए बताइए कि क्या आपने अपने चुनाव में वास्तव में उनकी धनराशि खर्च की है जितनी अपने अपने चुनावी विवरण में दिखाई है।
कन्नौज और फर्रुखाबाद के सांसदों के सन्दर्भ में मात्र स्मृति के आधार पर लिखे गये आलेख पर अनगिनत प्रतिक्रिया में मिलीं। अधिकांश ने इस प्रयास को सराहा, कुछ ने त्रुटियां बताईं। सभी को धन्यवाद। कन्नौज निवासी टी एन चतुर्वेदी तथा श्री रामबख्श वर्मा के राज्यसभा सदस्य बनने की महत्वपूर्ण जानकारी छूट जाने का हमें खेद है। हम क्षमा प्रार्थी हैं। हमारी कमियां बताकर हमारा उत्साहवर्धन करते रहिए। सच मानिए हम रंचमात्र भी बुरा नहीं मानेंगे। आपके बहुमूल्य सुझावों पर हम भविष्य में पूरा ध्यान रखेंगे। हम मानते हैं कि गल्तियां किसी से भी कभी भी, कहीं भी हो सकती हैं। परन्तु उन्हें दोहराने की गल्ती हममें से किसी को भी करने का अधिकार नहीं है। सत्यमेव जयते।
जय हिन्द!





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